जनता बोली— “बिहार की राजनीति में “लालटेन” को अब LED चाहिए” राजद के सपने ध्वस्त, एनडीए की रणनीति सटीक; महागठबंधन अंदर से टूटा या जमीन से कट गया?
रिपोर्ट शैलेश सिंह।
बिहार की राजनीति में एक बार फिर वही हुआ, जो पिछले दो चुनावों से होता आया है—राजद ने हवा में ऊँची-ऊँची बातें कीं, महागठबंधन ने जातीय गणित के किले खड़े किए, और बीजेपी-एनडीए ने उन किलों में इतना छेद किया कि पूरा महागठबंधन पानी समा गया। इस चुनाव ने साफ कर दिया कि…

बिहार में राजनीति ट्विटर से नहीं, टेंपो स्टैंड और चौपाल से चलती है।
महागठबंधन अपने ही दावों की धूप में पिघल गया और एनडीए की संगठित रणनीति, माइक्रो मैनेजमेंट, नेतृत्व और स्टार प्रचारकों की धारदार रैलियों ने नतीजों को एकतरफा बना दिया।
महागठबंधन की हार क्यों? — समीक्षात्मक विश्लेषण
1. महागठबंधन में नेतृत्व संकट: “हम जीतेंगे” से ज्यादा “कौन जीतेगा?” में समय गया
राजद के युवा नेतृत्व ने तो सोशल मीडिया पर तुफान खड़ा कर दिया— “बिहार बदलेगा”, “नौकरी देंगे”, “दस लाख नौकरी”, पर जनता ने सवाल किया— “बाबू, पिछली बार का हिसाब?”
कांग्रेस जमीन ढूंढती रह गई, वाम दल भाषणों में फंसे रहे। पूरा गठबंधन ऐसे चल रहा था जैसे एक गाड़ी को तीन ड्राइवर अलग-अलग दिशाओं में मोड़ रहे हों।
2. जातीय समीकरणों की गलतफहमी — महागठबंधन ने सोचा, जाति जोड़ने से वोट जुड़ जाएंगे
महागठबंधन का भरोसा परंपरागत MY (मुस्लिम-यादव), दलित-पिछड़ा समीकरण पर ही अटका रह गया। सुना था “नया बिहार”, पर चला “पुराना फॉर्मूला”।
लेकिन इस बार मैदान बदला था।
इन जातीय समीकरणों ने महागठबंधन को किया कमजोर—
- पसमांदा मुस्लिम बड़े पैमाने पर अलग हुए
- यादव वोट कुछ जगहों पर बंट गया
- कुर्मी, कुशवाहा, नोनिया, मल्लाह जैसे OBC समूहों ने खुलकर NDA के पक्ष में रुझान दिखाया
- अति पिछड़ा वर्ग (EBC) पूरी तरह NDA की ओर खिसक गया
- महादलित वर्ग को राजद-कांग्रेस की राजनीति सिर्फ वादा लगने लगी
महागठबंधन जातीय जोड़-घटाव में उलझा रहा, NDA जातीय गुणा-भाग में खेल जीत गया।
एनडीए की संगठित रणनीति — booth-level से लेकर big-stage तक सब कुछ सेट
एनडीए ने इस चुनाव में फिर साबित किया कि चुनाव रात में होने वाली रैली से नहीं, बूथ पर तैनात 10 कार्यकर्ताओं से जीता जाता है।
हर विधानसभा में
- पन्ना प्रमुख,
- घंटे-घंटे की रिपोर्टिंग,
- मोबाइल मैसेजिंग,
- महिला मतदाताओं तक सीधी पहुंच, ने NDA को एक मजबूत संरचना दी।
महागठबंधन के पास न ऐसी मशीनरी, न ऐसा अनुशासन।

एनडीए के स्टार प्रचारक: जिसका भाषण पड़ा, मैदान साफ़ हुआ
इस बार बिहार में एनडीए की सबसे बड़ी ताकत थी उसका प्रचार अभियान, जिसे तीन-चार चेहरों ने रफ्तार दे दी:
1. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी — “जाति से बड़ा है विकास” वाला नैरेटिव बैठा दिया
मोदी की रैलियों में एक लाइन सबसे ज्यादा चली—
“बिहार जाति से ऊपर उठकर विकास को वोट देगा।”
और सचमुच जनता ने जाति की राजनीति को इतना हिलाया कि कई विंध्याचल वाले समीकरण बैठ ही नहीं पाए। मोदी ने बेरोजगारी, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों को तो उठाया ही, लेकिन महागठबंधन की वादे वाली राजनीति पर चोट कर दी—
“दस लाख नौकरी देने वाले क्या अपनी पार्टी में 10 अच्छे नेता लगा पाए?”
