सारंडा के घने जंगल में मुठभेड़, पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा को घेरने के लिए हजारों जवान तैनात
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
एशिया के सबसे बड़े साल वनों वाले सारंडा जंगल में एक बार फिर सुरक्षाबलों और माओवादियों के बीच जबरदस्त टकराव की खबर सामने आई है। जराइकेला थाना क्षेत्र के कोलभोंग और मारंगपोंगा के बीच स्थित घने जंगलों में 7 मार्च की सुबह लगभग साढ़े नौ बजे से सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ शुरू हुई, जो काफी देर तक जारी रही।
सूत्रों के अनुसार सुरक्षाबलों ने पूरे इलाके को चारों तरफ से घेर लिया है और बड़े स्तर पर सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है। इस अभियान में कोबरा बटालियन, सीआरपीएफ, झारखंड जगुआर और जिला पुलिस की संयुक्त टीम शामिल है। सुरक्षा एजेंसियों का एक ही लक्ष्य है—सारंडा जंगल में सक्रिय भाकपा माओवादी के पोलित ब्यूरो सदस्य और एक करोड़ रुपये के इनामी नक्सली मिसिर बेसरा को जिंदा या मृत पकड़ना।

मिसिर बेसरा पर टिकी सुरक्षा एजेंसियों की नजर
सुरक्षाबलों की इस बड़ी कार्रवाई के पीछे सबसे बड़ा कारण माओवादी संगठन के शीर्ष नेताओं में शामिल मिसिर बेसरा की गतिविधियां हैं। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार मिसिर बेसरा लंबे समय से सारंडा और कोल्हान क्षेत्र में सक्रिय है और कई बड़ी नक्सली वारदातों का मास्टरमाइंड माना जाता है।
बताया जा रहा है कि वह अपनी टीम के साथ सारंडा के दुर्गम इलाकों में छिपकर लगातार ठिकाना बदल रहा है। यही कारण है कि सुरक्षाबलों ने इस बार बड़े स्तर पर ऑपरेशन शुरू किया है ताकि उसे हर हाल में दबोचा जा सके।
पुलिस सूत्रों के मुताबिक अगर मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी या मुठभेड़ में उसका अंत हो जाता है, तो यह कोल्हान क्षेत्र में नक्सलवाद के लिए सबसे बड़ा झटका साबित होगा।
हेलिकॉप्टर और ड्रोन से हो रही लगातार निगरानी
ग्रामीणों के अनुसार पिछले दो दिनों से सारंडा के आसमान में सुरक्षा एजेंसियों की गतिविधियां काफी तेज हो गई हैं।
स्थानीय लोगों ने बताया कि 7 मार्च को दो से तीन बार हेलिकॉप्टर को जंगल के ऊपर मंडराते देखा गया। वहीं 6 मार्च को भी लगभग चार से पांच बार हेलिकॉप्टर इलाके में चक्कर लगाते नजर आए थे।
इसके अलावा सुरक्षा बलों द्वारा आधुनिक तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। अलग-अलग समय में कई घंटों तक ड्रोन आसमान में उड़ते देखे गए, जो जंगल के हर हिस्से की निगरानी कर रहे हैं।
ड्रोन के माध्यम से सुरक्षाबलों को नक्सलियों की संभावित गतिविधियों और उनके छिपे ठिकानों की जानकारी जुटाने में काफी मदद मिल रही है।
पतझड़ और गर्मी ने नक्सलियों की मुश्किलें बढ़ाईं
सारंडा जंगल में इन दिनों पतझड़ का मौसम चल रहा है। पेड़ों से पत्ते तेजी से झड़ रहे हैं और गर्मी के कारण कई छोटे जल स्रोत भी सूखने लगे हैं।
इस मौसम का सबसे बड़ा असर नक्सलियों पर पड़ रहा है। जंगल में छिपकर रहने वाले नक्सलियों के लिए अब छिपना पहले की तुलना में ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है।
घने पत्तों की आड़ खत्म होने से सुरक्षाबलों को अब जंगल के अंदर गतिविधियों पर नजर रखना आसान हो गया है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मौसम नक्सलियों के खिलाफ चल रहे अभियान को और तेज करने में मददगार साबित होगा।
सूखे पत्तों के बीच छिपे हैं मौत के जाल
