आत्मसमर्पण के बाद मिली थी नई जिंदगी की उम्मीद, अब अलग-अलग थानों के नोटिस से फिर बढ़ी परेशानी
रिपोर्ट शैलेश सिंह
छोटानागरा। सारंडा के छोटानागरा थाना क्षेत्र अंतर्गत तलीघाट निवासी पूर्व नक्सली दंपती मुगा चांपिया (56 वर्ष), पिता स्वर्गीय कोए चांपिया और उनकी पत्नी सुरसो चांपिया ने करीब दो वर्ष पूर्व हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया था। दोनों ने 11 अप्रैल 2024 को टोंटो थाना में पहुंचकर पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया था। सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति के तहत उन्हें हजारीबाग स्थित ओपन जेल भेजा गया, जहां निर्धारित अवधि पूरी करने के बाद वे बाहर आए।

सरेंडर के बाद मिली थी आर्थिक सहायता
मुगा चांपिया के अनुसार, आत्मसमर्पण नीति के तहत सरकार की ओर से उन्हें 50 हजार रुपये की आर्थिक सहायता सहित अन्य लाभ दिए गए थे। ओपन जेल में लगभग तीन महीने रहने के बाद जब वे बाहर आए तो उन्हें उम्मीद थी कि अब वे सामान्य ग्रामीण की तरह अपना जीवन शुरू कर सकेंगे और परिवार के साथ शांतिपूर्वक रह पाएंगे।
लेकिन ओपन जेल से बाहर आने के बाद भी उनकी मुश्किलें खत्म नहीं हुईं।
पुलिस ने प्रमाण पत्र देकर माना—11 अप्रैल 2024 को किया था आत्मसमर्पण
टोंटो थाना पुलिस की ओर से जारी प्रमाण पत्र में पूर्व नक्सली मुगा चांपिया के आत्मसमर्पण की आधिकारिक पुष्टि की गई है। प्रमाण पत्र के अनुसार, तितलीघाट, थाना छोटानागरा, जिला पश्चिमी सिंहभूम, चाईबासा निवासी मुगा चांपिया, उम्र 54 वर्ष, पिता स्वर्गीय कोय चांपिया, भाकपा माओवादी संगठन के सक्रिय सदस्य रहे हैं और उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने 11 अप्रैल 2024 को सक्षम प्राधिकारी के समक्ष आत्मसमर्पण किया था।

अलग-अलग थानों से आ रहे नोटिस
मुगा चांपिया का कहना है कि वर्तमान में उन्हें जराइकेला, गोइलकेरा और सोनुआ थाना से अलग-अलग नोटिस मिल रहे हैं। इन नोटिसों के कारण उन्हें बार-बार पुलिस और न्यायालय का चक्कर लगाना पड़ रहा है।
उनका कहना है कि आत्मसमर्पण के बाद उन्हें लगा था कि पुराने मामलों से संबंधित कानूनी प्रक्रिया सरकार की नीति के तहत स्पष्ट हो जाएगी। लेकिन अब बार-बार नोटिस मिलने से वे मानसिक और आर्थिक परेशानी से गुजर रहे हैं।
चाईबासा न्यायालय के चक्कर में खर्च हो गई सहायता राशि
मुगा चांपिया ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा कि आत्मसमर्पण के बाद सरकार से मिली आर्थिक सहायता का बड़ा हिस्सा चाईबासा न्यायालय आने-जाने और वकील की फीस में खर्च हो चुका है।
उन्होंने कहा कि जिस आर्थिक मदद को नई जिंदगी शुरू करने में लगाना था, उसका करीब आधा हिस्सा कानूनी प्रक्रिया में ही समाप्त हो गया। ऐसे में परिवार के सामने आगे जीवन चलाने की भी चिंता खड़ी हो गई है।
सवाल—जब ओपन जेल भेजा गया, तब पुराने मामलों की जानकारी क्यों नहीं हुई?
पूर्व नक्सली दंपती की परेशानी के बीच सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब दोनों ने पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया, सरकार की पुनर्वास नीति के तहत उन्हें हिरासत में लेकर हजारीबाग ओपन जेल भेजा गया और निर्धारित प्रक्रिया पूरी कर बाहर आने दिया गया, तब उनके खिलाफ लंबित मामलों और कानूनी प्रक्रिया की स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की गई?
यदि संबंधित एजेंसियों और पुलिस को पुराने मामलों की जानकारी थी, तो आत्मसमर्पण के बाद ही इसकी समुचित कानूनी प्रक्रिया पूरी क्यों नहीं की गई? और यदि प्रक्रिया पहले से चल रही थी, तो ओपन जेल से बाहर आने के बाद बार-बार अलग-अलग थानों से नोटिस मिलने की स्थिति क्यों पैदा हुई?
जिस कारण आत्मसमर्पण किया, उसी मामले को लेकर आज भी परेशानी
मुगा चांपिया के अनुसार, जिन मामलों को लेकर वे और उनकी पत्नी पहले से परेशान थे और जिन परिस्थितियों में उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण किया, आज भी उन्हीं मामलों को लेकर उन्हें पुलिस और न्यायालय के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
इस स्थिति ने आत्मसमर्पण नीति के उद्देश्य को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार की नीति का मूल उद्देश्य हिंसा का रास्ता छोड़ चुके लोगों को समाज की मुख्यधारा में वापस लाना और उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर देना है। ऐसे में यदि आत्मसमर्पण के बाद भी पुराने मामलों की कानूनी उलझनें वर्षों तक उनका पीछा करती रहेंगी, तो पुनर्वास की प्रक्रिया कितनी प्रभावी होगी, यह विचारणीय विषय है।

मुंडा के साथ छोटानागरा थाना पहुंचे मुगा चांपिया
29 अगस्त को मुगा चांपिया अपने गांव के मुंडा मंचूरिया सिद्धू के साथ छोटानागरा थाना पहुंचे। दोनों ने थाना प्रभारी से मुलाकात कर अपनी परेशानी रखी और मामले में न्यायोचित समाधान की गुहार लगाई।
मुगा चांपिया ने पुलिस से आग्रह किया कि आत्मसमर्पण के बाद सरकार की नीति के तहत उन्हें जो प्रक्रिया पूरी करनी थी, उसकी स्थिति स्पष्ट की जाए तथा अलग-अलग थानों से मिल रहे नोटिसों के कारण उन्हें बार-बार होने वाली परेशानी से राहत दिलाई जाए।
सरकार की आत्मसमर्पण नीति पर भरोसा रखने वाले दंपती की गुहार
गौरतलब है कि मुगा चांपिया और उनकी पत्नी सुरसो चांपिया पूर्व में सक्रिय नक्सली रहे हैं। उन्होंने झारखंड सरकार और पुलिस की आत्मसमर्पण नीति से प्रभावित होकर हिंसा का रास्ता छोड़ने और समाज की मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया था।
आज वही दंपती प्रशासन से यह उम्मीद लगाए बैठा है कि आत्मसमर्पण के बाद शुरू हुई पुनर्वास की प्रक्रिया को मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाए और उन्हें बार-बार होने वाली कानूनी एवं आर्थिक परेशानी से राहत दिलाने के लिए स्पष्ट समाधान निकाला जाए।
पूर्व नक्सली दंपती की यह कहानी केवल एक परिवार की परेशानी नहीं, बल्कि इस बात पर भी सोचने को मजबूर करती है कि जो लोग हथियार छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने का साहस करते हैं, उनके पुनर्वास की प्रक्रिया कितनी सरल, स्पष्ट और मानवीय होनी चाहिए।