भीड़ तालियाँ बजाती रही, और राजद की टीम नोट्स बनाती रह गई।
2. अमित शाह — “जातीय समीकरण के डॉक्टर”
अमित शाह जहाँ भी गए, वहाँ बहुस्तरीय जातीय गोलबंदी की रणनीति जम गई।
उनकी लाइन बहुत सुर्खियों में रही—
“तेजस्वी यादव को लगे कि बिहार सिर्फ दो जातियों का राज्य है, पर बिहार 200 जातियों का है और हम सबका सम्मान करते हैं।”
यह एक तीर में दो निशाने थे— जातीय राजनीति पर चोट और EBC-Mahadalit को साधना।
3. जेपी नड्डा और सीएम नीतीश कुमार — विकास बनाम वादाखोरी
नीतीश कुमार मैदान में देर से उतरे, पर उतरे तो बड़ी सफाई से।
उनका एक बयान खूब वायरल हुआ—
“काम हमारा, क्रेडिट कोई और ले जाता है। जनता सब जानती है।”
उनकी सभाओं में महिलाएँ सबसे ज्यादा दिखीं। इसने परिणामों को गहराई से प्रभावित किया।
4. युवा स्टार— योगी जी, रविशंकर प्रसाद, गिरिराज सिंह, पवन सिंह, संजय जायसवाल, नितिन नवीन
इन नेताओं ने मीडिया, सोशल मीडिया और मैदान— तीनों पर महागठबंधन को पूरी तरह बैकफुट पर रखा।
योगी जी का बयान— “बटेंगे तो करेंगे”, सीधा जनता की नब्ज पर चोट कर गया।
गिरिराज सिंह का बयान— “राजद के राज में अपराधियों का बोलबाला था, अब बिहार डरता नहीं—दिखाई देता है।”
पवन सिंह का बयान— “…हई बोलता बिहार, सुनी पवन के पुकार… बम्फर जीत होई…जोड़ी मोदी और नीतीश जी के हिट होई…
महागठबंधन का “विकास मॉडल” जनता को नहीं समझ आया
1. रोजगार का वादा — “लगातार दो चुनाव से वही बात”
तेजस्वी यादव ने 10 लाख नौकरियों का वादा दोहराया। जनता ने पूछा—
“एक बार झांसे में आ गए थे, अब दूसरा मौका क्यों दें?”
कांग्रेस ने 5 लाख नौकरी, वाम दलों ने पूरी सरकारी व्यवस्था बदलने का दावा किया। पर जनता ने साफ कहा—
बिहार को नौकरी नहीं, स्थिरता चाहिए।
2. राजद पर भरोसा करने में जनता हिचकी
हर जनसभा में भीड़ खूब थी, पर वोट NDA के हिस्से में ज्यादा गए।
यह परंपरागत बिहार चुनाव की सच्चाई है—
राजद की रैली में भीड़ मुफ्त मिलती है, मतदान में नहीं।
क्योंकि
- अपराध का पुराना रिकॉर्ड,
- भ्रष्टाचार की छाप,
- परिवारवाद का आरोप इन सबने युवा और महिलाओं को महागठबंधन से काट दिया।
ग्राउंड रिपोर्ट — जनता का मूड पहले से ही NDA की ओर झुका था
1. महिलाओं की चुप्पी NDA के लिए ‘मौन समर्थन’ निकली
सिलेंडर, राशन, स्कूल, सड़क— इन सब पर महिलाओं का मूड साफ था—
“चेहरा भले कोई भी हो, सरकार बदलने का मन नहीं।”
महागठबंधन ने महिलाओं की नब्ज नहीं पकड़ी, NDA ने इस बहुमत को कैश कर लिया।
2. युवा वोटर्स— सोशल मीडिया का शोर, बूथ पर सन्नाटा
युवा सोशल मीडिया पर राजद के लिए आग उगल रहे थे, पर बूथ पर लाइन में खड़े दिखे NDA के लिए।
क्यों?
