गुवा संवाददात।
“यहाँ बारिश नहीं, मुसीबत बरसती है।” — यह दर्द आज बड़ाजामदा के हर नागरिक की जुबान पर है। लौह अयस्क से भरपूर और एक समय औद्योगिक गतिविधियों का केंद्र रहा बड़ाजामदा हर हल्की बारिश के बाद दलदल में तब्दील हो जाता है।

बाजार, थाना, बोर्डर, फुटबॉल मैदान, टंकीसाई, भठ्ठीसाई, स्टेशन रोड सहित लगभग सभी आवासीय क्षेत्रों की सड़कें पानी-पानी हो जाती हैं, और स्थानीय लोग नरकीय जीवन जीने को मजबूर हैं।
विकास के नाम पर शून्य, वादों की बाढ़ – लेकिन हल नहीं हुआ जलजमाव
बड़ाजामदा में जलजमाव कोई नई समस्या नहीं है। यह दशकों पुरानी पीड़ा है, जिसे सरकार, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने सिर्फ चुनावी भाषणों और शांति समिति की बैठकों तक ही सीमित रखा। न कोई ड्रेनेज सिस्टम बना, न नालियां साफ हुईं।
पांच वर्ष पूर्व तक यहां 200 से अधिक लौह अयस्क क्रेशर और दर्जनों खदानें संचालित थीं। बड़ी-बड़ी कंपनियों के कार्यालय यहीं थे, हजारों टन लौह अयस्क यहां से देशभर में भेजा जाता था। लेकिन इतनी आर्थिक गतिविधि के बावजूद बड़ाजामदा की सड़कों और नालियों की किस्मत नहीं बदली।
स्कूल के बच्चों से लेकर दुकानदार तक परेशान
बारिश के दौरान सड़कों पर चलना जंग जीतने जैसा हो गया है। बच्चे स्कूल जाने से डरते हैं, लोग काम पर निकलना टालते हैं। सड़कें कीचड़ से लथपथ, कपड़े और शरीर लाल मिट्टी से रंगे जाते हैं।
और अगर बारिश न हो, तो धूल का आतंक छा जाता है। वाहन चलने से उड़ने वाला धूलकण लोगों का जीना हराम कर देता है। दुकानों में रखा सामान तक गंदा हो जाता है, जिसे ग्राहक हाथ तक लगाने से मना कर देते हैं।
पूर्व एसडीओ ने वादा किया था – लेकिन वादे भी अब पानी में!
हर बार शांति समिति की बैठक में इस मुद्दे को उठाया गया। पूर्व एसडीओ ने कहा था कि ड्रेनेज सिस्टम बनाकर जलजमाव खत्म किया जाएगा। लेकिन हकीकत यह है कि आज तक एक नाली तक नहीं बनी। ज्यादा बारिश हुई तो बड़ाजामदा बाढ़ की चपेट में आ जाता है, क्योंकि पानी निकलने की कोई व्यवस्था ही नहीं है।
अब सवाल यह है…
- जब बड़ाजामदा लौह अयस्क से समृद्ध था, तब भी विकास क्यों नहीं हुआ?
- अब जबकि समस्या वर्षों से सामने है, तो उसे हल करने की इच्छाशक्ति क्यों नहीं दिखाई गई?
- क्या जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के लिए बड़ाजामदा के लोग महज़ वोट बैंक हैं?
बड़ाजामदा सिस्टम की विफलता और प्रशासनिक उदासीनता का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है।












