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ताले में बंद शौचालय, पानी बिना योजना

On: February 21, 2026 11:19 AM
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ताले में बंद शौचालय, पानी बिना योजना
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नक्सल प्रभावित बहदा गांव में विकास की पोल खोलता स्कूल का हाल, प्रशासनिक वादों पर उठा बड़ा सवाल

रिपोर्ट: शैलेश सिंह

नक्सल प्रभावित सारंडा जंगल के छोटानागरा थाना अंतर्गत बहदा गांव में विकास की असली तस्वीर सामने आ गई है। यहां प्राथमिक विद्यालय परिसर में टाटा स्टील फाउंडेशन द्वारा नव-निर्मित शौचालय ब्लॉक तैयार तो कर दिया गया, लेकिन उसमें पानी की कोई सुविधा नहीं है। नतीजा यह है कि शौचालय निर्माण के बाद से ही उस पर ताला लटका हुआ है और छात्र-छात्राएं आज भी खुले में शौच के लिए मजबूर हैं।
सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि इसी शौचालय के सामने स्कूल की मुख्य दीवार पर एक पेंटिंग बनी है, जिस पर लिखा है—
“शौचालय का हमेशा उपयोग, रखे जन-जन को निरोग।”
यह पंक्ति आज सरकारी व्यवस्था और योजनाओं पर करारा तमाचा बन चुकी है।

ताले में बंद शौचालय, पानी बिना योजना
खराब सोलर जल मीनार

करोड़ों की नक्सली कार्रवाई, पर बच्चों के लिए पानी नहीं

यह वही बहदा गांव है, जहां पास के जंगल में 22 जनवरी को पुलिस और नक्सलियों के बीच ऐतिहासिक मुठभेड़ हुई थी। इस मुठभेड़ में करोड़ों के इनामी नक्सली पतिराम माझी उर्फ अनल दा, लालचंद हेंब्रम उर्फ अनमोल दा सहित कुल 17 नक्सली मारे गए थे। इसे सारंडा ही नहीं, बल्कि पूरे देश की सबसे बड़ी नक्सल विरोधी सफलता माना गया।
एक तरफ देश इस सफलता पर जश्न मना रहा था, वहीं दूसरी तरफ बहदा गांव के बच्चे बिना पानी के शौचालय और सूखी जलमीनार के बीच जीने को मजबूर हैं।
यह विरोधाभास नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी का जीवंत प्रमाण है।

अधिकारियों ने देखा, सुना, भरोसा दिलाया… फिर भूल गए

इस बड़ी मुठभेड़ के बाद मनोहरपुर के अंचलाधिकारी और प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) बहदा गांव पहुंचे थे।
गांव के मुंडा रोया सिद्धू, कामेश्वर मांझी, गणेश मांझी तथा विद्यालय के शिक्षकों ने अधिकारियों को साफ शब्दों में बताया था कि—
* स्कूल परिसर में स्थित सोलर चालित जलमीनार महीनों से खराब है
* बच्चों और ग्रामीणों को पीने का पानी नहीं मिल रहा
* शौचालय बना है, लेकिन पानी नहीं होने के कारण उपयोग शून्य है
* बच्चे मजबूरी में बाहर शौच के लिए जाते हैं
* बाईहातु गांव की जलमीनार से पाइपलाइन तो बिछाई गई है, लेकिन पानी बहदा तक नहीं पहुंचता
इन अधिकारियों ने मौके पर समाधान का भरोसा दिया था।
लेकिन आज कई दिन बाद भी वही हालात बने हुए हैं।

स्कूल का निरीक्षण करते बीडीओ आदि अधिकारी की फाइल तस्वीर

भरोसे का कत्ल: ग्रामीणों में गुस्सा

ग्रामीणों का सवाल सीधा है—
“अगर अधिकारी आकर देख-सुनकर भी कुछ नहीं करते, तो हम किस पर भरोसा करें?”
गांव के बुजुर्गों का कहना है कि—
“जब नक्सलियों का डर था, तब भी हम जंगल में पानी ढूंढ लेते थे। अब सरकार है, योजना है, फाउंडेशन है, फिर भी हमारे बच्चों को पानी नहीं मिल रहा।”
यह सिर्फ एक खराब जलमीनार की कहानी नहीं है, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता का दस्तावेज है।

कागजों में विकास, जमीन पर प्यास

सरकारी रिपोर्टों में बहदा गांव शायद “कवर्ड” दिखाया जा रहा होगा—
* शौचालय बना
* जलमीनार लगी
* पाइपलाइन बिछी
लेकिन सच्चाई यह है कि—
* शौचालय बंद है
* जलमीनार खराब है
* पाइपलाइन सूखी है
* बच्चे खुले में शौच कर रहे हैं
यह वही मॉडल है जिसे विकास कहा जा रहा है।

बच्चों की गरिमा पर हमला

स्कूल में शौचालय का उद्देश्य सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि बच्चों की गरिमा और स्वास्थ्य की रक्षा है।
आज स्थिति यह है कि—
* छात्राएं खुले में जाने को मजबूर हैं
* बीमारी का खतरा बढ़ रहा है
* स्वच्छ भारत अभियान मजाक बन रहा है
यह केवल एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल है।

विकास नहीं, दिखावा चल रहा है

बहदा गांव का यह शौचालय ब्लॉक आज प्रतीक बन चुका है—
* अधूरी योजनाओं का
* खोखले वादों का
* और संवेदनहीन प्रशासन का
जहां नक्सलियों के खिलाफ इतनी बड़ी कार्रवाई हुई, वहां बच्चों को पानी तक नहीं मिलना एक शर्मनाक सच्चाई है।

शौचालय से बड़ा संकट – भरोसे का सूखा

सारंडा के बहदा गांव में शौचालय पर लटका ताला केवल लोहे का ताला नहीं है,
यह जनता और प्रशासन के बीच टूटते भरोसे का ताला है।
अगर नक्सल मुक्त क्षेत्र में भी बुनियादी सुविधा नहीं दी जा सकती,
तो फिर “विकास” सिर्फ भाषणों और दौरे की तस्वीरों तक ही सीमित रह जाएगा।
यह खबर चेतावनी है—
या तो सिस्टम जागेगा,
या फिर दीवार पर लिखा नारा हमेशा सरकार का मजाक उड़ाता रहेगा—
“शौचालय का हमेशा उपयोग, रखे जन-जन को निरोग।”

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सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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