क्योंकि
- प्रतियोगी परीक्षाएँ
- पुलिस भर्ती
- शिक्षक नियुक्ति जैसे मुद्दों पर युवा NDA के स्थिर शासन को ज्यादा बेहतर मानते दिखे।
3. महागठबंधन की सबसे बड़ी भूल — ग्रामीण इलाकों की अनदेखी
राजद-कांग्रेस ने शहरी रैलियाँ ज्यादा कीं, पर हार गाँवों में मिली।
NDA ने
- पंचायत
- टोला
- हर चौपाल में लगातार काम किया।
चुनाव रैली से नहीं, माइक्रो लेवल पर जीता गया।
व्यंग्यात्मक टिप्पणी — बिहार की राजनीति में “लालटेन” को अब LED चाहिए
राजद को अब समझना पड़ेगा कि लालटेन से चुनाव लड़ने का दौर खत्म हो चुका है।
समय मोबाइल चार्जर का है, 4G-5G नेटवर्क का है, और बिहार का वोटर अब “भाषण” नहीं, “परफॉर्मेंस” पर वोट करता है।
तेजस्वी यादव की राजनीति अब भी पुराने ढर्रे पर चल रही है— वो सोचते हैं भीड़ = जीत। पर बिहार ने दिखा दिया— भीड़ नहीं, भरोसा जीतता है।
कांग्रेस तो वैसे ही विमान में बैठकर प्रचार करती रही, जमीन पर तो सिर्फ NDA दिखा।
बिहार की राजनीति का नया अध्याय लिख दिया गया है। महागठबंधन, खासकर RJD, इतनी जोरदार तरीके से हारा कि पार्टी मुख्यालय तक में सन्नाटा ऐसा था मानो किसी ने अनाउंसमेंट कर दिया हो— “मतगणना समाप्त। कारण: रणनीति की अकाल मृत्यु।”
NDA ने न केवल जीत का परचम लहराया बल्कि अपने स्टार प्रचारकों की बदौलत मतदान केंद्रों तक ऐसा माहौल बना दिया कि जनता बोली— “भईया, वोट तो हम मुद्दों पर देंगे, लेकिन बोलने वाला दमदार होना चाहिए!”
इस चुनाव में सबसे बड़ा फैक्टर था— NDA का आक्रामक प्रचार + महागठबंधन की आत्मसंतुष्टि + जातीय समीकरणों का नया खेल।
आइए पूरी कहानी पर नज़र डालते हैं…
STAR CAMPAIGNERS: भाषण जो सोशल मीडिया और गांव दोनों में गूंजे
मोदी का मंत्र — “डबल इंजन नहीं, ट्रिपल भरोसा”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार में दर्जनों रैलियां कीं और हर रैली में उनका वही स्टाइल — आवाज़ ऊँची, तंज़ तीखा, और जनता को सीधे दिल में उतरने वाली लाइनें।
उनकी एक लाइन पूरे चुनाव में हिट रही— “बिहार को विकास चाहिए, प्रयोग नहीं।”
यह लाइन इतनी चली कि महागठबंधन के कई उम्मीदवारों ने कहा— “हमारे क्षेत्र में प्रयोग तो जनता ने हम पर किया, और रिज़ल्ट NDA ले गया!”
