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⚔️ “हमारी जमीन पर खदान, लेकिन हमारे बच्चों को बेरोजगारी?” रांजाबुरु लौह अयस्क खदान पर आदिवासी विस्फोट

On: February 6, 2026 12:38 PM
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CNT–SPT एक्ट और पर्यावरण कानूनों की अनदेखी पर उठे गंभीर सवाल। “नौकरी दो, नहीं तो खदान बंद करो” – सात गांवों का ऐलान

रिपोर्ट: शैलेश सिंह
सेल (SAIL) प्रबंधन द्वारा गुवा क्षेत्र में नई रांजाबुरु लौह अयस्क खदान खोलने की प्रक्रिया शुरू होते ही पूरे इलाके में आक्रोश की आग भड़क उठी है। जिन सात गांवों की जमीन, जंगल, नदी, नाले और जीवन इस खदान से सीधे प्रभावित होंगे, उन्हीं गांवों के बेरोजगार युवकों के लिए आज तक कोई ठोस रोजगार नीति नहीं बनाई गई।
6 फरवरी को कासिया-पेंचा गांव में सामाजिक कार्यकर्ता मंगता सुरीन की अध्यक्षता में हुई विशाल बैठक में कासिया-पेंचा, गंगदा, घाटकुड़ी, जोजोगुट्टू, राजबेड़ा, बाईहातु और तितलीघाट गांवों के मुंडा, ग्रामीण पुरुष और महिलाएं सैकड़ों की संख्या में जुटे और सेल प्रबंधन के खिलाफ खुला एलान कर दिया—
“या तो गांव के युवकों को सौ फीसदी रोजगार दो, या खदान हमेशा के लिए बंद करो।”
यह बैठक केवल रोजगार की मांग नहीं थी, बल्कि इसमें CNT एक्ट, SPT एक्ट और पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन को लेकर गंभीर कानूनी सवाल भी उठाए गए।

🔥 “हमारी धरती पर मुनाफा, हमें सिर्फ जहर?”

ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि सेल प्रबंधन आदिवासियों को केवल जमीन देने वाली मशीन समझ रहा है। खदान से करोड़ों का मुनाफा कमाया जाएगा, लेकिन बदले में गांवों को सिर्फ—
धूल और प्रदूषण
बीमारियां
बेरोजगारी
और विस्थापन
मिलेगा।
ग्रामीणों ने कहा—
“हमारे घरों के पास खदान खुलेगी, हमारी हवा जहरीली होगी, हमारा पानी लाल होगा, हमारे खेत बंजर होंगे और नौकरी बाहर वालों को मिलेगी? यह अन्याय अब नहीं चलेगा।”

⚖️ CNT एक्ट पर सवाल: क्या आदिवासियों की जमीन कानूनन सुरक्षित है?

बैठक में सबसे बड़ा सवाल छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) को लेकर उठा। ग्रामीणों ने कहा कि—
CNT एक्ट आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासियों को हस्तांतरित करने से रोकता है। सवाल यह है कि—
क्या रांजाबुरु खदान के लिए जिन जमीनों का उपयोग किया जा रहा है, वहां ग्रामसभा की लिखित सहमति ली गई है?
क्या जमीन अधिग्रहण में CNT एक्ट की सभी शर्तों का पालन किया गया है?
क्या प्रभावित गांवों के ग्रामीणों को पुनर्वास और मुआवजा मिला है?
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि ग्रामसभा की अनुमति के बिना ही खदान की प्रक्रिया शुरू की गई, जो CNT एक्ट का सीधा उल्लंघन है।

⚖️ SPT एक्ट पर सवाल: संथाल परगना कानून की अनदेखी?

ग्रामीणों ने SPT (Santhal Pargana Tenancy) Act का भी हवाला देते हुए कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में जमीन का उपयोग बिना सामाजिक सहमति के नहीं किया जा सकता।
ग्रामीणों का सवाल है—
क्या रांजाबुरु खदान के लिए ग्रामसभा और मुंडा-मांझी व्यवस्था से अनुमति ली गई?
क्या पारंपरिक आदिवासी स्वशासन प्रणाली को दरकिनार कर निर्णय लिया गया?
बैठक में कहा गया—
“कागजों में विकास और जमीन पर विनाश – यही सरकार और प्रबंधन की नीति बन चुकी है।”

🌱 पर्यावरण कानूनों की अनदेखी: EIA और प्रदूषण नियंत्रण पर सवाल

ग्रामीणों ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986, खनन नियम, और EIA (Environmental Impact Assessment) को लेकर भी तीखे सवाल खड़े किए—
क्या खदान खोलने से पहले पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन (EIA) कराया गया?
क्या जनसुनवाई हुई?
क्या ग्रामीणों को प्रदूषण से बचाव की योजना बताई गई?
ग्रामीणों का आरोप है कि—
खदान से निकलने वाला लौह चूर्ण खेतों में गिरकर जमीन को बंजर बना रहा है।
नदियां और नाले लाल और जहरीले हो चुके हैं।
मवेशी बीमार पड़ रहे हैं।
बच्चों और बुजुर्गों में त्वचा रोग और सांस की बीमारियां बढ़ रही हैं।
उन्होंने कहा—
“यह विकास नहीं, पर्यावरण हत्या है।”

