सटीक रणनीति, हाईटेक तकनीक और खुफिया प्लानिंग से ढहा नक्सल साम्राज्य
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
सारंडा का जंगल सिर्फ पेड़ों का विस्तार नहीं रहा है, बल्कि दशकों तक यह माओवादी हिंसा, भय और साजिशों का सबसे मजबूत गढ़ रहा। लेकिन अब यही जंगल झारखण्ड पुलिस और केंद्रीय बलों की अब तक की सबसे बड़ी रणनीतिक जीत का गवाह बन चुका है। झारखण्ड पुलिस, कोबरा, सीआरपीएफ, झारखण्ड जगुआर और जिला पुलिस के संयुक्त ऑपरेशन ने न सिर्फ 15 कुख्यात इनामी नक्सलियों को मार गिराया, बल्कि पूरे सारंडा नेटवर्क को जड़ से उखाड़ दिया।
ऑपरेशन से पहले माइंड गेम
संचार नेटवर्क पर नियंत्रण, नक्सलियों की आंख-कान बंद
इस ऑपरेशन की असली ताकत बंदूक से पहले रणनीतिक तैयारी थी। पुलिस को यह स्पष्ट जानकारी थी कि सारंडा में नक्सलियों की सबसे बड़ी ताकत उनका ग्रामीण और समर्थक नेटवर्क है, जो हर मूवमेंट की सूचना तुरंत पहुंचा देता था।
इसी कड़ी में पुलिस ने—
* सारंडा के अंदर विभिन्न कंपनियों की मोबाइल संचार * सेवाओं को जरूरत अनुसार बाधित और नियंत्रित किया
* लगभग दो दिनों तक नेटवर्क बेहद कमजोर या ठप रखा गया
* नक्सलियों को किसी भी बाहरी संपर्क से काट दिया गया
नतीजा यह हुआ कि न तो नक्सली भाग सके, न ही अपने दस्ते को इकट्ठा कर पाए।
ड्रोन, सैटेलाइट मैपिंग और रियल टाइम इनपुट
आसमान से जमीन तक निगरानी
इस ऑपरेशन में परंपरागत पुलिस कार्रवाई से कहीं आगे जाकर हाईटेक युद्ध रणनीति अपनाई गई—
* लॉन्ग रेंज ड्रोन से जंगल के भीतर कैंप, मूवमेंट और हथियार छिपाने के स्थान चिन्हित किए गए
* थर्मल इमेजिंग के जरिए पेड़ों और झाड़ियों में छिपे नक्सलियों की उपस्थिति पकड़ी गई
* सैटेलाइट मैपिंग और पुराने नक्सल रूट्स का डिजिटल विश्लेषण किया गया
* रियल टाइम कम्युनिकेशन से फील्ड कमांडरों को पल-पल की जानकारी मिलती रही
यानी यह सिर्फ मुठभेड़ नहीं, बल्कि डेटा-ड्रिवन ऑपरेशन था।
चार स्तरीय घेराबंदी
बचने का एक भी रास्ता नहीं छोड़ा गया
पुलिस की योजना स्पष्ट थी—
नक्सलियों को पीछे हटने, बिखरने या छिपने का मौका नहीं देना।
* बाहरी घेरा – जिला पुलिस और झारखण्ड जगुआर
* मध्य घेरा – सीआरपीएफ
* आंतरिक घेरा – कोबरा
* रिजर्व यूनिट – संभावित मूवमेंट और पलायन रोकने के लिए
जब नक्सलियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू की, तब उन्हें समझ आ गया कि वे पूरी तरह फंस चुके हैं।
15 इनामी नक्सली ढेर
करोड़ों का इनाम, सैकड़ों मामले, अलग-अलग जिले
इस ऑपरेशन में मारे गए नक्सली सिर्फ संख्या नहीं थे, बल्कि संगठन की पूरी रीढ़ थे। नीचे सभी मारे गए इनामी नक्सलियों का इनाम, पद, आपराधिक इतिहास और मूल निवास —
1. अनल उर्फ पतिराम मांझी (CCM)
इनाम:
झारखण्ड ₹1 करोड़
उड़ीसा ₹1 करोड़ 20 लाख
एनआईए ₹15 लाख
कुल मामले: 149
निवासी: झरहा गांव, पीरटांड थाना, गिरिडीह
👉 कोल्हान और उड़ीसा सीमा पर हिंसा का मास्टरमाइंड

