झारखंड मज़दूर संघर्ष संघ कार्यालय में ध्वजारोहण, शहादत और संघर्ष को किया गया याद
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
मेघाहातुबुरु स्थित झारखंड मज़दूर संघर्ष संघ कार्यालय परिसर में अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस International Workers’ Day के अवसर पर श्रमिकों के सम्मान और उनके संघर्षों की स्मृति में कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस दौरान यूनियन के पदाधिकारी कामता प्रसाद ने ध्वजारोहण किया और श्रमिक एकता का संदेश दिया।
कार्यक्रम में यूनियन के महासचिव अफ़ताब आलम समेत अमरनाथ यादव, इंतखाब आलम, गोपिनाथ पान, अजीत गोप, राजेश बनर्जी, सोमनाथ साहू, अमित राउत, सत्यजीत साहू, एमडी नसीम, राजीव दास, प्रकाश हेम्ब्रम, सुदर्शन पान, पंचानंद नायक, जगदीश होनहागा, सचिन जेवियर टोपनो, सोमा नाग, नकुल गोप और बासुदेव करुवा सहित कई श्रमिक और पदाधिकारी मौजूद रहे।

मजदूर दिवस का इतिहास: खून और संघर्ष से मिला अधिकार- अफताब आलम
8 घंटे काम का अधिकार आसान नहीं था
मजदूर दिवस की जड़ें 19वीं सदी के उस दौर में हैं, जब श्रमिकों से 12 से 16 घंटे तक काम लिया जाता था और उन्हें न्यूनतम सुविधाएं भी नहीं मिलती थीं। उक्त बातें महासचिव अफताब आलम ने कही।1 मई 1886 को अमेरिका के शिकागो में श्रमिकों ने “8 घंटे काम, 8 घंटे आराम और 8 घंटे अपने लिए” की मांग को लेकर ऐतिहासिक आंदोलन किया।
इस आंदोलन के दौरान पुलिस और श्रमिकों के बीच हुई हिंसक झड़प में कई मजदूरों ने अपनी जान गंवाई। यही शहादत आगे चलकर मजदूर दिवस की नींव बनी और दुनिया भर में श्रमिक अधिकारों के लिए संघर्ष का प्रतीक बन गई।
सेल और औद्योगिक क्षेत्रों में मजदूरों की भूमिका
पसीने से बनी उद्योग की नींव
झारखंड, विशेषकर सिंहभूम क्षेत्र, लौह अयस्क और इस्पात उद्योग के लिए जाना जाता है। Steel Authority of India Limited (सेल) जैसे बड़े सार्वजनिक उपक्रमों की नींव मजदूरों के खून-पसीने से तैयार हुई है।
खदानों में काम करने वाले मजदूरों ने—
* कठिन परिस्थितियों में काम किया
* दुर्घटनाओं और जोखिम का सामना किया
* कई बार अपनी जान तक गंवाई
इनकी मेहनत ने देश के औद्योगिक विकास को गति दी, लेकिन इसके बदले उन्हें हमेशा पर्याप्त सुरक्षा और सम्मान नहीं मिला।
शोषण और संघर्ष की लंबी कहानी
अधिकारों के लिए लगातार लड़ाई
मजदूरों का इतिहास सिर्फ मेहनत का नहीं, बल्कि शोषण और संघर्ष का भी रहा है।
* कम वेतन
* असुरक्षित कार्यस्थल
* ठेका प्रथा का दबाव
* सामाजिक सुरक्षा का अभाव
इन समस्याओं के खिलाफ मजदूरों ने लगातार आवाज उठाई। यूनियनों का गठन इसी संघर्ष का परिणाम है, जिसने मजदूरों को संगठित होकर लड़ने की ताकत दी।
झारखंड मज़दूर संघर्ष संघ भी उसी परंपरा का हिस्सा है, जो मजदूरों के अधिकारों के लिए लगातार प्रयासरत है।

शहादत को नमन, एकता का आह्वान
कार्यक्रम में गूंजा मजदूर एकता का संदेश
मेघाहातुबुरु में आयोजित कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने मजदूर दिवस के महत्व पर प्रकाश डाला और श्रमिकों की कुर्बानियों को याद किया।
नेताओं ने कहा—
“आज जो अधिकार हमें मिले हैं, वे किसी की दया से नहीं, बल्कि मजदूरों के संघर्ष और शहादत का परिणाम हैं।”
कार्यक्रम में सभी ने एकजुट होकर मजदूरों के हितों की रक्षा करने और उनके अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रखने का संकल्प लिया।
आज भी जारी है संघर्ष
नई चुनौतियां, पुरानी लड़ाई
भले ही समय बदल गया हो, लेकिन मजदूरों की समस्याएं आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।
* ठेका प्रणाली
* अस्थायी रोजगार
* महंगाई के अनुरूप वेतन का अभाव
ये सभी मुद्दे आज भी मजदूरों के सामने चुनौती बने हुए हैं।
मजदूर ही राष्ट्र की असली ताकत
सम्मान और अधिकार की जरूरत
मजदूर दिवस सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि यह याद दिलाने का दिन है कि देश के विकास की असली ताकत मजदूर ही हैं।
मेघाहातुबुरु में आयोजित यह कार्यक्रम न केवल श्रमिकों को सम्मान देने का प्रयास था, बल्कि यह संदेश भी था कि—
“जब तक मजदूर एकजुट रहेंगे, तब तक उनके अधिकार सुरक्षित रहेंगे।”
आज जरूरत है कि समाज और सरकार दोनों मिलकर मजदूरों को वह सम्मान और सुरक्षा दें, जिसके वे हकदार हैं। तभी मजदूर दिवस की असली भावना साकार हो सकेगी।














