स्थानीय रोजगार के सवाल पर आदिवासी मंत्रालय की सक्रियता से जागी नई उम्मीद
रिपोर्ट : शैलेश सिंह/संदीप गुप्ता
झारखंड की धरती अपनी गोद में असीमित खनिज संपदा समेटे हुए है — लौह अयस्क, मैगनीज़, कोयला और अन्य खनिज जिनकी चमक से देश की औद्योगिक प्रगति को ऊर्जा मिलती है। पर विडंबना यह है कि इन खदानों की छाया में पले स्थानीय आदिवासी समुदाय आज भी आर्थिक रूप से उपेक्षित हैं। राज्य की खनिज संपदा पर बाहरी कंपनियों का कब्ज़ा है, जबकि यहाँ के मूल निवासी अपने ही संसाधनों से वंचित हैं।

खनिज संपदा, पर अधिकार किसी और का
झारखंड की पहचान उसके जल, जंगल और जमीन से है। सदियों से आदिवासी समाज इन तीनों तत्वों के साथ सहअस्तित्व की जीवनशैली अपनाता आया है। लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है — जंगल कट रहे हैं, जमीन अधिग्रहित हो रही है और खदानों के बीच बसे गांवों में रोजगार के अवसर सिमटते जा रहे हैं।
राज्य के पश्चिम सिंहभूम, सरायकेला-खरसावां, लातेहार, बोकारो और धनबाद जैसे जिलों में खनन कंपनियों की बाढ़ सी आ गई है। इनमें सबसे बड़ा नाम है स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL), जो किरीबुरु, मेघाहातुबुरु और गुवा जैसे क्षेत्रों में लौह अयस्क का खनन करती है।
परंतु यहाँ का कड़वा सच यह है कि जिन पहाड़ों से लौह अयस्क निकाला जा रहा है, वहाँ के युवा रोजगार की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं।
स्थानीयों का रोजगार अधिकार बना संघर्ष का प्रतीक
स्थानीय लोगों की यह लड़ाई अब केवल रोजगार की मांग नहीं रही — यह अब अस्तित्व और अधिकार की लड़ाई बन चुकी है। झारखंड मजदूर संघर्ष संघ लंबे समय से इस मुद्दे को उठा रहा है। संघ के महामंत्री राजेंद्र सिंधिया कहते हैं,
“जब मेडिकल कॉलेजों में राज्य के छात्रों को 85 प्रतिशत आरक्षण दिया जा सकता है, तो उद्योगों में भी यही नियम क्यों नहीं लागू होता? यह धरती, ये संसाधन हमारे हैं — फिर नौकरी बाहरी लोगों को क्यों मिल रही है?”
उनका कहना है कि सेल प्रबंधन हर बार सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देकर स्थानीय भर्ती की मांग को नकार देता है, जबकि संविधान ने सभी नागरिकों को समान अवसर और सम्मान के साथ जीने का अधिकार दिया है।
सेल प्रबंधन पर बाहरी भर्ती का आरोप
स्थानीय संगठनों का आरोप है कि सेल (SAIL) वर्षों से ‘स्थानीयता’ को नजरअंदाज कर बाहरी राज्यों के लोगों की भर्ती कर रहा है। तकनीकी और गैर-तकनीकी पदों पर ज्यादातर नियुक्तियाँ बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और बंगाल से होती रही हैं।
मेघाहातुबुरु और किरीबुरु के ग्रामीण बताते हैं कि खदानों में मजदूरों की भारी मांग होने के बावजूद स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता नहीं दी जाती। ठेका प्रणाली के जरिए काम करवा लिया जाता है, जिसमें मजदूरों को न तो स्थायी दर्जा मिलता है और न ही सुरक्षा।
गुवा क्षेत्र के एक युवा कहते हैं —
“हमारे पिता-पुर्जे इन पहाड़ों के साथ पले-बढ़े, लेकिन अब इन्हीं खदानों में हमें अजनबी बना दिया गया है। यह विकास नहीं, शोषण है।”
संघ की ‘85-15 फार्मूले’ की मांग
झारखंड मजदूर संघर्ष संघ ने बार-बार राज्य सरकार से यह मांग की है कि औद्योगिक क्षेत्र में ‘85-15 फार्मूला’ लागू किया जाए — यानी 85 प्रतिशत नौकरियाँ राज्य के युवाओं के लिए और 15 प्रतिशत केंद्र के लिए आरक्षित हों।
संघ का कहना है कि यदि मेडिकल प्रवेश या सरकारी सेवाओं में यह प्रणाली लागू हो सकती है, तो औद्योगिक नियुक्तियों में क्यों नहीं?