मोदी की रैलियाँ भीड़ से कम, कैमरामैन की संख्या से ज्यादा मशहूर रहीं। लेकिन वोट तो पड़ ही गया।
अमित शाह का जातीय गणित — “कोई जोड़ नहीं, बस बड़ा समीकरण”
गृहमंत्री अमित शाह ने चुनाव को कैस्ट कैलकुलेटर मोड पर डाल दिया।
उनकी रैली में अक्सर सुनाई देता— “बिहार जातियों का राज्य नहीं, जनतंत्र का राज्य है।” और जनता मन ही मन कहती— “पर आपका आंकड़ा भी जाति से ही निकलता है।”
शाह ने यादव, कुर्मी, कुशवाहा, दलित, महादलित, सवर्ण—सबके लिए अलग-अलग संदेश दिए। उनकी रणनीति साफ थी: “हर जाति को लगना चाहिए कि हम उसी के साथ हैं।”
महागठबंधन यह समझ ही नहीं पाया कि मुकाबला भावना बनाम गणित का है—और इस बार गणित जीत गया।
नितीश कुमार का शांत प्रचार — कम बोलने में भी काम पूरा
चुनाव प्रचार में नितीश कुमार पहले जितना शोर नहीं करते, पर उनकी शांत उपस्थिति भी संदेश दे देती है:
“काम हमने किया, बात आप करिए।”
उनकी सभाओं में ग्रामीण महिलाएँ बताती रहीं कि—
- शराब बंदी
- सड़क
- बिजली
- योजनाओं का लाभ
इन सबका असर वोट में देखने को मिला।
राजद जहां हर सभा में ‘भावना’ बेच रहा था, नितीश लाभार्थी राजनीति का बैंक लिए घूम रहे थे।
और लाभार्थी ATM कार्ड लेकर आए— वोट डालने!
महागठबंधन का प्रचार—तंज़ ज्यादा, एजेंडा कम
महागठबंधन की सबसे बड़ी समस्या ये थी कि ये मान बैठा कि जनता NDA से नाराज़ है और बस नाराज़गी की लहर उन्हें सत्ता में बहा ले जाएगी। पर जनता याद रखती है कि नाराज़गी का मतलब समर्थन नहीं होता।
सभाएँ कुछ ऐसे दिखती थीं—
- 30 मिनट NDA पर हमला
- 20 मिनट पुराने वादे
- 10 मिनट भविष्य का vague प्लान
- और अंत में “नौकरी देंगे” का भरोसा
वहीं NDA सीधे बोल रहा था— “काम दिखा है, इसलिए वोट दो।”
जातीय समीकरण जोड़ी मजबूत, महागठबंधन का टूट गया तिलिस्म
बिहार चुनाव में जब तक जातीय गणित न समझा जाए, तब तक परिणाम समझना असंभव है।
1. यादव वोट—राजद का पारंपरिक वोट कम हुआ
RJD की रीढ़ कहे जाने वाले यादव वोट बैंक का एक हिस्सा इस बार खुलकर NDA की ओर गया। क्यों?
