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सारंडा का लाल आतंक खत्म: 25 साल की नक्सली हिंसा, जंगल–खनिज–आदिवासी जीवन और 17 कुख्यात माओवादियों के अंत की कहानी

On: January 25, 2026 6:24 PM
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नक्सलियों ने रोका विकास, उजाड़ा पर्यटन, लूटा जंगल–खनिज, आदिवासी बने मोहरे — अब अनल–अनमोल ढेर, ग्रामीणों में जश्न, सरकार के सामने सारंडा को स्वर्ग बनाने की ऐतिहासिक चुनौती

रिपोर्ट : शैलेश सिंह
सारंडा…
यह नाम कभी झरनों की आवाज, साल के जंगलों की खुशबू और आदिवासी संस्कृति की गरिमा का प्रतीक था।
लेकिन पिछले पच्चीस वर्षों में यही सारंडा बन गया—
डर का जंगल, बारूद की धरती और खून से सना इतिहास।
यह वही इलाका है जहां
पेड़ों की सरसराहट से ज्यादा
गोलियों की गूंज सुनाई दी।
जहां बच्चों की किलकारी से पहले
लैंडमाइन की धमक ने मातम बोया।
और अब…
जनवरी 2026 में, जब एक करोड़ के इनामी अनल और 25 लाख के इनामी अनमोल समेत 17 कुख्यात माओवादी मारे गए,
तो यह सिर्फ एक मुठभेड़ नहीं थी—
यह सारंडा के 25 वर्षों के लाल आतंक की रीढ़ टूटने का क्षण था।
यह रिपोर्ट केवल घटनाओं का दस्तावेज नहीं,
यह उस जंगल की कराह है
जो वर्षों से बंदूक और बारूद के बीच पिसता रहा।

अनल दा

🚨 झीलरुवां हमला: नक्सली क्रूरता की ताजा मिसाल

चाईबासा जिले के झीलरुवां गांव में भाजपा के पूर्व विधायक गुरुचरण नायक पर नक्सलियों का हमला यह साबित किया था कि लाल आतंक कितना निर्दयी और अमानवीय है।
पूर्व विधायक किसी तरह बच गए थे,
लेकिन उनके दो बहादुर बॉडीगार्ड—
शंकर नायक
ठाकुर हेम्ब्रम
को नक्सलियों ने बेरहमी से मार डाला था।
शंकर नायक की पहले गला रेतकर हत्या की गई, फिर सीने में गोली मारी गई थी।
ठाकुर हेम्ब्रम को सीधे गोली मार दी गई थी।
नक्सली तीन AK-47, मैगजीन बेल्ट और कारतूस लूटकर भाग निकले थे।
करीब 50 नक्सली इस हमले में शामिल थे।
यह हमला केवल दो जवानों की हत्या नहीं था,
यह राज्य की सत्ता, कानून और लोकतंत्र को खुली चुनौती थी।
यह संदेश था—
“जंगल हमारा है, सरकार नहीं।”

🕰️ 2001: सारंडा में नक्सलियों का प्रवेश क्यों हुआ?

सवाल उठता है—
नक्सलवाद सारंडा में आया क्यों?
उत्तर जंगल की गहराई में छिपा है।
सारंडा के घने जंगल, लौह अयस्क की पहाड़ियां और दुर्गम इलाका नक्सलियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह बन गया।
वन विभाग द्वारा अवैध कब्जों के खिलाफ कार्रवाई से नाराज कुछ तत्वों ने MCC (अब भाकपा माओवादी) से संपर्क साधा।
25 नवंबर 2001 को पहला नक्सली दस्ता बिटकिलसोय स्कूल पहुंचा।
27 नवंबर 2001 को पहली मुठभेड़ हुई।
नक्सली ईश्वर महतो मारा गया।
यहीं से शुरू हुआ
सारंडा का खून से सना अध्याय।

🩸 2002: बिटकिलसोय नरसंहार

19 दिसंबर 2002…
सारंडा का सबसे काला दिन।
नक्सलियों ने पुलिस पर घात लगाकर हमला किया।
👉 12 पुलिसकर्मी
👉 4 निजी चालक
👉 कुल 17 मौतें
पुलिस के हथियार लूट लिए गए।
इलाका दहल उठा।
यह संदेश साफ था—
अब सारंडा में सरकार नहीं,
नक्सली कानून चलाएंगे।

अनमोल दा

💣 2004: बालिबा नरसंहार – 30 जवान शहीद

31 मार्च 2004 को बड़ाजामदा ओपी पर हमला हुआ।
हथियार लूटे गए।
7 अप्रैल 2004 को बालिबा गांव के पास
नक्सलियों ने तीन तरफ से हमला कर—
👉 पुलिस और सीआरपीएफ के 30 जवानों को मौत के घाट उतार दिया
👉 दो एलएमजी समेत दर्जनों हथियार लूट लिए
एसपी प्रवीण कुमार घायल हुए।
रात के अंधेरे में जान बचाकर भागे।
यह घटना साबित कर गई कि
सारंडा अब केवल जंगल नहीं,
युद्धभूमि बन चुका था।

☠️ 2006: कलैता लैंडमाइन विस्फोट

30 मई 2006 को
कलैता गांव के पास
लैंडमाइन विस्फोट में
12 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए।
इसके बाद—
स्कूल उड़ाए, जलाए गए
सड़क निर्माण रोका गया
मोबाइल टावर उड़ाए गए
विकास कार्य ठप हो गया
सारंडा अंधकार में डूब गया।

