घने जंगलों में फिर हथियारबंद दस्ते की मौजूदगी
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
सारंडा जंगल एक बार फिर नक्सली गतिविधियों के कारण सुलगता नजर आ रहा है। विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार छोटानागरा और किरीबुरू थाना क्षेत्र के सीमावर्ती इलाकों—कुमडीह और कारिया गांव के बीच घने जंगलों और ऊंची पहाड़ियों पर 25 से 30 की संख्या में हथियारबंद नक्सली सक्रिय हैं। यह वही इलाका है जहां पहले भी नक्सली हिंसा के कई खतरनाक अध्याय लिखे जा चुके हैं।

दर्जनों सुरक्षा कैंप, फिर भी नक्सली बेखौफ
सबसे गंभीर और चिंताजनक पहलू यह है कि सारंडा क्षेत्र में दर्जनों पुलिस और सीआरपीएफ कैंप स्थापित हैं। इसके बावजूद नक्सलियों का इस तरह खुलेआम जंगलों में जमावड़ा होना सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्षेत्र में एलआरपी (लॉन्ग रेंज पेट्रोलिंग) लगातार होती रहती है, फिर भी नक्सलियों की मौजूदगी यह संकेत देती है कि वे या तो सुरक्षा तंत्र को चकमा देने में सफल हो रहे हैं या कहीं न कहीं सूचना तंत्र कमजोर पड़ रहा है।
लगातार ऑपरेशन, फिर भी खतरा कायम
पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा सारंडा में नक्सल विरोधी अभियान निरंतर चलाए जाते रहे हैं। सर्च ऑपरेशन, एरिया डोमिनेशन, एलआरपी और जॉइंट ऑपरेशन की खबरें आए दिन सामने आती हैं। इसके बावजूद नक्सली गतिविधियों का दोबारा उभरना चिंता को और गहरा करता है। सवाल उठता है—क्या ऑपरेशन पर्याप्त हैं या सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गए हैं?
खामोशी में छिपी बड़ी साजिश
नक्सलियों की ओर से फिलहाल कोई पर्चा, बयान या खुली धमकी सामने नहीं आई है। लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह खामोशी किसी बड़ी साजिश का संकेत हो सकती है। नक्सली अक्सर किसी बड़ी घटना से पहले इसी तरह शांत रहते हैं। ग्रामीणों को डर है कि कहीं सुरक्षा बलों या निर्दोष ग्रामीणों को निशाना बनाने की तैयारी तो नहीं चल रही।
ग्रामीणों में दहशत, जंगल से कट रही रोज़ी
कुमडीह, कारिया, छोटानागरा और आसपास के गांवों में भय का माहौल है। ग्रामीण जंगल जाने से कतरा रहे हैं। महुआ, साल पत्ता, लकड़ी और अन्य वनोपज पर निर्भर परिवारों की आजीविका पर सीधा असर पड़ रहा है। रात होते ही गांवों में सन्नाटा छा जाता है और लोग अपने घरों में दुबकने को मजबूर हैं।
पुरानी यादें, नया डर
सारंडा का इतिहास खून और बारूद से लिखा गया है। सड़क उड़ाने, सुरक्षा बलों पर घात लगाकर हमला करने और मुखबिरी के शक में ग्रामीणों की हत्या जैसी घटनाएं आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। नक्सलियों की मौजूदा गतिविधियों ने उन भयावह यादों को फिर से जिंदा कर दिया है।
एलआरपी के बावजूद कैसे घुसपैठ?
एलआरपी का उद्देश्य ही यही होता है कि नक्सलियों की मूवमेंट पर नजर रखी जाए और उन्हें ठिकाना बनाने से रोका जाए। ऐसे में सवाल यह है कि 25-30 हथियारबंद नक्सली इतने बड़े इलाके में कैसे सक्रिय हैं? क्या उन्होंने पहाड़ी और जंगलों की भौगोलिक मजबूती का फायदा उठाया है, या फिर किसी स्तर पर चूक हुई है?
खुफिया तंत्र की परीक्षा
यह समय खुफिया तंत्र की गंभीर परीक्षा का है। ड्रोन सर्विलांस, तकनीकी निगरानी और स्थानीय इनपुट को और मजबूत करने की जरूरत है। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार वे संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी देना चाहते हैं, लेकिन डर के कारण खुलकर सामने नहीं आ पाते।
विकास कार्यों पर मंडराता खतरा
सारंडा में चल रही सड़क, पुल और अन्य विकास योजनाएं पहले ही चुनौतियों से जूझ रही हैं। नक्सली गतिविधियों के बढ़ने से ठेकेदार और मजदूर भयभीत हैं। अगर हालात बिगड़े तो विकास कार्य पूरी तरह ठप हो सकते हैं, जिसका सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा।
पुलिस के लिए खुला अलर्ट
यह स्थिति पुलिस और प्रशासन के लिए खुला अलर्ट है। सिर्फ कैंप स्थापित करना काफी नहीं, बल्कि जंगलों के अंदरूनी इलाकों में लगातार दबाव बनाना जरूरी है। नक्सलियों को यह संदेश जाना चाहिए कि वे कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं।
संयुक्त और निर्णायक कार्रवाई जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि जिला पुलिस, सीआरपीएफ और झारखंड जगुआर के संयुक्त, लंबे और आक्रामक अभियान की जरूरत है। सिर्फ छोटे-मोटे सर्च ऑपरेशन नहीं, बल्कि नक्सलियों की सप्लाई लाइन, मूवमेंट रूट और शरण स्थलों पर सीधा प्रहार होना चाहिए।
ग्रामीणों का भरोसा जीतना सबसे अहम
बंदूक के साथ भरोसा भी जरूरी है। जब तक ग्रामीण खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे, तब तक नक्सलियों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई संभव नहीं। सुरक्षा बलों को ग्रामीणों से संवाद बढ़ाना होगा और उन्हें भरोसा दिलाना होगा कि उनकी पहचान सुरक्षित रहेगी।

इतिहास चेतावनी देता है
सारंडा का इतिहास गवाह है कि छोटी सी लापरवाही भी बड़ी त्रासदी में बदल सकती है। अगर समय रहते सख्त और ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसका खामियाजा फिर निर्दोष ग्रामीणों को भुगतना पड़ेगा।
अंतिम चेतावनी
दर्जनों पुलिस और सीआरपीएफ कैंप, लगातार एलआरपी और निरंतर ऑपरेशन के बावजूद नक्सलियों की सक्रियता एक गंभीर खतरे की घंटी है।
यह सिर्फ खबर नहीं, बल्कि चेतावनी है—अब कार्रवाई में देरी नहीं, वरना सारंडा फिर आग में झुलस सकता है।














