वन देवी की पूजा से लेकर पेड़ों के नीचे सामूहिक भोजन तक, सदियों पुरानी परंपरा आज भी कायम
गुवा संवाददाता।
पश्चिमी सिंहभूम जिले के गुवासाई गांव में रविवार को आदिवासी समाज ने प्रकृति, परंपरा और सामूहिक जीवन शैली के प्रतीक वनभोजनी पर्व को पूरे श्रद्धा, उल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया। वन देवी की पूजा-अर्चना, पेड़ों के नीचे सामूहिक भोजन और गांव की सामूहिक सहभागिता ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि आदिवासी संस्कृति आज भी अपनी जड़ों से गहराई से जुड़ी हुई है।

पूरे गांव में सुबह से ही धार्मिक और सांस्कृतिक वातावरण बना रहा। ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में पूजा स्थल पहुंचे, जहां वन देवी की आराधना कर गांव की सुख-समृद्धि, अच्छी फसल, पशुधन की रक्षा और प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा की कामना की गई।
प्रकृति और मानव के रिश्ते का प्रतीक है वनभोजनी पर्व
वनभोजनी पर्व आदिवासी समाज की उन प्राचीन परंपराओं में से एक माना जाता है, जिसका सीधा संबंध जंगल, जल और जमीन से जुड़ा है। इतिहासकारों और स्थानीय जानकारों के अनुसार यह पर्व सदियों से मनाया जाता रहा है। जब आदिवासी समाज पूरी तरह जंगलों पर निर्भर था, तब प्रकृति को ही जीवनदाता और संरक्षक मानकर उसकी पूजा की परंपरा शुरू हुई थी।
वनभोजनी का शाब्दिक अर्थ ही “वन में सामूहिक भोजन” माना जाता है। इस पर्व के माध्यम से समाज प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करता है। आदिवासी मान्यता के अनुसार जंगल केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और अस्तित्व का आधार है। इसलिए वन देवी की पूजा कर जंगलों की रक्षा और गांव की खुशहाली की कामना की जाती है।
घरों में नहीं जलता चूल्हा, पेड़ों के नीचे बनता है भोजन
वनभोजनी पर्व की सबसे अनोखी परंपरा यह है कि इस दिन गांव के किसी भी घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता। सभी परिवार अपने-अपने घरों से निकलकर गांव के बाहर या पेड़ों के नीचे एकत्रित होते हैं और सामूहिक रूप से भोजन बनाते हैं।
ग्रामीणों का मानना है कि इससे सामाजिक भेदभाव खत्म होता है और सामूहिकता की भावना मजबूत होती है। मिट्टी के बर्तनों और पारंपरिक तरीकों से भोजन तैयार किया जाता है। बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग सभी इसमें समान रूप से भाग लेते हैं। यह परंपरा आदिवासी समाज के सामूहिक जीवन दर्शन को दर्शाती है।
वन देवी की पूजा से होती है पर्व की शुरुआत
पर्व की शुरुआत गांव के देवरी द्वारा वन देवी की पूजा से होती है। पूजा में साल के पत्ते, फूल, धान, हड़िया और पारंपरिक सामग्री अर्पित की जाती है। ग्रामीण मानते हैं कि वन देवी गांव और जंगल की रक्षा करती हैं तथा प्राकृतिक संतुलन बनाए रखती हैं।
गांव के देवरी सुशील पूर्ति ने बताया कि वनभोजनी पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण का संदेश देने वाला पर्व है। उन्होंने कहा कि पूर्वजों ने जंगलों को बचाने और समाज को एकजुट रखने के उद्देश्य से इस परंपरा की शुरुआत की थी, जिसे आज भी पूरी आस्था के साथ निभाया जा रहा है।
आधुनिकता के दौर में भी जीवित है परंपरा
आज जब आधुनिकता और शहरीकरण के प्रभाव से पारंपरिक संस्कृतियां धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही हैं, तब गुवासाई गांव में वनभोजनी पर्व का आयोजन आदिवासी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने की बड़ी मिसाल बनकर सामने आया है। नई पीढ़ी को भी इस पर्व के महत्व और परंपराओं से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि इस तरह के पर्व समाज को जोड़ने, प्रकृति के महत्व को समझाने और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से परिचित कराने का कार्य करते हैं।
सामूहिकता और भाईचारे का संदेश
वनभोजनी पर्व के दौरान गांव में आपसी भाईचारा, सहयोग और सामाजिक एकता की अनूठी तस्वीर देखने को मिली। पर्व में किसी प्रकार का ऊंच-नीच या भेदभाव नहीं होता, बल्कि पूरा गांव एक परिवार की तरह शामिल होता है।
इस अवसर पर चंद्र मोहन पूर्ति, लांगो पूर्ति, लंका पूर्ति, जगमोहन पूर्ति सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे। वनभोजनी पर्व ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि आदिवासी संस्कृति में प्रकृति, परंपरा और सामूहिक जीवन ही सबसे बड़ी पूंजी














