रिपोर्ट: शैलेश सिंह
बिहार के भोजपुर जिले की तरारी विधानसभा सीट (संख्या-196) सिर्फ़ एक राजनीतिक भूगोल नहीं, बल्कि संघर्ष, विचारधारा, किसान-आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन की जीवंत प्रयोगशाला रही है। खेत-खलिहान, किसान-मज़दूर संघर्ष, जातीय परिवर्तन और युवा आकांक्षा — यही तरारी का असली परिचय है। इस बार चुनावी हवा में इतिहास और भविष्य दोनों टकराते दिख रहे हैं।

कहां बसता है तरारी — भूगोल, जनसांख्यिकी और पंचायतें
तरारी विधानसभा भोजपुर जिले के दक्षिण-पश्चिम छोर पर स्थित ग्रामीण इलाका है।
- जिले: भोजपुर
- प्रमुख प्रखंड: तरारी, पिरो, अगिआंव
- गांवों की संख्या: लगभग 150+
- मुख्य पंचायतें: तरारी, सहार, अगिआंव, धनहा, बभनगांवा, बसंतपुर, खम्हरिया आदि
- जातीय संरचना: यादव, पासवान, भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, कुर्मी, मुसहर व अल्पसंख्यक समुदाय
यहां का समाज परंपरागत कृषि-आधारित है। भूमिहीन मज़दूरों की बड़ी आबादी और सीमांत किसानों का दर्द आज भी चुनावी मुद्दों में दर्ज होता है।
जनसंख्या और वोटरों का गणित
- कुल मतदाता: लगभग 3.10 लाख
- पुरुष मतदाता: ~1.68 लाख
- महिला मतदाता: ~1.42 लाख
- युवा वोटर: लगभग 62 हजार (18–29 आयु वर्ग)
- अल्पसंख्यक मतदाता: ~12–14%
- दलित-महादलित वोट: ~22–25%
- ओबीसी-अति पिछड़ा: निर्णायक 50%+
तरारी में वर्ग-आधारित वोट और विचारधारा दोनों मिलकर चुनावी तस्वीर बनाते हैं। यादव-पासवान-अति पिछड़ा वर्ग वामपंथी संगठन का पारंपरिक आधार रहा, वहीं भूमिहार-राजपूत-वैश्य वर्ग भाजपा का कोर समर्थन माना जाता है।
इतिहास — किसान संघर्ष, नक्सल प्रभाव और वाम राजनीति
तरारी सिर्फ़ विधानसभा नहीं, बिहार में वाम आंदोलन का प्रतीक है।
- सहार-तरारी बेल्ट में 70-80 के दशक में किसान-मज़दूर आंदोलन चरम पर रहा
- भूमि-संघर्ष, मजदूरी विवाद और सामाजिक न्याय की लड़ाई ने राजनीति का चेहरा बदला
- नक्सल प्रभाव वामपंथ के जनाधिकार आंदोलन के साथ जुड़ता रहा
यहां विचारधारा की जड़ें इतनी गहरी हैं कि चुनाव सिर्फ़ सत्ता नहीं — सामाजिक व वैचारिक प्रतिनिधित्व के रूप में देखा जाता है।
आज का सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य
खेती: समस्या और संभावनाएं
सरकार की योजनाओं के बावजूद खेती आज भी बारिश और निजी साधनों पर निर्भर है।
- नलकूप व नहरों की कमी
- सिंचाई लागत अधिक
- मंडी व्यवस्था कमजोर
- पशुपालन और डेयरी की क्षमता अधूरी
युवाओं का पलायन
तरारी का हर गांव मजदूरी और रोज़गार के लिए दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, गुजरात और मुंबई की ओर प्रवास करता है।
शिक्षा और स्वास्थ्य
- सरकारी स्कूलों में शिक्षक-संख्या कम
- प्राइवेट स्कूलों पर निर्भरता
- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टर की कमी
- गंभीर मरीजों को आरा / पटना रेफर
सुरक्षा और कानून-व्यवस्था
बीते दशक में नक्सल प्रभाव कमजोर पड़ा है, मगर जमीन-विवाद, बाज़ार व पंचायत वर्चस्व की झड़पें समय-समय पर होती रहती हैं।
📞 नेटवर्क — टावर आए, सिग्नल अभी यात्रा में
मोबाइल-डेटा का हाल ऐसा जैसे नेता की ईमानदारी— कभी-कभार दिख जाता है, अक्सर गायब।
युवाओं का दर्द—
“रील बनावल बा, अपलोड ना होला!”
स्थानीय मुद्दे — चुनाव किन सवालों पर
❶ किसानों को सिंचाई और कृषि उपज का मूल्य
❷ युवाओं को नौकरी, कोचिंग-सुविधा और स्किल डेवलपमेंट
❸ स्वास्थ्य केंद्रों को सशक्त करना
❹ सड़कों और पुल-पुलियों का विस्तार
❺ गांवों में साफ पेयजल और नलकूप
❻ महिला सुरक्षा और छात्राओं के लिए परिवहन
❼ पंचायत-स्तर पर भ्रष्टाचार और आवास घोटाले
2024 उपचुनाव में क्या हुआ?
2024 उपचुनाव ने तरारी की राजनीति की दिशा बदल दी।
- BJP उम्मीदवार विशाल प्रशांत की जीत
- CPI(ML) के राजू यादव दूसरे स्थान पर
- वोट अंतर ~10–12 हजार
- मतदान ~52%
इसने संकेत दिया कि तरारी में वैचारिक राजनीति के साथ संसाधन और संगठन भी निर्णायक हो गए हैं।

