दो माह से अधिक समय बीतने के बाद भी नहीं हुई नियुक्ति
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
ग्रामीण कार्य विभाग के चाईबासा प्रमंडल की हालत आज किसी अनाथ विभाग से कम नहीं रह गई है। तत्कालीन कार्यपालक अभियंता राधे श्याम मांझी के सेवा निवृत्त हुए दो माह से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन आज तक न तो किसी नए कार्यपालक अभियंता की पदस्थापना की गई और न ही किसी योग्य अभियंता को प्रभारी का दायित्व सौंपा गया। इस प्रशासनिक शून्य का सीधा असर लगभग 400 करोड़ रुपये की सड़क योजनाओं पर पड़ा है, जो पूरी तरह ठप हो चुकी हैं।

400 करोड़ की सड़क योजनाएं ठप
जनता भुगत रही अफसरशाही की सजा
चाईबासा और जगन्नाथपुर अनुमंडल के अंतर्गत आने वाले सभी प्रखंडों में सड़क निर्माण कार्य पूरी तरह ठप हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY), राज्य संपोषित योजनाएं और अन्य महत्वपूर्ण ग्रामीण सड़क परियोजनाएं केवल फाइलों में सिमटकर रह गई हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली जनता को आवागमन की मूलभूत सुविधा से वंचित होना पड़ रहा है। बरसात के दिनों में हालात और भी भयावह हो जाते हैं, लेकिन विभागीय अफसरों को इससे कोई सरोकार नहीं दिखता।
विभागीय सूची से चाईबासा प्रमंडल गायब!
क्या सरकार ने प्रमंडल को ही भुला दिया?
सूत्रों से मिली चौंकाने वाली जानकारी के अनुसार, झारखंड सरकार ने अपने विभागीय लिस्ट से ग्रामीण कार्य विभाग, चाईबासा प्रमंडल का नाम ही हटा दिया है।
अगर यह जानकारी सही है, तो यह न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही बल्कि सीधे-सीधे इस क्षेत्र के विकास के साथ धोखा है।
प्रमंडल का नाम सूची से हटने का अर्थ है—न कोई जिम्मेदार, न कोई निर्णयकर्ता और न ही कोई जवाबदेही।
अफसरशाही की उदासीनता चरम पर
जनता के अधिकारों से खुला खिलवाड़
ग्रामीण कार्य विभाग के आला अधिकारियों की उदासीनता और लापरवाही अब खुलकर सामने आ चुकी है। विभाग को यह तक फुर्सत नहीं कि वह किसी प्रभारी अभियंता की अस्थायी व्यवस्था ही कर दे।
इसका खामियाजा आम जनता भुगत रही है, जिनके लिए सड़क केवल एक सुविधा नहीं बल्कि जीवन रेखा होती है—स्कूल, अस्पताल, बाजार और रोजगार सब कुछ सड़क पर निर्भर करता है।
जिला प्रशासन भी मौन
विकास के मुद्दे पर चुप्पी क्यों?
हैरानी की बात यह है कि जिला प्रशासन भी इस गंभीर मुद्दे पर पूरी तरह मौन है।
न तो विभाग को कोई पत्राचार किया जा रहा है और न ही राज्य सरकार के समक्ष इस समस्या को मजबूती से उठाया जा रहा है।
प्रश्न उठता है कि क्या जिला प्रशासन को जिले के विकास से कोई सरोकार नहीं रह गया है?
राधे श्याम मांझी के बाद प्रमंडल ‘अनाथ’
जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं
स्थानीय लोगों में यह आम चर्चा है कि राधे श्याम मांझी के सेवानिवृत्त होते ही चाईबासा प्रमंडल अनाथ हो गया है।
कोई देखने वाला नहीं, कोई सुनने वाला नहीं।
फाइलें धूल खा रही हैं, योजनाएं दम तोड़ रही हैं और अफसर राजधानी में कुर्सी बचाने की राजनीति में व्यस्त हैं।
क्यों नहीं हो रही नई पदस्थापना?
मंत्री और सचिव कटघरे में
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर विभाग इस रिक्त पद पर किसी योग्य अभियंता की नियुक्ति क्यों नहीं कर रहा?