📝 लिखित समझौता नहीं तो संघर्ष तय

बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया—
सेल प्रबंधन ग्रामीण प्रतिनिधिमंडल से तुरंत वार्ता करे।
रांजाबुरु खदान में 100% प्रभावित गांवों के बेरोजगार युवकों को स्थायी व अस्थायी रोजगार दिया जाए।
गांवों में सड़क, पानी, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा की योजनाएं तुरंत शुरू हों।
यह सभी बातें लिखित समझौते (MoU) में दर्ज हों।
CNT–SPT एक्ट और पर्यावरण नियमों का पालन सार्वजनिक रूप से बताया जाए।

⚠️ खुली चेतावनी: “पारंपरिक हथियारों के साथ खदान में घुसेंगे”

बैठक में चेतावनी भरे शब्दों में कहा गया—
“अगर हमारी मांगें नहीं मानी गईं, तो हम आदिवासी पारंपरिक हथियारों के साथ खदान में घुसेंगे और उसे हमेशा के लिए बंद कर देंगे।”
ग्रामीणों ने कहा कि यह संघर्ष केवल रोजगार का नहीं, बल्कि कानूनी अधिकार और अस्तित्व की लड़ाई है।

🗣️ मंगता सुरीन का ऐलान: “यह लड़ाई कानून और सम्मान दोनों की है”

मंगता सुरीन ने कहा—
“CNT एक्ट और SPT एक्ट आदिवासियों की ढाल हैं। अगर इन्हें तोड़कर खदान चलेगी, तो हम अदालत से लेकर सड़क तक लड़ेंगे। एक भी ट्रक बिना हमारी सहमति नहीं चलेगा।”
उन्होंने चेतावनी दी कि आंदोलन को अब कानूनी लड़ाई का रूप भी दिया जाएगा।

 

👩‍🌾 महिलाओं की हुंकार: “हमारे बच्चों का भविष्य मत छीनो”

महिलाओं ने कहा—
“खदान से सबसे ज्यादा असर हमारे परिवारों पर पड़ता है। पानी गंदा, हवा जहरीली और बच्चे बीमार। अगर हमारे बच्चों को नौकरी नहीं मिली तो हम सबसे आगे आंदोलन करेंगी।”

📌 बैठक में शामिल प्रमुख ग्रामीण

बैठक में प्रमुख रूप से—
मुंडा नंदलाल सुरीन, मुंडा कानूराम देवगम, मंगता सुरीन, राजेश साड़ील, सूरदन सुरीन, पवन चांपिया, हरि चांपिया, जादू सुरीन, बामिया सुरीन, साग़ूराम सुरीन, चरण सुरीन सहित सैकड़ों ग्रामीण पुरुष और महिलाएं शामिल थे।

🚩 टकराव की जमीन तैयार

रांजाबुरु खदान को लेकर हालात विस्फोटक हो चुके हैं। एक ओर सेल प्रबंधन खदान खोलने की तैयारी में जुटा है, दूसरी ओर गांव-गांव में आंदोलन की चिंगारी फैल चुकी है। यदि समय रहते वार्ता नहीं हुई और कानून के दायरे में पारदर्शिता नहीं दिखाई गई, तो यह आंदोलन खदान संचालन को पूरी तरह ठप कर सकता है।

❓ सवाल जो प्रबंधन और सरकार से पूछ रहा है गांव

क्या CNT और SPT एक्ट केवल कागजों में हैं?
क्या बिना ग्रामसभा अनुमति खदान चल सकती है?
क्या पर्यावरण नियम सिर्फ आम लोगों के लिए हैं?
क्या आदिवासियों को विकास की कीमत पर कुर्बान किया जाएगा?
ग्रामीणों का कहना है—
“हमारी जमीन पर खदान खुलेगी, तो नौकरी भी हमारे बच्चों को ही मिलेगी।”

⚔️ संघर्ष का नारा: “नौकरी नहीं, तो खदान नहीं”

बैठक के अंत में गांवों ने नारे लगाए—

“हमारी जमीन – हमारा अधिकार”
“CNT एक्ट जिंदाबाद”
“पर्यावरण बचाओ – आदिवासी बचाओ”
“नौकरी दो – खदान चलाओ”
“नौकरी नहीं – खदान नहीं”

✍️ अब यह सिर्फ आंदोलन नहीं, कानूनी लड़ाई है

रांजाबुरु खदान अब केवल औद्योगिक परियोजना नहीं रही, बल्कि यह कानून बनाम पूंजी और आदिवासी अधिकार बनाम कॉरपोरेट सोच की लड़ाई बन चुकी है।
अब फैसला सेल प्रबंधन और सरकार को करना है—
👉 या तो CNT–SPT एक्ट और पर्यावरण कानूनों का सम्मान करे
👉 या फिर आंदोलन और कानूनी संघर्ष का सामना करे
क्योंकि इस बार गांवों ने ठान लिया है—
“हमारे गांव में खदान तभी चलेगी, जब हमारे बच्चों को नौकरी मिलेगी और कानून का पालन होगा।”

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सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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