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सारंडा में उबल रहा आक्रोश: “वादा खिलाफी नहीं चलेगी” – ग्रामीणों ने दी खदान बंदी की चेतावनी

On: April 28, 2026 6:03 PM
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रांजाबुरु खदान पर संकट के बादल, रोजगार और हक के लिए निर्णायक लड़ाई की तैयारी

रिपोर्ट: शैलेश सिंह

सारंडा के जंगलों में एक बार फिर आक्रोश की आग सुलग उठी है। खदानों से प्रभावित गांवों के ग्रामीण अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। सारंडा विकास समिति, जामकुंडिया-दुईया के बैनर तले दर्जनों गांवों के ग्रामीणों, मानकी-मुंडाओं और मुखियाओं ने साफ ऐलान कर दिया है कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं, तो सेल गुवा की रांजाबुरु खदान को अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया जाएगा।
हालांकि, इस विस्फोटक स्थिति को भांपते हुए किरीबुरू के एसडीपीओ अजय केरकेट्टा ने समय रहते हस्तक्षेप किया और आंदोलन को फिलहाल टालने की कोशिश की। लेकिन सवाल अब भी वही है—क्या इस बार भी ग्रामीणों को सिर्फ आश्वासन मिलेगा या हक?

“समझौता हुआ, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं” – ग्रामीणों का आरोप

ग्रामीणों का आरोप बेहद गंभीर है। उनका कहना है कि पहले भी आंदोलन हुआ था, जिसे मंत्री दीपक बिरुवा की मौजूदगी में त्रिपक्षीय समझौते के बाद खत्म किया गया। उस समझौते में ठेका कंपनी और प्रशासन ने लिखित रूप से कई वादे किए थे।

क्या था समझौता?

* 18 प्रभावित गांवों से कम से कम 1800 बेरोजगार युवाओं को रोजगार

* समिति के माध्यम से पानी टैंकर की व्यवस्था
अन्य समस्याओं का बैठकर समाधान
लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि ठेका कंपनी ने इन वादों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।

“कागज पर विकास, जमीन पर शून्य” – उग्र होते ग्रामीण

ग्रामीणों ने एसडीपीओ के सामने साफ कहा—
“हम भीख नहीं मांग रहे, अपना हक मांग रहे हैं। अगर समझौता हुआ है तो उसे लागू क्यों नहीं किया गया?”
गांवों के प्रतिनिधियों में शामिल रहे:
* लागुड़ा देवगम (मानकी, सारंडा पीढ़)
* राजू शांडिल (मुखिया, गंगदा पंचायत)
* कुशो देवगम (मुंडा, जामकुंडिया)
* बुधराम सिद्धू (मुंडा, रोवाम)
* राजेश टोपनो (मुंडा, अग्रवां)
* जामदेव चांपिया (मुंडा, राजाबेड़ा)
*जानुम सिंह चेरवा (मुंडा, दुईया)
* लेबेया देवगम (मुंडा, लैंब्रे)
* मंचुरिया सिद्धू (मुंडा, तितलीघाट)
रामेश्वर चांपिया (पंचायत समिति सदस्य)
बृंदावन गोप, प्रीतम, श्रीधर गोप, सुमित दास, जगदीश कोड़ा सहित कई अन्य
इन सभी ने एक सुर में कहा कि अब और धोखा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

एसडीपीओ की पहल: “पहले वार्ता, फिर फैसला”

स्थिति की गंभीरता को समझते हुए एसडीपीओ अजय केरकेट्टा ने सभी पक्षों को अपने कार्यालय में बुलाकर बातचीत की। इस दौरान:
* पुराने समझौता पत्र को सही माना गया
* ठेकेदार और प्रशासन ने भी दस्तावेज को स्वीकार किया
* जल्द ही मंत्री दीपक बिरुवा की मौजूदगी में त्रिपक्षीय वार्ता कराने का आश्वासन दिया गया

आंदोलन टला, लेकिन खतरा बरकरार

एसडीपीओ की पहल के बाद फिलहाल प्रस्तावित 1 मई की खदान बंदी टाल दी गई है। लेकिन ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दी है:
“अगर अगली वार्ता में कोई ठोस निर्णय नहीं निकला, तो हम सीधे अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाएंगे और इस बार पीछे नहीं हटेंगे।”

खदान बंदी का मतलब: उत्पादन ठप, राजस्व पर असर

यदि रांजाबुरु खदान बंद होती है, तो इसका सीधा असर पड़ेगा:
* सेल के उत्पादन पर
* राज्य सरकार के राजस्व पर
* स्थानीय रोजगार और सप्लाई चेन पर
यानी यह सिर्फ एक आंदोलन नहीं, बल्कि पूरे औद्योगिक ढांचे को हिला देने वाली चेतावनी है।

मुख्य सवाल: कब तक मिलेगा सिर्फ आश्वासन?

सारंडा के ग्रामीण वर्षों से खनन का बोझ झेल रहे हैं*—जंगल उजड़े, जमीन गई, लेकिन बदले में रोजगार और सुविधाएं आज भी अधूरी हैं।
अब देखना यह है कि:
* क्या प्रशासन और कंपनी इस बार वादों को निभाएंगे?
* या फिर सारंडा एक बड़े औद्योगिक संघर्ष का गवाह बनेगा?

अंतिम चेतावनी: “अबकी बार आर-पार”

ग्रामीणों का रुख साफ है—
“या तो अधिकार मिलेगा, या खदान बंद होगी।”
सारंडा की धरती पर यह लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है।

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सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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