कुमडीह जंगल में गूंजी थी गोलियां, एक मासूम की थम गई थी सांसें
ग्राउंड रिपोर्ट: शैलेश सिंह
22 जनवरी… कुमडीह-बहदा के बीच घना जंगल…
पुलिस और नक्सलियों के बीच भीषण मुठभेड़… और गोलियों की गूंज के बीच 17 नक्सली ढेर।
लेकिन इस मुठभेड़ की सबसे दर्दनाक तस्वीर थी—
15 वर्षीय सरिता होनहागा की लाश, जो सबसे कम उम्र की मारी गई “नक्सली” बताई गई।
सारंडा के छोटानागरा थाना क्षेत्र के होलोंगउली/ढुलाईगाड़ा गांव के लेपटापी टोला की रहने वाली सरिता अब सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक बड़ा सवाल बन चुकी है।

कौन थी सरिता? नक्सली या हालात की शिकार?
मुठभेड़ में मारे गए लोगों की सूची में बड़े-बड़े इनामी नक्सलियों के नाम हैं—
*2.35 करोड़ का इनामी अनल उर्फ पतिराम मांझी (CCM)
* 90 लाख का अनमोल उर्फ सुशांत (BJSAC)
* 62 लाख का अमित मुण्डा (RCM)
* 32 लाख का रापा उर्फ पावेल (SZC)
* अन्य कई 5 लाख, 1 लाख के इनामी उग्रवादी
इन्हीं के बीच खड़ी है एक मासूम लड़की—सरिता।
सवाल साफ है—
👉 क्या वह इन खूंखार उग्रवादियों की साथी थी?
👉 या फिर एक ऐसी बच्ची जिसे जबरन इस रास्ते पर धकेल दिया गया?
“मेरी बेटी नक्सली नहीं थी…” — एक बाप की टूटी आवाज
सरिता के पिता बासु होनहागा का दर्द शब्दों में नहीं समाता।
“6 जनवरी को वह मेरे साथ घर का फाउंडेशन खोद रही थी… दोपहर में खाना खाई… फिर अचानक घर से निकली… और फिर उसकी लाश आई…”
यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि उस पूरे तंत्र पर सवाल है जो एक मासूम को जंगल तक पहुंचा देता है।
बासु का दावा है—
👉 उसकी बेटी का नक्सलियों से कोई लेना-देना नहीं था
👉 गांव में नक्सलियों का आना-जाना आम बात थी
👉 और कई बार ग्रामीणों को जबरन उनके काम में लगाया जाता था
जबरन भर्ती का काला खेल: बच्चियों तक को नहीं छोड़ते नक्सली
ग्रामीणों के मुताबिक, जयकांत नामक नक्सली गांव में अक्सर आता था और लोगों को अपने काम के लिए मजबूर करता था।
कैसे चलता है यह खेल?
* चावल की बोरियां ढुलवाना
* हथियार और सामान पहुंचाना
* जंगल में रास्ता दिखाना
लेकिन सबसे भयावह सच यह है—
👉 नाबालिग लड़कियों को भी जबरन कैंप में ले जाया जाता है
👉 अभिभावकों की अनुमति तक नहीं ली जाती
👉 डर, धमकी और हिंसा के जरिए उन्हें संगठन में बांध दिया जाता है
कई बार ये बच्चियां वापस घर नहीं लौट पातीं…
और अगर लौटती हैं, तो सिर्फ लाश बनकर।
डर की चुप्पी: गांव में सब जानते हैं, पर बोलता कोई नहीं
सारंडा के गांवों में खामोशी भी बोलती है…
लेकिन डर उससे भी ज्यादा भारी है।
एक ग्रामीण ने बताया—
“अगर नक्सलियों का विरोध किया तो सजा मिलती है… लड़कियों को भी उठा ले जाते हैं… कोई कुछ नहीं कर पाता…”
यह डर ही है जो सच को दफन कर देता है।
मुठभेड़ के पीछे की ‘खुफिया कहानी’: जीपीएस और मुखबिरी का जाल
इस पूरे मामले में एक और चौंकाने वाला एंगल सामने आया है।
सूत्रों के अनुसार—
* एक स्थानीय युवक, जो नक्सलियों के संपर्क में था
* उसे एक केंद्रीय सुरक्षा एजेंसी ने दो GPS डिवाइस दिए
* एक डिवाइस को चावल की बोरी में डालकर नक्सल कैंप तक भेजा गया
👉 मकसद था—नक्सलियों की सटीक लोकेशन ट्रैक करना
कहा जा रहा है कि—
* जयकांत और उसके साथियों की गिरफ्तारी
* और GPS से मिली लोकेशन
इन्हीं के आधार पर कुमडीह जंगल में यह बड़ी कार्रवाई हुई।
हालांकि, इस पूरे ऑपरेशन पर अब तक आधिकारिक मुहर नहीं लगी है।
बड़ा सवाल: क्या इस ऑपरेशन में मासूमों की पहचान हुई थी?
