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रांजाबुरु खदान पर आदिवासी अधिकारों का विस्फोट, 10 गांवों ने ठोका ताला – ‘रोजगार नहीं तो खनन नहीं’ का ऐलान

On: February 23, 2026 9:55 AM
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“हमारी जमीन, हमारा जंगल… फिर नौकरी बाहर वालों को क्यों?”

रिपोर्ट: शैलेश सिंह

सारंडा के घने जंगल एक बार फिर गुस्से की आग से धधक उठे हैं। जिस धरती से देश का लोहा निकाला जाता है, उसी धरती के बेटे आज रोज़गार के लिए तरस रहे हैं। 23 फरवरी की सुबह 7:30 बजे सारंडा क्षेत्र के 10 गांवों के सैकड़ों ग्रामीणों ने सेल की रांजाबुरु खदान में घुसकर उसे अनिश्चितकालीन बंद कर दिया। यह केवल खदान बंद करने की कार्रवाई नहीं थी, बल्कि यह आदिवासी अस्मिता, अधिकार और अस्तित्व की खुली लड़ाई का ऐलान था।
ग्रामीणों का आरोप है कि खदान को बिना ग्राम सभा की अनुमति, बिना मानकी–मुंडाओं की सहमति, और स्थानीय बेरोजगार युवाओं को रोजगार दिए बिना शुरू कर दिया गया। आंदोलन सारंडा विकास समिति, जामकुंडिया–दुईया के बैनर तले चल रहा है और इसमें पुरुषों के साथ महिलाएं व बुजुर्ग भी डटे हुए हैं।
यह आंदोलन अब केवल रोजगार की मांग नहीं रहा, बल्कि यह सवाल बन चुका है—
“क्या आदिवासियों को उनकी ही जमीन पर मजदूर बनने का भी हक नहीं?”

पंचायत भवन से निकला आंदोलन का फैसला

21 फरवरी को दुईया पंचायत भवन में हुई बैठक ने इस आंदोलन की नींव रखी। बैठक की अध्यक्षता सारंडा पीढ़ के मानकी लागुड़ा देवगम ने की, जबकि गंगदा पंचायत के मुखिया राजू शांडिल विशेष रूप से मौजूद थे। इस ऐतिहासिक बैठक में 10 गांवों के मुंडा, डकुआ, पंचायत प्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी शामिल हुए।
बैठक में एक स्वर में कहा गया—
“हमारी जमीन से खनिज निकलेगा और हमारे ही बच्चे बेरोजगार रहेंगे, यह अब नहीं चलेगा।”
ग्रामीणों ने साफ कहा कि यदि खदान से स्थानीय युवाओं को सम्मानजनक रोजगार नहीं मिला, तो खदान को चलने नहीं दिया जाएगा। यही निर्णय 23 फरवरी को धरातल पर उतर गया।

ठेका कंपनी पर गंभीर आरोप: बाहर वालों की फौज, अपने लोग बाहर

ग्रामीणों के अनुसार रांजाबुरु खदान का संचालन मां सरला पावर वर्क नामक ठेका कंपनी कर रही है। आरोप बेहद गंभीर हैं—
* खदान में काम करने के लिए पूरी मैनपावर बाहर से लाई गई
* स्थानीय युवाओं को एक भी स्थायी और सम्मानजनक रोजगार नहीं मिला
* मजदूरी का लाभ भी बाहरी मजदूरों को सौंप दिया गया
ग्रामीणों का कहना है—
“यह सिर्फ बेरोजगारी नहीं, बल्कि हमारे अधिकारों पर सीधा डाका है।”
जब गांवों में सैकड़ों प्रशिक्षित ड्राइवर, हेल्पर, ऑपरेटर और मजदूर मौजूद हैं, तब बाहर से लोगों को बुलाकर काम देना किस नीति का हिस्सा है? यह सवाल अब पूरे सारंडा में गूंज रहा है।

ग्राम सभा और आदिवासी स्वशासन की खुली अवहेलना

ग्रामीणों का आरोप है कि खदान शुरू करने से पहले—
* न ग्राम सभा बुलाई गई
* न मानकी–मुंडाओं से सहमति ली गई
* न प्रभावित गांवों से कोई संवाद हुआ
* न स्थानीय युवाओं का सर्वे किया गया
यह आदिवासी स्वशासन व्यवस्था पर सीधा हमला है। ग्रामीणों का कहना है—
“यह केवल खदान नहीं खोली गई, बल्कि हमारे संवैधानिक अधिकार कुचल दिए गए हैं।”

मानकी लागुड़ा देवगम का तीखा सवाल

मानकी लागुड़ा देवगम ने प्रशासन और कंपनी पर तीखा प्रहार करते हुए कहा—
“जब हमारे घर में खदान खुले और हमारे गांव के बेरोजगारों को नौकरी न मिले, तो हम कहां जाएंगे?
जंगल पहले ही खत्म हो रहा है, वनोत्पाद खत्म हो रहे हैं, खेती संकट में है।
अब अगर रोजगार भी नहीं मिलेगा तो हमारे बच्चे भूखे मरेंगे या दूसरे प्रदेश भागेंगे।”


उन्होंने आगे कहा—
“दूसरे राज्यों में जाकर हमारे युवाओं का शोषण होता है, मारपीट कर भगा दिया जाता है।
क्या यही विकास है?
क्या आदिवासियों को अपने ही क्षेत्र में गुलाम बनाकर रखा जाएगा?”

