पेसा कानून और 75% नियोजन नीति उल्लंघन का आरोप, डीसी से त्रिपक्षीय वार्ता की मांग
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
गुवा स्थित स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) की रांजाबुरू माइन्स को लेकर सारंडा पीढ़ क्षेत्र में जनाक्रोश खुलकर सामने आ गया है। स्थानीय अधिकारों की अनदेखी, पेसा कानून के उल्लंघन और बाहरी मजदूरों को प्राथमिकता देने के आरोपों के साथ सारंडा पीढ़ के मानकी-मुंडा एवं सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधिमंडल ने जिला उपायुक्त चंदन कुमार से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा और कंपनी की मनमानी पर तत्काल रोक लगाने की मांग की।
प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सारंडा पीढ़ के मानकी श्री सुरेश चांपिया ने किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि रांजाबुरू माइन्स परियोजना में ग्रामसभा की सहमति के बिना कार्य किया जा रहा है, जो पेसा अधिनियम का खुला उल्लंघन है।

“पेसा कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ा रही कंपनी”
प्रतिनिधिमंडल ने डीसी को बताया कि प्रस्तावित खदान परियोजना में न तो ग्रामसभा की वास्तविक अनुमति ली गई और न ही स्थानीय लोगों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया गया।
मानकी-मुंडा ने आरोप लगाया कि यह सीधे तौर पर आदिवासी स्वशासन व्यवस्था पर हमला है।
75 प्रतिशत स्थानीय नियोजन नीति भी कागजों तक सीमित
झारखंड सरकार की नियोजन नीति के तहत 75 प्रतिशत स्थानीय लोगों को रोजगार देने का प्रावधान है, लेकिन रांजाबुरू माइन्स में इसका कोई पालन नहीं हो रहा।
प्रतिनिधियों ने कहा—
“कंपनी में स्थायी और अस्थायी मजदूर लगभग सभी बाहरी हैं, जबकि सारंडा के युवा बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं।”
इससे क्षेत्र के सैकड़ों आदिवासी युवा कंपनी की परियोजनाओं से पूरी तरह वंचित हो रहे हैं।
CSR और DMFT में भी भारी अनियमितता
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि सीएसआर और डीएमएफटी फंड का उपयोग पारदर्शी ढंग से नहीं किया जा रहा।
मांग रखी गई कि—
CSR और DMFT को ग्रामसभा के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रखा जाए
मशीन माइनिंग बंद कर अधिकतम हैंड माइनिंग कराई जाए
स्थानीय लोगों को प्राथमिकता से रोजगार दिया जाए
कारो नदी को बनाया जा रहा श्मशान और गंदगी का अड्डा
प्रतिनिधिमंडल ने एक बेहद गंभीर मुद्दा उठाते हुए कहा कि बाहरी मजदूर कारो नदी के आसपास खुले में मल-मूत्र त्याग रहे हैं और उसी नदी किनारे शवदाह किया जा रहा है।
इससे न केवल जल प्रदूषण फैल रहा है, बल्कि पूरे क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक भावना को ठेस पहुंच रही है।
हो समाज के आस्था स्थल ‘देशाऊली’ का अपमान
कारो नदी के समीप स्थित ‘हो’ समाज का प्राकृतिक आस्था स्थल देशाऊली बार-बार अपवित्र किया जा रहा है।
ग्रामीणों का आरोप है कि बाहरी लोगों द्वारा इस पवित्र स्थल का लगातार अपमान किया जा रहा है, जो आदिवासी संस्कृति और परंपरा पर सीधा हमला है।
“कंपनी की मनमानी के खिलाफ अनिश्चितकालीन रोक”
मानकी-मुंडा और ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि—
कंपनी की गैरजिम्मेदाराना कार्यशैली, स्थानीय युवाओं की उपेक्षा और पर्यावरण व आस्था स्थलों के अपमान के कारण रांजाबुरू माइन्स में खनन कार्य पर अनिश्चितकालीन रोक लगा दी गई है।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि जब तक उनकी मांगें नहीं मानी जातीं, तब तक खनन कार्य शुरू नहीं होने दिया जाएगा।
10 दिनों में त्रिपक्षीय वार्ता की मांग
प्रतिनिधिमंडल ने डीसी से मांग की कि—
अगले 10 दिनों के भीतर
सेल प्रबंधन
जिला प्रशासन
मानकी-मुंडा एवं सामाजिक संगठनों
के बीच त्रिपक्षीय वार्ता कराई जाए।
इस पर उपायुक्त चंदन कुमार ने आश्वासन दिया कि इस पूरे मामले को गंभीरता से लिया जाएगा और प्रशासनिक स्तर पर समाधान निकालने का प्रयास किया जाएगा।

कौन-कौन रहे मौजूद
इस दौरान जामदा पीढ़ के मानकी साजन चातोम्बा,
गुवासाई मुंडा मंगल पुरती,
ठाकुरा मुंडा दामु चांपिया,
लिपुंगा मुंडा चरण चांपिया,
लंका पुरती,
दारा सिंह चांपिया,
मानकी-मुंडा संघ के अध्यक्ष गणेश पाट पिंगुवा
और आदिवासी ‘हो’ समाज युवा महासभा के महासचिव गब्बर सिंह हेम्ब्रम उपस्थित थे।
साफ संदेश: “आदिवासी अधिकार से खिलवाड़ बंद करो”
यह आंदोलन अब केवल रोजगार का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह आदिवासी अस्मिता, जल-जंगल-जमीन और धार्मिक आस्था की रक्षा का संघर्ष बन चुका है।
यदि प्रशासन और सेल प्रबंधन ने समय रहते ठोस पहल नहीं की, तो यह आंदोलन और उग्र रूप ले सकता है।
सारंडा में अब एक ही नारा गूंज रहा है —
“स्थानीयों को हक दो, नहीं तो खनन बंद करो!”