हालांकि सुरक्षाबलों के लिए भी यह अभियान आसान नहीं है। जंगल में जमीन पर गिरे सूखे पत्ते एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आ रहे हैं।
नक्सलियों द्वारा लगाए गए आईईडी और प्रेशर बम अक्सर इन पत्तों के नीचे छिपे होते हैं, जिन्हें पहचानना बेहद कठिन हो जाता है।
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार नक्सली अक्सर रास्तों और संभावित मूवमेंट एरिया में आईईडी लगाकर जवानों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं।
यही कारण है कि हर कदम बेहद सावधानी के साथ बढ़ाया जा रहा है और बम निरोधक दस्ते भी ऑपरेशन में शामिल किए गए हैं।
सारंडा के चारों तरफ बढ़ी पुलिस की गतिविधियां
इन दिनों सारंडा के चारों तरफ सुरक्षा बलों की गतिविधियां तेज हो गई हैं। जंगल के आसपास के इलाकों में लगातार गश्ती अभियान चलाया जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक हजारों जवान इस बड़े अभियान में लगे हुए हैं। अलग-अलग दिशाओं से सुरक्षाबलों की टीम जंगल में प्रवेश कर नक्सलियों की तलाश कर रही है।
हालांकि अब तक कई बार ऐसा हुआ है कि घेराबंदी के बावजूद नक्सली जंगल की आड़ लेकर भाग निकलने में सफल हो जाते हैं।
लेकिन इस बार सुरक्षा एजेंसियों ने रणनीति में कई बदलाव किए हैं और माना जा रहा है कि जल्द ही बड़ा परिणाम सामने आ सकता है।

ग्रामीणों में दहशत, लेकिन उम्मीद भी
सारंडा के आसपास के गांवों में रहने वाले ग्रामीणों में इस अभियान को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।
एक तरफ जहां जंगल में लगातार हो रही गोलियों की आवाज से लोगों में दहशत है, वहीं दूसरी तरफ उन्हें उम्मीद भी है कि अगर यह अभियान सफल होता है तो क्षेत्र से नक्सलवाद का खात्मा संभव हो सकेगा।
ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से नक्सलवाद की वजह से विकास कार्य बाधित होते रहे हैं और आम लोगों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा है।
हथियार छोड़ें और मुख्यधारा में लौटें नक्सली
सुरक्षा एजेंसियां लगातार नक्सलियों से आत्मसमर्पण करने की अपील भी कर रही हैं।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सरकार की पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को समाज की मुख्यधारा में लौटने का अवसर दिया जाता है।
जो नक्सली हथियार छोड़कर सामान्य जीवन जीना चाहते हैं, उनके लिए सरकार रोजगार, आर्थिक सहायता और सुरक्षा की व्यवस्था करती है।
सारंडा को नक्सल मुक्त बनाने की निर्णायक लड़ाई
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सारंडा में चल रहा यह अभियान नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई साबित हो सकता है।
अगर इस ऑपरेशन में शीर्ष नक्सली नेताओं को पकड़ने या खत्म करने में सफलता मिलती है, तो कोल्हान क्षेत्र में माओवादी नेटवर्क को बड़ा झटका लगेगा। सारंडा कभी नक्सलियों का सबसे सुरक्षित ठिकाना माना जाता था, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। सुरक्षाबलों की लगातार कार्रवाई और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से नक्सलियों की जमीन तेजी से खिसक रही है।
अब सवाल यह है कि क्या इस बार सुरक्षा एजेंसियां मिसिर बेसरा और उसकी टीम को पकड़ने में सफल होंगी, या फिर नक्सली एक बार फिर जंगल की आड़ लेकर बच निकलेंगे।
फिलहाल सारंडा के जंगलों में गोलियों की गूंज और हेलिकॉप्टर की आवाज यह संकेत दे रही है कि नक्सलवाद के खिलाफ यह लड़ाई अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है।














