जिसकी एक आवाज पर कांपते थे पांच राज्य, उसका शव लेने भी कोई नहीं आया
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
कभी झारखंड, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ के जंगलों में जिसका नाम ही खौफ पैदा करता था, वही एक करोड़ का इनामी नक्सली प्रशांत बोस उर्फ किशन दा मौत के बाद ऐसी गुमनामी में चला गया कि
👉 उसका पार्थिव शरीर घंटों अस्पताल के मॉर्चरी में लावारिस पड़ा रहा
👉 और अंत में जिला प्रशासन को ही उसका अंतिम संस्कार करना पड़ा
यह सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि उस पूरी हिंसक विचारधारा का अंत है, जो बंदूक के दम पर “सत्ता” का सपना देखती है।

72 घंटे तक मॉर्चरी में पड़ा रहा ‘खौफ का नाम’
कभी माओवादी पोलित ब्यूरो का सदस्य रहा प्रशांत बोस—
जिसकी एक आवाज पर गुरिल्ला दस्ते बड़े से बड़े हमले को अंजाम देते थे—
उसका शव करीब 72 घंटे तक रांची के अस्पताल के मॉर्चरी में पड़ा रहा।
* कोई परिजन नहीं…
* कोई अपना नहीं…
* कोई कंधा देने वाला तक नहीं…
👉 जिसने सैकड़ों जिंदगियां उजाड़ी, उसके लिए एक आंसू तक नहीं गिरा।
रिम्स में मौत, हरमू मुक्तिधाम में प्रशासन ने किया अंतिम संस्कार
इलाज के दौरान रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) में उसकी मौत हो गई।
इसके बाद प्रशासन शव लेने के लिए परिजनों का इंतजार करता रहा, लेकिन—
पत्नी शीला हांसदा (जो खुद जेल में बंद है) ने पत्र लिखकर साफ कर दिया कि
👉 “कोई पारिवारिक सदस्य जीवित नहीं है”
* कोलकाता से आए कुछ लोग दावा तो करते रहे,
👉 लेकिन रिश्तेदारी साबित नहीं कर सके
* अंततः रांची जिला प्रशासन ने
👉 हरमू स्थित मुक्तिधाम में पूरे विधि-विधान के साथ उसका अंतिम संस्कार किया

1970 से 2020 तक आतंक का नेटवर्क, लेकिन अंत अकेलेपन में
प्रशांत बोस कोई सामान्य नक्सली नहीं था—
* माओवादी संगठन का पोलित ब्यूरो सदस्य
* कई राज्यों में फैले नेटवर्क का रणनीतिक मास्टरमाइंड
* करोड़ों के इनामी हमलों का योजनाकार
उसकी एक “हां” पर—
* सुरक्षाबलों पर घातक हमले
* पुलिस कैंप पर धावा
* निर्दोष ग्रामीणों की हत्या
* बड़े स्तर पर विस्फोट
👉 सब कुछ पलक झपकते हो जाता था
लेकिन मौत के बाद—
👉 वही “नेटवर्क” गायब
👉 वही “साथी” नदारद
👉 वही “क्रांति” खामोश
खूनी इतिहास: जहां गया, वहां सिर्फ तबाही छोड़ी
प्रशांत बोस का नाम कई बड़ी घटनाओं से जुड़ा रहा—
* सांसद सुनील महतो की हत्या
* पूर्व मंत्री रमेश सिंह मुंडा की हत्या
* सारंडा के बालिबा में 29 पुलिसकर्मियों की हत्या
* कलाईता में 12 CRPF जवानों की शहादत
* जहानाबाद जेल ब्रेक जैसी बड़ी साजिश
👉 इसके अलावा सैकड़ों निर्दोष ग्रामीणों और जवानों की मौत का जिम्मेदार
यह वही “क्रांति” थी, जिसमें
खून बहता था… और डर राज करता था।

2021 में गिरफ्तारी, जेल में बीते आखिरी दिन
12 नवंबर 2021 को
👉 सरायकेला-खरसावां से पत्नी के साथ गिरफ्तार
👉 तब से बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार में बंद
बताया जाता है कि आखिरी दिनों में—
👉 वह धार्मिक किताबें पढ़ रहा था
👉 और बीमारी से जूझ रहा था
3 अप्रैल को तबीयत बिगड़ी…
रिम्स ले जाया गया…
और वहीं उसकी मौत हो गई।
युवाओं के लिए बड़ा संदेश: बंदूक का रास्ता सिर्फ मौत देता है
प्रशांत बोस की कहानी एक चेतावनी है—
👉 शुरुआत में “क्रांति” का सपना
👉 बीच में खून, हिंसा और आतंक
👉 और अंत में…
तन्हाई, गुमनामी और लावारिस मौत
यह सच युवाओं को समझना होगा—
* बंदूक कभी समाधान नहीं देती
* हिंसा कभी सम्मान नहीं दिलाती
* नक्सलवाद का अंत हमेशा विनाश में होता है
नक्सलियों का सच: इस्तेमाल करो और छोड़ दो
इस घटना ने एक और सच्चाई उजागर कर दी—
👉 नक्सली संगठन अपने लोगों को सिर्फ “उपयोग” करता है
👉 मरने के बाद कोई साथ नहीं देता
👉 कोई पहचानने तक नहीं आता
जिस संगठन के लिए जिंदगी दांव पर लगाई—
👉 वही संगठन अंत में कंधा देने तक नहीं आता

समाज और सरकार के लिए भी सबक
यह घटना सिर्फ नक्सलियों के अंत की कहानी नहीं, बल्कि सिस्टम के लिए भी संदेश है—
* युवाओं को सही दिशा देना जरूरी
* शिक्षा और रोजगार से जोड़ना जरूरी
* नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जागरूकता बढ़ाना जरूरी
‘किशन दा’ का अंत, हिंसा की विचारधारा पर तमाचा
प्रशांत बोस उर्फ किशन दा का अंत यही बताता है—
👉 खौफ की हुकूमत हमेशा नहीं चलती
👉 बंदूक की ताकत अंत में बेकार साबित होती है
👉 और
👉 हिंसा का रास्ता सिर्फ गुमनाम मौत तक ले जाता है
आखिरी सच…
* जिसने हजारों को डराया…
* जिसने सैकड़ों की जान ली…
👉 उसकी खुद की विदाई में कोई नहीं आया।
यही है नक्सलवाद का असली अंजाम।