या कम से कम किसी अनुभवी अभियंता को प्रभारी का दायित्व क्यों नहीं सौंपा जा रहा?
यह सवाल सीधे-सीधे ग्रामीण कार्य विभाग के मंत्री और सचिव को कटघरे में खड़ा करता है।
मंत्री–सचिव की खींचतान में विकास बंधक
जनता की कीमत पर सत्ता संघर्ष
सूत्रों के अनुसार, विभाग में मंत्री और सचिव के बीच आपसी तालमेल पूरी तरह बिगड़ चुका है।
इसी खींचतान का नतीजा है कि न तो अभियंता की पदस्थापना हो रही है और न ही किसी को प्रभारी बनाया जा रहा है।
इस सत्ता संघर्ष की कीमत आम जनता चुका रही है, जिसका विकास बंधक बना हुआ है।
भुगतान के अभाव में संवेदकों ने रोका काम
योजनाएं अधर में लटकीं
PMGSY, राज्य संपोषित योजनाओं और अन्य सड़क निर्माण कार्यों का भुगतान लंबे समय से लंबित है।
भुगतान न मिलने के कारण संवेदकों ने काम रोक दिया है।
नए कार्यादेश जारी नहीं हो रहे और पुराने कार्य अधूरे पड़े हैं।
इससे न सिर्फ विकास प्रभावित हो रहा है, बल्कि सरकार की साख पर भी सवाल उठ रहे हैं।
माननीय भी दूरी बनाए हुए
पैरवी करने से क्यों कतरा रहे जनप्रतिनिधि?
जिले के माननीय जनप्रतिनिधि भी विभाग की बदहाल स्थिति को देखकर किसी की पैरवी करने से कतरा रहे हैं।
या तो उन्हें डर है या फिर उन्हें भी भरोसा नहीं कि उनकी आवाज सुनी जाएगी।
यह स्थिति लोकतंत्र के लिए बेहद चिंताजनक है, जहां जनप्रतिनिधि ही जनता की समस्या उठाने से पीछे हट जाएं।
हेमंत सोरेन सरकार में ग्रामीण कार्य विभाग सबसे बदहाल
क्या यही है ‘विकास मॉडल’?
हेमंत सोरेन सरकार के कार्यकाल में अगर किसी विभाग की हालत सबसे बदतर कही जाए, तो वह ग्रामीण कार्य विभाग है।
ग्रामीण सड़कों का निर्माण ठप है, भुगतान रुका है, अधिकारी गायब हैं और जवाबदेही शून्य है।
ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि झारखंड में ग्रामीण विकास लगभग ठप हो चुका है।
सवाल जो जवाब मांगते हैं
सरकार कब जागेगी?
क्या चाईबासा प्रमंडल झारखंड का हिस्सा नहीं है?
क्या यहां रहने वाली जनता विकास की हकदार नहीं है?
मंत्री और सचिव की खींचतान की सजा जनता क्यों भुगते?
400 करोड़ की योजनाओं का जिम्मेदार कौन होगा?
अब भी नहीं चेती सरकार तो…
आंदोलन की जमीन तैयार
अगर जल्द ही किसी योग्य कार्यपालक अभियंता की पदस्थापना या प्रभारी नियुक्ति नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में जनाक्रोश और आंदोलन से इंकार नहीं किया जा सकता।
ग्रामीण जनता अब सवाल पूछ रही है और जवाब चाहती है।
विकास नहीं, व्यवस्था की शवयात्रा
चाईबासा ग्रामीण कार्य विभाग की स्थिति किसी विकास यात्रा की नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की शवयात्रा जैसी प्रतीत होती है।
अगर सरकार और विभागीय नेतृत्व ने अब भी आंखें नहीं खोलीं, तो इतिहास गवाह रहेगा कि कैसे सत्ता की खींचतान में एक पूरे प्रमंडल का विकास कुचल दिया गया।
अब देखना यह है कि सरकार कब जागती है—या फिर चाईबासा प्रमंडल यूं ही अनाथ बना रहेगा।