🎯 2007: सांसद सुनील महतो की हत्या

4 मार्च 2007 को सांसद सुनील महतो की हत्या लोकतंत्र पर हमला थी।
होली की शाम
खून से रंग गई।
राज्य की राजनीति कांप उठी।
यह संदेश गया—
“जनता का प्रतिनिधि भी सुरक्षित नहीं।”

बरामद हथियार

🏴 2011 तक नक्सली राज

2011 तक सारंडा में—
काला झंडा फहरता
पुलिस का प्रवेश वर्जित
स्कूलों में तिरंगा नहीं
सड़क–पुल–अस्पताल बंद
बाहरी लोगों की एंट्री बंद
स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर
तिरंगे की जगह
उल्टा झंडा फहराया जाता था।
सारंडा भारत के
रेड कॉरिडोर का प्रतीक बन गया।

⚔️ ऑपरेशन एनाकोंडा: नक्सलियों की पहली बड़ी हार

2011 में चला
ऑपरेशन एनाकोंडा।
सुरक्षा बलों ने
माओवादी ठिकानों को तोड़ा।
कई इलाकों से नक्सली भागे।
कुछ वर्षों तक
शांति की उम्मीद जगी।
लेकिन जंगल में छिपे सांप
फिर सिर उठाने लगे।

💀 2026: अनल–अनमोल समेत 17 नक्सलियों का अंत

22–23 जनवरी 2026…
इतिहास की तारीख।
👉 1 करोड़ का इनामी अनल
👉 25 लाख का इनामी अनमोल
👉 कुल 17 कुख्यात नक्सली ढेर
यह केवल मुठभेड़ नहीं थी,
यह माओवादी संगठन की रीढ़ टूटना था।
जिनके नाम से गांव कांपते थे,
आज वही नाम
मिट्टी में मिल गए।

🥁 नक्सलियों की मौत पर ग्रामीणों में जश्न

जब यह खबर गांवों में पहुंची,
तो दृश्य बदला हुआ था।
🐓 मुर्गा काटा गया
🎉 ढोल बजे
🍬 मिठाई बंटी
लोग बोले—
“अब जंगल हमारा है, डर खत्म।”
यह पहला मौका था
जब सारंडा ने
नक्सलियों की मौत पर
खुलेआम खुशी मनाई।
यह डर की हार थी।
यह जनता की जीत थी।

🌲 जंगल और खनिज संपदा: नक्सलियों की असली लड़ाई

सारंडा में—
भारत का सबसे बड़ा साल वन
लौह अयस्क की खदानें और अन्य खनिज
नक्सलियों ने इन संसाधनों पर कब्जा कर—
लेवी वसूली
ट्रक जलाना
मजदूरों को डराना
कंपनियों को भगाना
हजारों आदिवासी बेरोजगार हुए।
जंगल से निकलने वाला धन
बंदूक खरीदने में लगा।

👨‍🌾 आदिवासी सबसे बड़ा शिकार

आदिवासी—
नक्सलियों के डर में
पुलिस के शक में
रोजगार से वंचित
शिक्षा से दूर
उनका जीवन
दो पाटों में पिसता रहा।
जो विरोध करे
वह मुखबिर कहलाया।
जो चुप रहे
वह अपराधी समझा गया।

🌴 पर्यटन का गला घोंटा गया

सारंडा में—
पहाड़
झरने
गुफाएं
हरियाली
लेकिन नक्सलियों के कारण—
पर्यटक नहीं आए
होटल नहीं बने
गाइड नहीं बने
स्थानीय रोजगार खत्म हो गया
जन्नत
जेल बन गई।

🧨 अब भी बचे बड़े नक्सली

अब भी जंगल में हैं—
मिसिर बेसरा (1 करोड़ इनामी)
मेहनत उर्फ मोछू
सागेन अंगारिया
लेकिन पुलिस का दावा—
“इनका अंत तय है।”
सारंडा अब
नक्सलियों की शरणस्थली नहीं,
उनकी कब्र बनेगा।

🚜 सुधार और विकास का रोडमैप

अब सरकार के सामने
इतिहास का अवसर है।
✅ 1. पर्यटन विकास
सारंडा इको-टूरिज्म
ट्रेकिंग रूट
जंगल सफारी
स्थानीय युवाओं को गाइड
✅ 2. खनिज आधारित रोजगार
स्थानीय युवकों को प्राथमिकता
स्किल ट्रेनिंग
छोटे उद्योग
✅ 3. शिक्षा और स्वास्थ्य
आवासीय विद्यालय
आईटीआई
मोबाइल अस्पताल
✅ 4. आदिवासी संस्कृति का संरक्षण
सरना स्थल
पर्व–त्योहार
हस्तशिल्प बाजार

📢 संदेश साफ है

अब सारंडा में—
🔥 बंदूक नहीं
📚 किताब चलेगी
🚜 रोजगार चलेगा
🇮🇳 तिरंगा चलेगा

✍️ इतिहास का निर्णायक मोड़

2001 से 2026 तक सारंडा ने—
खून देखा
डर देखा
आतंक देखा
बेरोजगारी देखी
लेकिन
17 नक्सलियों की मौत ने
इतिहास बदल दिया।
ग्रामीणों का जश्न
यह संकेत है कि—
सारंडा अब नक्सलवाद नहीं, विकास चाहता है।
अब सवाल सरकार से है—
क्या वह इस मौके को विकास में बदलेगी?
या फिर इतिहास खुद को दोहराएगा?

“जहां कभी गोलियां गूंजती थीं, अब रोजगार गूंजेगा —
सारंडा बदलेगा, झारखंड बदलेगा!”

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सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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