रिपोर्ट: शैलेश सिंह
पश्चिम सिंहभूम के कोल्हान रिजर्व वन क्षेत्र अंतर्गत दुगुनिया, डेरवा समेत आसपास के गांव वर्षों से नक्सलियों के मजबूत गढ़ रहे हैं। इन गांवों के दर्जनों युवक-युवतियां कभी नक्सली संगठन का हिस्सा रहे—कुछ जेल पहुंचे, तो कुछ पहचान छुपाकर दूसरे राज्यों में मजदूरी कर रहे हैं। बावजूद इसके, अब भी कई लोग संगठन से जुड़े होने की बात सामने आ रही है।

रमेश चांपिया: सहयोगी से ‘शिकार’ बनने तक का रहस्य
दुगुनिया निवासी रमेश चांपिया भी कभी नक्सलियों का सहयोगी रहा था। पुलिस ने उसे दो साल पहले गिरफ्तार कर जेल भेजा था, जहां से वह 7-8 महीने पहले ही छूटा था। जेल से बाहर आने के बाद वह डेरवा से नंदपुर तक बन रही सड़क निर्माण में मुंशी का काम कर रहा था।
अब उसकी हत्या कथित नक्सलियों द्वारा कर दी गई—लेकिन सवाल यह है कि आखिर क्यों?
* पत्नी के अनुसार, जेल से छूटने के बाद कोई धमकी नहीं मिली
* संगठन में वापस आने का दबाव भी नहीं बनाया गया
* या फिर रमेश का नक्सलियों से कोई गुप्त संपर्क था, जिसकी जानकारी परिवार को नहीं थी
इस हत्याकांड ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब अभी तक नहीं मिल पाया है।
नक्सली दस्ता और फंसी हुई ज़िंदगी: एक युवती की कहानी
सूत्रों के मुताबिक, दुगुनिया गांव की एक युवती एक कुख्यात इनामी नक्सली से शादी कर दस्ते में शामिल है। बताया जा रहा है कि वह आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटना चाहती है, लेकिन—
* संगठन से इजाजत नहीं मिल रही
* या वह अपने नक्सली पति को छोड़कर भाग नहीं पा रही
यह कहानी नक्सली संगठन के अंदर की सच्चाई और बंधन को उजागर करती है।
कुमडी क्षेत्र में नक्सलियों की ‘भूख’ और ग्रामीणों का प्रतिरोध
इसी बीच, गोइलकेरा थाना अंतर्गत कुमडी क्षेत्र में 24-25 अप्रैल की रात करीब 10 हथियारबंद नक्सली एक दुकान पर पहुंचे और राशन लेने की कोशिश की। लेकिन दुकान नहीं खुली।
ग्रामीणों ने शक होते ही लाठी-डंडे, तीर-धनुष के साथ मोर्चा संभाल लिया। बढ़ते विरोध को देख नक्सली मौके से भाग निकले। इसके बाद ग्रामीण सुबह 4 बजे तक गांव में पहरा देते रहे।
यह घटना साफ इशारा करती है कि नक्सलियों की सप्लाई लाइन कमजोर पड़ चुकी है।

सारंडा–कोल्हान: नक्सलियों का ‘सेफ कॉरिडोर’ अब भी चुनौती
सारंडा और कोल्हान के घने जंगल एक-दूसरे से सटे हैं और नक्सलियों के लिए वर्षों से सुरक्षित कॉरिडोर बने हुए हैं।
सारंडा के कुमडीह, बहदा, तितलीघाट, होजरदोरी से लेकर मारांगपोंगा, दुबिल, संकुरा, कुंबिया और सलाई तक फैले पहाड़ी रास्तों से नक्सली आसानी से कोल्हान के गमहरिया, रेला, पराल, सांगाजाटा, बेरोई आदि तक आवाजाही करते है।
इस दुर्गम भूगोल के कारण पूरे इलाके की घेराबंदी के लिए 20 हजार से ज्यादा जवानों की जरूरत मानी जा रही है—जो फिलहाल संभव नहीं है।
एक करोड़ के इनामी नक्सली पर शिकंजा, जंगल में ‘मौत का साया’
कठिन परिस्थितियों के बावजूद पुलिस, सीआरपीएफ और कोबरा लगातार ऑपरेशन चला रही है।
मिसिर बेसरा, अशिम मंडल, मोछू, अश्विन, सागेन अंगारिया जैसे m इनामी नक्सली लगातार दबाव में हैं।
अब हालात ऐसे हैं कि—
* नक्सली हर रात मौत के साए में जी रहे हैं
* जंगलों में उनका ठहराव अस्थायी हो गया है

अब बदल रहा है जंगल का मिजाज
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब जंगल और जंगल के गांव—दोनों नक्सलियों के खिलाफ खड़े होते दिख रहे हैं।
ग्रामीणों का प्रतिरोध, युवाओं का मोहभंग और लगातार सुरक्षा दबाव—इन सबने नक्सलियों की जमीन कमजोर कर दी है।
आखिरी सवाल: आत्मसमर्पण ही विकल्प?
हालात साफ संकेत दे रहे हैं—
👉 नक्सलियों के लिए अब जंगल सुरक्षित नहीं रहा
👉 ग्रामीणों का समर्थन घटता जा रहा है
👉 सुरक्षा बलों का दबाव लगातार बढ़ रहा है
ऐसे में नक्सलियों के पास एक ही रास्ता बचता दिख रहा है—
मुख्यधारा में लौटना और आत्मसमर्पण करना।
क्योंकि अब यह लड़ाई विचारधारा से ज्यादा अस्तित्व की बन चुकी है।