मुखिया राजू शांडिल की चेतावनी: 75% रोजगार स्थानीयों को दो

गंगदा पंचायत के मुखिया राजू शांडिल ने दो टूक शब्दों में कहा—
“हमारे गांवों में मेहनतकश मजदूर हैं, वाहन चालक हैं, ऑपरेटर हैं, कुशल युवक हैं।
इसके बावजूद बाहर के मजदूरों को लाया गया है, यह हम स्वीकार नहीं करेंगे।”


उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी—
“खदान में कम से कम 75 प्रतिशत रोजगार प्रभावित गांवों के बेरोजगारों को देना होगा।
जब तक यह मांग पूरी नहीं होगी, खदान बंद रहेगी।”

जंगल उजड़ा, वनोत्पाद खत्म… अब रोजी-रोटी भी छीनी जा रही

सारंडा पहले ही खनन और सुरक्षा अभियानों से त्रस्त है। ग्रामीणों के अनुसार—
* जंगल लगातार कट रहे हैं
* महुआ, सालबीज, कंद-मूल, पत्ता जैसे वनोत्पाद घटते जा रहे हैं
* पारंपरिक आजीविका लगभग खत्म हो चुकी है
अब जब खदान से रोजगार की उम्मीद जगी थी, वही उम्मीद भी तोड़ दी गई।
यह केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि सामाजिक विस्फोट की स्थिति है।

सेल और प्रशासन पर सवालों की बौछार

ग्रामीणों ने प्रशासन और कंपनी से सीधे सवाल किए—
* क्या खदान खोलने से पहले ग्राम सभा की अनुमति ली गई?
* क्या आदिवासी क्षेत्रों के विशेष कानूनों का पालन हुआ?
* क्या स्थानीय युवाओं का रोजगार सर्वे कराया गया?
* क्या कोई रोजगार नीति बनाई गई?
इन सवालों का जवाब फिलहाल शून्य है।
मशीनें चलने लगीं, ट्रक दौड़ने लगे, लेकिन गांवों में बेरोजगारी जस की तस बनी रही।

“हम भीख नहीं, अधिकार मांग रहे हैं”

आंदोलनकारियों ने साफ कहा—
“हम भीख नहीं मांग रहे, हम अपने अधिकार मांग रहे हैं।
हमारी जमीन से लोहा निकलेगा, तो पहला हक हमारा होगा।”
ग्रामीणों का कहना है कि यदि मांगें नहीं मानी गईं, तो आंदोलन और तेज होगा और इसे पूरे सारंडा क्षेत्र में फैलाया जाएगा।

रोजगार नहीं तो खदान नहीं

अब रांजाबुरु खदान सिर्फ एक औद्योगिक परियोजना नहीं रही।
यह बन गई है—
आदिवासी अधिकार बनाम कॉरपोरेट व्यवस्था की लड़ाई का प्रतीक।
एक ओर बड़ी कंपनियां और ठेका एजेंसियां हैं, दूसरी ओर जंगल के बीच खड़े बेरोजगार आदिवासी युवा।
23 फरवरी से खदान बंद करने का फैसला केवल चेतावनी नहीं, बल्कि आखिरी संदेश है—
“हमारी जमीन पर हमारा हक चाहिए।
रोजगार नहीं मिला तो खदान नहीं चलेगी।”
अब यह देखना है कि Steel Authority of India Limited और जिला प्रशासन इस जनआंदोलन को संवाद से सुलझाते हैं या टकराव की ओर बढ़ते हैं।

सारंडा की धरती से उठा सवाल पूरे सिस्टम के लिए चुनौती

सारंडा के जंगलों से उठी यह आवाज अब पूरे कोल्हान में गूंज रही है—
स्थानीय बेरोजगारों की उपेक्षा अब बर्दाश्त नहीं होगी।
यह आंदोलन सिर्फ खदान बंद करने की कहानी नहीं है।
यह उस व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह है, जो आदिवासियों की जमीन तो लेती है, लेकिन उन्हें विकास का हिस्सा नहीं बनाती।
आज सारंडा पूछ रहा है—
“अगर विकास में हमारा हिस्सा नहीं, तो यह विकास किसका है?”
और यही सवाल आने वाले दिनों में पूरे झारखंड की राजनीति और प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनने जा रहा है।

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सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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