रात के अंधेरे में दुकान निर्माण और गीटार तार से सरकारी जमीन की घेराबंदी का आरोप, राई भूमिज ने बीडीओ-सीओ से की शिकायत; कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन की चेतावनी
रिपोर्ट शैलेश सिंह
जगन्नाथपुर अंचल के जैतगढ़ में प्रत्येक शनिवार को लगने वाला क्षेत्र का प्रमुख साप्ताहिक बाजार इन दिनों कथित अतिक्रमण को लेकर चर्चा में है। बाजार में दूर-दराज के गांवों से पहुंचने वाले आदिवासी-मूलवासी किसान, छोटे व्यवसायी और गरीब ग्रामीण अपनी कृषि उपज, साग-सब्जी, वनोत्पाद एवं अन्य सामान बेचकर परिवार की आजीविका चलाते हैं। लेकिन बाजार की सरकारी जमीन पर कथित रूप से लगातार कब्जे की कोशिशों ने इन छोटे विक्रेताओं के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है।
स्थानीय लोगों और पूर्व प्रखंड अध्यक्ष भाजपा सह समाजसेवी राई भूमिज का आरोप है कि बाजार की सरकारी भूमि के कुछ हिस्सों में कुछ लोगों द्वारा रात के अंधेरे में कथित रूप से दुकान निर्माण का काम कराया जा रहा है। कहीं नींव तैयार की जा रही है तो कहीं छत की ढलाई और एल्बेस्टर लगाने का कार्य किए जाने की बात कही जा रही है। आरोप यह भी है कि सरकारी जमीन के अलग-अलग हिस्सों की गीटार तार से लगातार घेराबंदी की जा रही है, ताकि धीरे-धीरे सार्वजनिक जमीन पर कब्जे का रास्ता तैयार किया जा सके।

पहले घेराबंदी, फिर निर्माण और बाद में कब्जे की आशंका
राई भूमिज का कहना है कि सरकारी बाजार की जमीन को पहले तार से घेरकर उसे निजी जमीन की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है। यदि समय रहते प्रशासन ने इस पर रोक नहीं लगाई तो आने वाले दिनों में इन्हीं स्थानों पर दुकान और मकान खड़े कर दिए जाने की आशंका है। इससे बाजार की बची हुई सार्वजनिक जमीन भी धीरे-धीरे खत्म हो सकती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस सरकारी बाजार की जमीन पर वर्षों से ग्रामीण गरीब किसान अपनी मेहनत की उपज बेचकर परिवार का पेट पालते आ रहे हैं, यदि वही जमीन कथित अतिक्रमण की चपेट में आती रही तो इन लोगों के लिए बाजार में जगह कहां बचेगी?

गरीबों की जगह सिकुड़ रही, अतिक्रमणकारियों का दायरा बढ़ने का आरोप
जैतगढ़ साप्ताहिक बाजार में प्रत्येक शनिवार बड़ी संख्या में ग्रामीण पहुंचते हैं। कई किसान अपने खेतों से लाई सब्जियां, फल, अनाज और अन्य कृषि उत्पाद बेचते हैं। वहीं जंगल पर निर्भर ग्रामीण वनोत्पाद लेकर बाजार पहुंचते हैं। छोटे दुकानदार और ग्रामीण परिवारों के लिए यह बाजार स्थानीय स्तर पर आय का महत्वपूर्ण साधन है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि बाजार की जमीन पर धीरे-धीरे हो रहे कथित कब्जे के कारण सार्वजनिक स्थान कम होता जा रहा है। इसका सीधा असर उन गरीब विक्रेताओं पर पड़ रहा है, जिनके पास अपनी दुकान लगाने के लिए अलग से जमीन या संसाधन नहीं हैं।
राई भूमिज ने सवाल उठाया कि यदि सरकारी बाजार की जमीन ही धीरे-धीरे निजी कब्जे में चली जाएगी तो आदिवासी और गरीब ग्रामीण आखिर अपनी कृषि उपज और वनोत्पाद कहां बेचेंगे? उन्होंने कहा कि सरकारी जमीन किसी व्यक्ति विशेष की संपत्ति नहीं है। यह सार्वजनिक उपयोग की जमीन है और इसका संरक्षण प्रशासन की जिम्मेदारी है।

बीडीओ और अंचलाधिकारी से शिकायत, जांच और अतिक्रमण हटाने की मांग
मामले को लेकर राई भूमिज ने जगन्नाथपुर के प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) और अंचलाधिकारी (सीओ) से शिकायत करते हुए जैतगढ़ साप्ताहिक बाजार की सरकारी भूमि की तत्काल जांच एवं मापी कराने की मांग की है।
उन्होंने प्रशासन से यह भी मांग की है कि बाजार की सरकारी जमीन की सीमाओं को स्पष्ट रूप से चिह्नित किया जाए, कथित रूप से की गई घेराबंदी और निर्माण की जांच कराई जाए तथा यदि जांच में अतिक्रमण की पुष्टि होती है तो उसे तत्काल हटाया जाए।
उन्होंने कहा कि केवल कागजी जांच से काम नहीं चलेगा। प्रशासन को मौके पर पहुंचकर सरकारी भूमि की वास्तविक स्थिति देखनी होगी और यह पता लगाना होगा कि बाजार की कितनी जमीन पर कब्जे या कब्जे की तैयारी की जा रही है।

“कार्रवाई नहीं हुई तो सड़क पर उतरेंगे”
राई भूमिज ने प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा कि जैतगढ़ बाजार की सरकारी भूमि को किसी भी परिस्थिति में निजी कब्जे में जाने नहीं दिया जाएगा। यदि शिकायत के बावजूद प्रशासन ने समय रहते जांच कर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं की तो ग्रामीणों और प्रभावित छोटे विक्रेताओं को साथ लेकर सरकार और प्रशासन के खिलाफ बड़ा आंदोलन शुरू किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि यह सिर्फ जमीन का मामला नहीं है, बल्कि उन गरीब आदिवासी-मूलवासी ग्रामीणों की आजीविका का सवाल है, जो वर्षों से इसी बाजार में अपनी कृषि उपज, साग-सब्जी और वनोत्पाद बेचकर परिवार का पालन-पोषण करते हैं।
अब देखना यह है कि जैतगढ़ साप्ताहिक बाजार की सरकारी जमीन को लेकर सामने आए इन गंभीर आरोपों पर प्रशासन कितनी तत्परता दिखाता है और क्या मौके पर जांच कर कथित अतिक्रमण की वास्तविक स्थिति सामने लायी जाती है।