संघ के महामंत्री राजेंद्र सिंधिया ने इस विषय पर कई बार सेल प्रबंधन को ज्ञापन सौंपा। परंतु प्रबंधन हर बार कह देता है कि नियुक्तियाँ केंद्रीय स्तर से होती हैं और स्थानीय कोटा लागू नहीं किया जा सकता।
दिल्ली तक पहुँची आवाज़ — आदिवासी मंत्रालय ने दिखाई गंभीरता
लगातार संघर्ष के बाद यह मुद्दा अब दिल्ली तक पहुँच गया है। हाल ही में किरीबुरु-मेघाहातुबुरु क्षेत्र के सेवास्थंभ सदस्यों का एक प्रतिनिधिमंडल सुनील कुमार पासवान और अफताब आलम के नेतृत्व में आदिवासी अनुसूचित जाति जनजाति मंत्रालय पहुँचा।
प्रतिनिधिमंडल ने मंत्रालय में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की अध्यक्ष डॉ. आशा लकड़ा से मुलाकात की और विस्तार से बताया कि किस तरह खदान क्षेत्र के स्थानीय युवाओं को रोजगार से वंचित रखा जा रहा है।

मुलाकात के दौरान उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि यदि यह स्थिति बनी रही, तो आने वाले समय में क्षेत्र के युवाओं में असंतोष और उग्र आंदोलन की स्थिति पैदा हो सकती है।
डॉ. आशा लकड़ा ने दिलाया समाधान का भरोसा
डॉ. आशा लकड़ा ने पूरे प्रकरण को गंभीरता से सुना और प्रतिनिधिमंडल को आश्वस्त किया कि मंत्रालय इस मुद्दे को राज्य सरकार और सेल प्रबंधन के साथ उठाएगा। उन्होंने प्रतिनिधिमंडल को अपना संपर्क नंबर साझा करते हुए कहा कि वे इस विषय पर समय-समय पर संवाद बनाए रखें।
उनका यह आश्वासन क्षेत्र में उम्मीद की नई किरण बनकर पहुँचा है। पहली बार आदिवासी मंत्रालय ने स्थानीय रोजगार जैसे संवेदनशील विषय पर खुलकर हस्तक्षेप करने का संकेत दिया है।
सरकार और प्रबंधन के बीच टकराव की स्थिति
हालांकि जानकारों का कहना है कि यह मुद्दा केवल मंत्रालय की पहल से हल नहीं होगा। राज्य सरकार को भी इस दिशा में ठोस नीति बनानी होगी।
झारखंड सरकार के कई बार यह कहने के बावजूद कि स्थानीय रोजगार को प्राथमिकता दी जाएगी, अब तक कोई प्रभावी परिणाम नहीं दिखा। राज्य खनिज संपदा से समृद्ध है, लेकिन बेरोज़गारी दर लगातार बढ़ रही है।
स्थानीय संगठनों का आरोप है कि केंद्र संचालित कंपनियाँ राज्य की नीतियों को दरकिनार कर भर्ती करती हैं। इससे सरकार और प्रबंधन के बीच टकराव की स्थिति भी बन रही है।
आर्थिक विकास बनाम स्थानीय शोषण
खनन से झारखंड का राजस्व तो बढ़ता है, लेकिन आदिवासी समाज को उसका वास्तविक लाभ नहीं मिल रहा। गाँवों के रास्ते धूल में बदल चुके हैं, जलस्रोत सूख रहे हैं, और खदानों से उठती धूल व प्रदूषण ने जीवन कठिन बना दिया है।
इसके बावजूद स्थानीय लोगों को रोज़गार नहीं, बल्कि विस्थापन मिला है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर राज्य के खनिज संसाधनों से होने वाले लाभ का 10 प्रतिशत भी स्थानीय विकास में लगाया जाए, तो यहाँ के युवाओं को पलायन करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
आदिवासी युवाओं में नई उम्मीद
आदिवासी आयोग की सक्रियता से क्षेत्र के युवाओं में नई ऊर्जा देखी जा रही है। गुवा, किरीबुरु और मेघाहातुबुरु के कई युवा अब उम्मीद जता रहे हैं कि मंत्रालय के हस्तक्षेप से कुछ ठोस कदम ज़रूर उठाए जाएंगे।
गुवा निवासी एक स्थानीय युवक ने कहा —
“अगर मंत्रालय और सरकार साथ आए, तो हमारी लड़ाई आधी जीत जाएगी। हमें सिर्फ काम चाहिए, दया नहीं।”
क्या अब सच में बदलेगी तस्वीर?
यह सवाल अब भी अनुत्तरित है। वर्षों से संघर्षरत स्थानीय लोग चाहते हैं कि अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस नीति बने।
राज्य सरकार चाहे तो खनन लीज़ की शर्तों में ‘स्थानीय रोजगार’ को अनिवार्य कर सकती है। इसके लिए उद्योग विभाग और श्रम विभाग को संयुक्त रूप से निगरानी प्रणाली बनानी होगी, ताकि बाहरी भर्ती की मनमानी रोकी जा सके।
संघर्ष जारी, लेकिन उम्मीद बरकरार
किरीबुरु-मेघाहातुबुरु क्षेत्र के लोग जानते हैं कि यह लड़ाई आसान नहीं। परंतु जब आदिवासी मंत्रालय ने खुद पहल की है, तो उम्मीद की एक नई लौ जली है।
झारखंड मजदूर संघर्ष संघ के नेता कहते हैं —
“अब यह लड़ाई दिल्ली तक पहुँच चुकी है। अगर जरूरत पड़ी तो हम राष्ट्रपति से भी मिलेंगे। अब हमारी पीढ़ी बेरोज़गारी और शोषण की गुलामी नहीं सहेगी।”
निष्कर्ष: विकास तभी जब सबका अधिकार सुनिश्चित हो
झारखंड के लिए विकास का अर्थ केवल खनन उत्पादन नहीं, बल्कि ‘स्थानीय सहभागिता’ भी है।
यदि खदानें स्थानीय लोगों को रोजगार नहीं दे पाएंगी, तो यह विकास नहीं, दोहन कहलाएगा। आदिवासी समाज अपने जल-जंगल-जमीन की रक्षा के साथ अब अपने रोजगार के अधिकार के लिए भी एकजुट हो चुका है।
आदिवासी मंत्रालय की पहल ने इस संघर्ष को नई दिशा दी है — अब देखना यह है कि क्या आने वाले दिनों में सचमुच “खनिज संपदा पर से पराया कब्ज़ा” हटेगा, या यह कहानी फिर किसी नई रिपोर्ट का विषय बनेगी।