प्रमुख उम्मीदवारों का परिचय और हैसियत
1️⃣ विशाल प्रशांत — BJP
- युवा चेहरा, संसाधन और संगठन का मजबूत सपोर्ट
- संपत्तियों में अच्छी स्थिति, शैक्षिक योग्यता इंटर
- कोई बड़ा क्रिमिनल केस नहीं
- संदेश: विकास + सत्ता का लाभ + युवा नेतृत्व
2️⃣ मदन सिंह चन्द्रवंशी — CPI(ML)
- वामपंथी आइकॉन, किसान-मज़दूर आधार
- जनता में मजबूत वैचारिक नेटवर्क
- छात्र राजनीति से उभरे
- संदेश: जमीन-किसान हक, न्याय, गरीबों की आवाज़
चुनावी चेहरे
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उम्मीदवारों के नाम पार्टी विशाल प्रशांत बीजेपी मदन सिंह चंद्रवंशी सीपीआई (एमएल) (एल) चंद्रशेखर सिंह जन सुराज पार्टी संजय कुमार शर्मा आम आदमी पार्टी - सामाजिक संतुलन साधने और सीमांत वोट बटोरने की कोशिश
जातीय समीकरण — कौन किसके साथ
- यादव + दलित + मुसहर + गरीब किसान: CPI(ML) आधार
- भूमिहार + राजपूत + व्यापारी तबका: BJP समर्थन
- अति पिछड़ा एवं युवा वर्ग: फ्लोटिंग वोट — निर्णायक भूमिका
चुनावी माहौल — जमीन की सच्चाई
चाय-दूकानों, चौपालों और खेतों की मेड़ों पर चर्चा साफ है —
- “काम कौन देगा?”
- “सिंचाई कब सुधरेगी?”
- “पलायन कब रुकेगा?”
- “गरीब-किसान की सुनवाई कहाँ?”
युवाओं में गुस्सा भी है और उम्मीद भी। पहली बार वोट देने वाले युवा “पार्टी नहीं, काम” की बात करते दिखते हैं।

तरारी का भविष्य क्या कहता है?
यहाँ की राजनीति अब तीन ध्रुव पर टिकी है —
- वाम वैचारिक आधार
- भाजपा का संगठन एवं संसाधन
- युवा भविष्य-दृष्टि और रोजगार की भूख
जो उम्मीदवार कृषि-आधारित उद्योग, कौशल-प्रशिक्षण, स्वास्थ्य-संरचना और स्थानीय रोज़गार मॉडल देगा — भविष्य उसी का।
नतीजा — तरारी सिर्फ़ सीट नहीं, संदेश है
तरारी चुनाव बताता है कि —
- जनता विचारधारा को सम्मान देती है
- लेकिन काम, रोजगार और भविष्य आज की पहली शर्त है
- यहां की जनता चुप रहती है, लेकिन मतदान में जवाब देती है
तरारी का यह चुनाव साबित करता है —
विचारधारा का किला भी बदलते समय और युवा सपनों के सामने चुनौती महसूस कर रहा है।
जो ताकत जनता का विश्वास, गांव-की-मिट्टी और किसान-युवा की उम्मीद जीत लेगी — तरारी की बागडोर उसी के हाथ में होगी।
अंतिम पंक्ति
तरारी आज इतिहास नहीं लिख रहा — इतिहास और भविष्य के बीच पुल बन रहा है।