2. अनमोल उर्फ सुशांत / लालचंद हेंब्रम (BJSAC)
इनाम:
झारखण्ड ₹25 लाख
उड़ीसा ₹65 लाख
कुल मामले: 149
निवासी: बंसी टोला, नावाडीह, बोकारो
👉 सारंडा में नक्सल संगठन का असली स्तंभ

3. अमित मुण्डा (RCM)
इनाम:
झारखण्ड ₹15 लाख
उड़ीसा ₹43 लाख
एनआईए ₹4 लाख
कुल मामले: 96
निवासी: तमराना, तमाड़, रांची
4. पिंटु लोहरा (SZC)
इनाम: ₹5 लाख (झारखण्ड)
कुल मामले: 47
निवासी: बारीसालडीह, सोनाहातू, रांची
5. लालजीत उर्फ लालु (SZC)
इनाम: ₹5 लाख
निवासी: धारणादिरी, किरीबुरू, चाईबासा
6. राजेश मुण्डा (ACM)
कुल मामले: 14
निवासी: माईलपिड़ी, अड़की, खूंटी
7. बुलबुल अलडा (ACM)
कुल मामले: 8
निवासी: ईलीगढ़ा, तांतनगर, चाईबासा
8. बबिता (ACM)
कुल मामले: 16
निवासी: कोरर्रा, कुचाई, सरायकेला
9. पूर्णिमा (ACM)
कुल मामले: 5
निवासी: ईचागोडा, गोईलकेरा, चाईबासा
10. सुरजमुनी (कैडर)
सक्रिय महिला नक्सली, सप्लाई और मूवमेंट में भूमिका
11. जोंगा (कैडर)
कुल मामले: 1
निवासी: बोईपाई ससांग, गोईलकेरा, चाईबासा
2022 से सारंडा में खून की पटकथा
हर बड़े हमले के पीछे अनल दा का दस्ता
आईईडी ब्लास्ट, घात लगाकर हमले, लैंडमाइन, पुलिस पार्टी पर फायरिंग—
2022 से अबतक कोल्हान-सारंडा में हुई ज्यादातर घटनाओं में अनल उर्फ पतिराम मांझी का दस्ता शामिल रहा।
यही वजह थी कि पुलिस ने पहले सिर काटने की रणनीति अपनाई।
सारंडा का भूगोल: वरदान से कब्रगाह तक
जो जंगल बचाता था, वही अब धोखा दे गया
घना साल वन
सीमित सड़कें
उड़ीसा-झारखण्ड सीमा
पहाड़ी और नाले
यही वजह थी कि सारंडा दशकों तक नक्सलियों का सुरक्षित ठिकाना बना। लेकिन ड्रोन, डिजिटल मैपिंग और आधुनिक रणनीति ने जंगल के फायदे को बेअसर कर दिया।
स्थानीय लोग भी चाहते थे अंत
नक्सल से ऊब चुका था सारंडा
नक्सलियों की जबरन वसूली, धमकी, बच्चों की भर्ती और विकास कार्यों पर रोक से ग्रामीण त्रस्त थे। पुलिस को इस बार खामोश समर्थन मिला—जो किसी भी ऑपरेशन में निर्णायक होता है।
माओवादी संगठन में भगदड़
बचे हुए कैडर या भाग रहे या टूट रहे
शीर्ष नेतृत्व के खत्म होते ही—
छोटे दस्ते बिखर गए
कई कैडर जंगल छोड़ने लगे
आत्मसमर्पण की संभावनाएं तेज

यह मुठभेड़ नहीं, नक्सल युग का अंत है
सारंडा में हुआ यह ऑपरेशन साबित करता है कि—
अब नक्सलवाद बंदूक से नहीं, रणनीति से हारा जा रहा है।
यह सिर्फ 15 नक्सलियों की मौत नहीं, बल्कि
👉 सारंडा से डर की विदाई
👉 झारखण्ड में शांति की मजबूत नींव
अब सवाल नहीं “नक्सल खत्म होंगे या नहीं”
अब सवाल है—
विकास कितनी तेजी से सारंडा पहुंचेगा।














