खतरे में अमेरिका की बादशाहत, चीन-भारत ने खेल दिया बड़ा ‘आर्थिक खेल’
रिपोर्ट शैलेश सिंह।
दुनिया की आर्थिक व्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां से इतिहास की दिशा बदलती दिखाई दे रही है। सोने की कीमतों में लगातार हो रही रिकॉर्डतोड़ बढ़ोतरी और डॉलर की गिरती साख केवल बाजार का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि वैश्विक सत्ता संतुलन में हो रहे बड़े बदलाव का संकेत है।
विशेषज्ञ इस प्रक्रिया को ‘डी-डॉलराइजेशन’ (De-dollarization) कह रहे हैं, यानी दुनिया अब अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता खत्म करने की ओर बढ़ रही है।
बीते एक साल में डॉलर की वैल्यू में करीब 11 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, जबकि सोने की कीमतों में 15 प्रतिशत से ज्यादा उछाल आया है। यह बदलाव अमेरिका की आर्थिक बादशाहत पर सीधा सवाल खड़ा कर रहा है।

डॉलर की गिरती साख से उड़ी अमेरिका की नींद
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, जो हमेशा ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति की बात करते रहे हैं, डॉलर की गिरती पकड़ से सबसे ज्यादा परेशान नजर आ रहे हैं। ट्रम्प ने पहले ही चेतावनी दी है कि जो देश डॉलर छोड़कर दूसरी मुद्राओं में व्यापार करेंगे, उन पर सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाएंगे।
ट्रम्प इसे अमेरिका के खिलाफ वैश्विक साजिश करार देते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि दुनिया अब डॉलर को उतना सुरक्षित नहीं मानती जितना पहले मानती थी।
ब्रेटन वुड्स से डॉलर की बादशाहत तक
दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1944 में हुए ब्रेटन वुड्स समझौते के तहत डॉलर को वैश्विक मुद्रा का दर्जा मिला।
1971 तक अमेरिका यह गारंटी देता था कि हर डॉलर के बदले सोना मिलेगा।
लेकिन बाद में अमेरिका ने यह व्यवस्था खत्म कर दी और पूरी दुनिया को कागजी डॉलर पर निर्भर बना दिया।
यहीं से अमेरिका की आर्थिक ताकत कई गुना बढ़ी।
कभी 80% व्यापार डॉलर में, अब घटकर 54%
एक समय दुनिया का करीब 80 प्रतिशत व्यापार डॉलर में होता था।
अब यह आंकड़ा घटकर 54 प्रतिशत रह गया है।
ब्रिक्स देशों द्वारा अपनी मुद्रा में व्यापार और चीन द्वारा युआन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देना अमेरिका के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है।
US बॉन्ड से पैसा निकाल रहे देश
अब तक दुनिया के देश अमेरिका को सबसे सुरक्षित मानकर अपना पैसा US Bonds (अमेरिकी सरकारी बॉन्ड) में निवेश करते थे।
लेकिन अब वही देश अपने पैसे वापस खींच रहे हैं।
नवंबर 2024 से नवंबर 2025 के बीच बिके US बॉन्ड:
देश और बेचे गए बॉन्ड (रुपये में)
चीन
7.91 लाख करोड़
ब्राजील
5.6 लाख करोड़
भारत
4.36 लाख करोड़
हांगकांग
90 हजार करोड़
आयरलैंड
25 हजार करोड़
ये आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका पर से भरोसा उठ रहा है।
डॉलर छोड़, सोने की ओर दौड़
सवाल उठता है कि बॉन्ड बेचकर मिले डॉलर का आखिर हो क्या रहा है?
जवाब है – सोना खरीदा जा रहा है।
दुनियाभर के केंद्रीय बैंक अब कागजी डॉलर की जगह ठोस सोने पर भरोसा जता रहे हैं।
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी अब 15 प्रतिशत के पार पहुंच चुकी है।
भारत और चीन का आक्रामक कदम
भारत:
2021 से 2025 के बीच 1,26,000 किलो सोना खरीदा
चीन:
पिछले 4 वर्षों में 3,50,000 किलो से ज्यादा सोना जमा
यह केवल निवेश नहीं, बल्कि रणनीतिक तैयारी है।
रूस-यूक्रेन युद्ध बना टर्निंग पॉइंट
इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण रूस-यूक्रेन युद्ध माना जा रहा है।
जब अमेरिका ने रूस के डॉलर रिजर्व को फ्रीज कर दिया, तो पूरी दुनिया को एक संदेश मिला कि:
डॉलर अब सिर्फ मुद्रा नहीं, बल्कि हथियार है।
देशों को समझ आ गया कि अमेरिका जब चाहे किसी भी देश की संपत्ति रोक सकता है।
लेकिन सोने को कोई फ्रीज नहीं कर सकता।
सोना बना सबसे सुरक्षित संपत्ति
आज शेयर बाजार और डॉलर की तुलना में सोने पर ज्यादा भरोसा किया जा रहा है।
केंद्रीय बैंक लगातार सोना खरीद रहे हैं, जिससे कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में सोना वैश्विक अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत आधार बनेगा।
अमेरिका की सुपरपावर छवि पर खतरा
डॉलर की ताकत ही अमेरिका की असली ताकत रही है।
यदि डॉलर कमजोर हुआ तो:
अमेरिका को सस्ता कर्ज मिलना बंद होगा
उसकी प्रतिबंध लगाने की ताकत घटेगी
वैश्विक राजनीति में पकड़ कमजोर होगी
उसकी सुपरपावर छवि धूमिल होगी
यही कारण है कि अमेरिका इस बदलाव से घबराया हुआ है।
डी-डॉलराइजेशन का असर आम आदमी पर
यह केवल वैश्विक राजनीति का मुद्दा नहीं है।
इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा।
यदि यह प्रक्रिया तेज होती है तो:
पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे
आयातित सामान की कीमत बढ़ेगी
सोना-चांदी और महंगे होंगे
शेयर बाजार में अस्थिरता बढ़ेगी
वैश्विक व्यापार के नियम बदलेंगे
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में:
व्यापार स्थानीय मुद्राओं में होगा
डॉलर का वर्चस्व कमजोर पड़ेगा
सोना फिर से आर्थिक आधार बनेगा
दुनिया एक नई आर्थिक व्यवस्था की ओर बढ़ रही है।
भारत के लिए अवसर या चुनौती?
भारत के लिए यह स्थिति दोधारी तलवार जैसी है।
एक ओर भारत अपने सोने के भंडार से मजबूत हो रहा है, दूसरी ओर डॉलर की कमजोरी से आयात महंगा हो सकता है।
लेकिन लंबी अवधि में भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को इसका फायदा मिल सकता है।
इतिहास करवट ले रहा है
सोने की चमक और डॉलर की गिरती साख सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि इतिहास की करवट हैं।
दुनिया अब अमेरिकी डॉलर के मोहपाश से निकलने की कोशिश कर रही है।
यदि यह प्रक्रिया जारी रही तो आने वाले समय में:
सोना राजा बनेगा और डॉलर रंक।
और अमेरिका की वह आर्थिक बादशाहत, जो दशकों से डॉलर पर टिकी थी, धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जाएगी।