- टिकट बंटवारे में परिवारवाद
- स्थानीय नेतृत्व की उपेक्षा
- युवाओं की बेरोजगारी पर अस्पष्टता
- आक्रामक बयानबाज़ी से दूरी
युवा यादव मतदाता बोला— “वोट परंपरा से नहीं, भविष्य से देंगे।”
2. कुशवाहा + कुर्मी—NDA के खाते में गए
ये OBC वर्ग इस बार मजबूती से NDA के साथ गया। कारण:
- उपेंद्र कुशवाहा का NDA के पक्ष में माहौल
- नितीश का OBC बेस
- BJP की रणनीति
महागठबंधन ने इन जातियों को साधने में कोताही कर दी।
3. दलित–महादलित—लाभार्थी वर्ग NDA के साथ
लाभुक योजनाओं के कारण यह वर्ग NDA का स्थायी वोट बैंक बन चुका है। राजद ने 90 दशक की शैली में राजनीति की, जबकि चुनौतियाँ 2025 की थीं।
4. सवर्ण—सीधे-सीधे BJP की झोली में
यह वर्ग लगभग एकतरफा NDA को मिला। RJD के खिलाफ 15 साल की नाराज़गी अभी भी बनी हुई है।
महागठबंधन की “हार के बहाने”—अब जनता को याद हो गए हैं
चुनाव हारते ही RJD और सहयोगी दलों ने पुराने रिकॉर्ड निकाल लिए—
- “EVM खराब है।”
- “मीडिया ने भ्रम फैलाया।”
- “चुनाव आयोग पक्षपाती।”
- “सब कुछ सेटिंग था।”
जनता ने ये सुनकर मुस्कुराते हुए कहा— “नतीजे खराब हों तो मशीन दोषी? और जीत जाएँ तो जनता समझदार?”

राजनीति की ये गणित जनता से नहीं छिपती।
राजद की दूसरी गलती—युवाओं के मुद्दों को गंभीरता से न लेना
RJD ने चुनावी रैली में बार-बार नौकरी का वादा किया, पर जब युवाओं ने पूछा— “कब? कैसे?” तो जवाब में या तो कविता मिली, या भाषण।
NDA ने जो कहा वो दिया—
- लाभार्थी योजनाएँ
- सरकारी स्कॉलरशिप
- आधारभूत सुविधाएँ
राजद सिर्फ बोलता रहा, NDA करता रहा। युवा मतदाता ने फैसला कर दिया।
चुनाव प्रचार में STAR बनाम SCRIPT—NDA जीता
महागठबंधन की कहानी ऐसी थी कि पहले पेज पर नायक मर जाता था और बाकी कहानी जनता को खुद समझनी पड़ती थी।
NDA की कहानी तैयार थी—
- स्टार कास्ट
- सही संवाद
- मजबूत स्क्रिप्ट
मोदी के मंच से लेकर शाह के रोडमैप तक सब कुछ योजनाबद्ध। महागठबंधन का प्रचार भावनात्मक नाटक बन गया, NDA का प्रचार पॉलिटिकल शो।
और दर्शक—यानी जनता—ने टिकट खरीदकर NDA की फिल्म देखी।
बड़े नेताओं की सभाएँ—जहां भीड़ अधिक, वोट कम!
राजद की रैलियों में भीड़ खूब दिखी, लेकिन बिहारी जनता का एक पुराना सिद्धांत है— “रैली में भीड़ आंदोलन की, वोट विकास की।”
युवाओं ने सेल्फी ली, नेता को सुना, वीडियो बनाए, पर EVM में NDA बटन दबाया।
NDA की जीत—क्यों हुई इतनी मजबूत?
- लाभार्थी योजनाएँ
- जमीनी संगठन
- मजबूत प्रचार
- मजबूत नेतृत्व
- जातीय समीकरण
- विपक्ष की भ्रमित रणनीति
मोदी-शाह की जोड़ी और नितीश का अनुभव—यह संयोजन महागठबंधन की कल्पना से भी बड़ा साबित हुआ।

राजद/महागठबंधन की हार जनता की चेतावनी, राजनीति की नई दिशा
यह हार बिहार में एक बड़ा संदेश देती है—
“भावुक भाषण जिताते नहीं, ठोस काम जिताता है।” “संघर्ष की कहानी हर बार काम नहीं करती।” “जातियों का तिलिस्म टूट चुका है, नए समीकरण बन रहे हैं।”
महागठबंधन चाहे जितने बहाने बनाए, सच्चाई साफ है— जनता ने इस बार गंभीरता से वोट दिया, और वोट NDA को मिला, क्योंकि जनता स्थिरता, काम और स्पष्ट नेतृत्व चाहती है।















