सारंडा के गिरली फूल पर पलता जीवन, नक्सली प्रेशर IED बना ग्रामीणों की रोज़ी-रोटी का दुश्मन
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
सारंडा जंगल में इन दिनों एक छोटा सा फूल — गिरली फूल — आदिवासी ग्रामीणों के जीवन का सबसे बड़ा सहारा बना हुआ है। जंगलों में उगने वाला यह फूल न केवल पोषण से भरपूर है, बल्कि यहां के गरीब ग्रामीणों और बच्चों के लिए कमाई का एकमात्र साधन भी है।
लेकिन अब यही जंगल, जो कभी जीवन देता था, मौत का जाल बनता जा रहा है। नक्सलियों द्वारा जगह-जगह लगाए गए प्रेशर IED ने ग्रामीणों की आजीविका पर सीधा हमला कर दिया है।

जंगल से सड़क तक: संघर्ष की कहानी
सुबह होते ही ग्रामीण और बच्चे अपने गांव के आसपास के घने जंगलों में गिरली फूल तोड़ने निकल पड़ते हैं।
पेड़ों की डालियों से फूल तोड़कर वे उन्हें पत्तों के दोना में सजाते हैं और फिर सारंडा की सड़कों के किनारे बैठकर 20 रुपए प्रति दोना की दर से बेचते नजर आते हैं।
यह छोटा सा व्यापार उनके लिए जीवन और पेट भरने का आधार है।
ग्रामीण बच्चियों ने बताया—
“गिरली फूल हमारे जीने का साधन है। इससे घर में चूल्हा जलता है। लोग इसे सब्जी बनाकर खाते हैं, क्योंकि यह पौष्टिक होता है।”
पोषण का स्रोत, पर मौत का रास्ता
गिरली फूल सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि आदिवासी भोजन संस्कृति का हिस्सा है।
ग्रामीण इसे सब्जी के रूप में उपयोग करते हैं। यह जंगल की देन है, जो शरीर को ताकत देता है और बाजार पर निर्भरता कम करता है।
लेकिन अब यही फूल तोड़ने जाना एक जुआ बन गया है — जिंदगी या मौत का।
प्रेशर IED: जंगल को कब्रगाह में बदलने की साजिश
ग्रामीणों का कहना है कि नक्सलियों ने पुलिस से बचने के लिए सारंडा के कई इलाकों में प्रेशर IED बिछा दिया है।
इन विस्फोटकों की चपेट में आकर पहले ही कई निर्दोष ग्रामीणों की दर्दनाक मौत हो चुकी है।
फूल बेचने वाली बच्चियों ने भयभीत होकर कहा—
“पहले जंगल जाने में डर नहीं लगता था। अब हर कदम पर मौत का खतरा रहता है। हम फूल तोड़ने जाते हैं, लेकिन दिल कांपता है।”
पुलिस से नहीं डर, IED से डर
ग्रामीणों ने यह भी बताया कि आजकल जंगल में अक्सर पुलिस जवानों से सामना हो जाता है।
लेकिन उनसे कोई डर नहीं लगता।
“पुलिस से हमें कोई खतरा नहीं है। डर तो उस जमीन से लगता है, जहां कब कौन सा प्रेशर IED फट जाए, कोई नहीं जानता।”
यह बयान साफ करता है कि असली खतरा बंदूक नहीं, बल्कि जंगल में छिपे विस्फोटक हैं।
आजीविका पर सीधा हमला
गिरली फूल जैसे वनोत्पाद आदिवासी समाज की रीढ़ हैं।
जब जंगल जाना ही जानलेवा हो जाए, तो:
* बच्चे स्कूल के बजाय जोखिम में कमाने जाते हैं
* महिलाएं भय के साथ जंगल में प्रवेश करती हैं
* परिवार भूख और डर के बीच फंस जाते हैं
यह केवल सुरक्षा का मामला नहीं, बल्कि रोटी और जीवन का सवाल है।
कब खत्म होगा मौत का जंगल?
ग्रामीणों का एक ही सवाल है—
“जब तक पुलिस जंगलों से प्रेशर IED नहीं हटाएगी, तब तक हम सुरक्षित कैसे जंगल जाएंगे?”
वन उत्पाद लाना, फूल तोड़ना, लकड़ी और फल इकट्ठा करना — सब कुछ खतरे में है।
हर दिन जंगल जाना अब मेहनत नहीं, बल्कि मौत से मुठभेड़ बन गया है।
विकास के नाम पर खामोशी, जमीन पर खौफ
सरकारी योजनाएं रोजगार और विकास की बात करती हैं, लेकिन जमीन पर हालात इसके उलट हैं।
जहां एक ओर जंगल आदिवासियों की जीवनरेखा है, वहीं दूसरी ओर वही जंगल विस्फोटकों से भरा पड़ा है।
यह स्थिति सीधे-सीधे आदिवासी जीवन व्यवस्था पर हमला है।
फूल नहीं, भविष्य कुचला जा रहा है
सारंडा में गिरली फूल सिर्फ एक फूल नहीं, बल्कि:
* बच्चों की किताब
* मां की रसोई
* परिवार की आजीविका
* और आदिवासी पहचान है
नक्सलियों द्वारा लगाए गए प्रेशर IED ने इस पूरे जीवन चक्र को खतरे में डाल दिया है।
जब तक जंगल सुरक्षित नहीं होगा, तब तक आदिवासी समाज का भविष्य भी सुरक्षित नहीं होगा।
आज गिरली फूल तोड़े जा रहे हैं, लेकिन असल में कुचला जा रहा है आदिवासियों का जीवन और उनका भरोसा।