अगर सरिता जैसी नाबालिग उस कैंप में मौजूद थी, तो सवाल उठता है—
👉 क्या सुरक्षा एजेंसियों को इसकी जानकारी थी?
👉 क्या कोई वैकल्पिक रणनीति अपनाई जा सकती थी?
👉 क्या मुठभेड़ में मासूमों की सुरक्षा पर विचार हुआ?
यह सवाल सिर्फ प्रशासन पर नहीं, बल्कि पूरे सुरक्षा तंत्र पर खड़े होते हैं।
मानवाधिकार की आड़ में क्रूरता: नक्सलियों का दोहरा चेहरा
नक्सली संगठन खुद को “शोषितों का रक्षक” बताते हैं।
लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है—
* बच्चों की जबरन भर्ती
* लड़कियों का शारीरिक और मानसिक शोषण
* ग्रामीणों को ढाल बनाना
* डर के बल पर संगठन चलाना
👉 यह “क्रांति” नहीं, बल्कि क्रूरता का तंत्र है।
सरिता अकेली नहीं: हर साल बुझती हैं कई मासूम जिंदगियां
सारंडा, चाईबासा, गुवा…
इन इलाकों में यह कोई पहली घटना नहीं है।
हर साल—
* कई बच्चे घर से गायब
* जंगल में उनकी मौजूदगी
* और फिर मुठभेड़ में मौत
नाम बदल जाते हैं…
लेकिन कहानी वही रहती है।
प्रशासन बनाम नक्सल: बीच में पिसते ग्रामीण
इस पूरी लड़ाई में सबसे बड़ा नुकसान किसका हो रहा है?
👉 ग्रामीणों का
👉 मासूम बच्चों का
👉 गरीब परिवारों का
एक तरफ नक्सलियों का दबाव…
दूसरी तरफ पुलिस का ऑपरेशन…
और बीच में फंसी रहती है—
सरिता जैसी जिंदगियां।
जिम्मेदारी तय होगी या फिर दब जाएगा मामला?
यह घटना कई गंभीर सवाल छोड़ गई है—
नक्सलियों से सवाल
* मासूम बच्चों को क्यों जबरन भर्ती किया जाता है?
* क्या यही उनकी “क्रांति” है?
प्रशासन से सवाल
* क्या समय रहते इन बच्चों को बचाया जा सकता था?
* क्या खुफिया तंत्र में सुधार की जरूरत नहीं?
समाज से सवाल
* डर कब तक सच को दबाता रहेगा?
“सरिता” एक नाम नहीं, एक चेतावनी है
सरिता होनहागा की मौत सिर्फ एक घटना नहीं…
यह उस सिस्टम की पोल खोलती है जहां—
मासूमों को हथियार बना दिया जाता है
और फिर उन्हें “नक्सली” कहकर भुला दिया जाता है
👉 अगर अब भी नहीं चेते…
तो सारंडा के जंगलों में
सरिता जैसी कहानियां यूं ही जन्म लेती और खत्म होती रहेंगी।













