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हॉकी से तीरंदाजी तक झारखंड की धरती गढ़ रही चैंपियनों की नई पीढ़ी

On: August 20, 2026 7:43 PM
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हॉकी से तीरंदाजी तक झारखंड की धरती गढ़ रही चैंपियनों की नई पीढ़ी
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सिमडेगा-खूंटी की हॉकी परंपरा से हजारीबाग के एसटीसी तक, युवा खिलाड़ियों के सपनों को मिल रही नई उड़ान

रिपोर्ट : शैलेश सिंह

सत्यमेव जयते

झारखंड की पहचान केवल अपनी खनिज संपदा, घने जंगलों और जनजातीय संस्कृति के लिए ही नहीं, बल्कि खेल प्रतिभाओं की उस उर्वर धरती के रूप में भी लगातार मजबूत हो रही है, जहां गांव की पगडंडियों से निकलकर खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश का नाम रोशन कर रहे हैं। हॉकी की समृद्ध परंपरा के लिए प्रसिद्ध झारखंड अब तीरंदाजी समेत विभिन्न खेलों में भी अपनी मजबूत पहचान बना रहा है।
सिमडेगा, खूंटी और गुमला की धरती जहां दशकों से हॉकी के सितारे पैदा करती रही है, वहीं हजारीबाग सहित राज्य के विभिन्न प्रशिक्षण केंद्रों से तीरंदाजी के युवा खिलाड़ी भी लगातार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं। भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI), राज्य सरकार, प्रशिक्षण केंद्रों, प्रशिक्षकों और स्थानीय खेल संस्कृति के सामूहिक प्रयास से झारखंड में खेल प्रतिभाओं को निखारने का एक ऐसा वातावरण तैयार हो रहा है, जो आने वाले वर्षों में भारतीय खेल जगत को कई नए सितारे दे सकता है।

हॉकी की धरती, अब तीरंदाजी का भी बढ़ता परचम

झारखंड का हॉकी से रिश्ता लगभग एक सदी पुराना है। 1928 एम्स्टर्डम ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के कप्तान जयपाल सिंह मुंडा से शुरू हुई प्रेरणा की यह यात्रा माइकल किंडो, सिल्वानुस डुंग डुंग, मनोहर टोपनो, अजीत लकड़ा, बिमल लकड़ा, बिरेंद्र लकड़ा, असुंता लकड़ा और सुमराई टेटे जैसे दिग्गजों तक पहुंची।
आज भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान सलीमा टेटे इसी गौरवशाली परंपरा की नई पहचान हैं। निक्की प्रधान, स्वीटी डुंग डुंग और दीपिका सोरेंग जैसी खिलाड़ियों ने भी झारखंड की प्रतिभा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है।
लेकिन झारखंड की कहानी अब हॉकी तक सीमित नहीं है। तीरंदाजी में भी राज्य के युवा खिलाड़ी लगातार अपनी क्षमता साबित कर रहे हैं। विशेष रूप से हजारीबाग और अन्य प्रशिक्षण केंद्रों से निकल रही प्रतिभाएं इस बात का संकेत हैं कि आने वाला समय झारखंड के लिए बहु-खेल प्रतिभाओं का समय हो सकता है।

गांवों से निकल रहे अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी

झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में खेल केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा है। सुबह और शाम गांवों के मैदानों में बच्चों को हॉकी की स्टिक लेकर दौड़ते देखा जा सकता है। इसी तरह तीरंदाजी के प्रशिक्षण केंद्रों में युवा खिलाड़ी घंटों लक्ष्य साधने का अभ्यास कर रहे हैं।
वरिष्ठ प्रशिक्षकों का मानना है कि झारखंड की सबसे बड़ी ताकत उसकी प्रतिभा और खेल के प्रति स्थानीय समुदायों का जुनून है। जरूरत केवल इस प्रतिभा को सही दिशा, आधुनिक प्रशिक्षण और पर्याप्त संसाधन देने की है।
भारतीय खेल प्राधिकरण के विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से राज्य में हजारों बालक-बालिकाएं आवासीय और गैर-आवासीय प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। इससे उन बच्चों को भी अवसर मिल रहा है, जिनके परिवार आर्थिक रूप से महंगे निजी प्रशिक्षण का खर्च वहन नहीं कर सकते।

सिमडेगा बनी हॉकी की नर्सरी

झारखंड में सिमडेगा को हॉकी की नर्सरी कहा जाता है। सीमित संसाधनों के दौर में भी इस जिले ने लगातार राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी दिए हैं। अब यहां हॉकी प्रशिक्षण के लिए बेहतर संरचना विकसित हो रही है।
अंडर-12 से अंडर-16 आयु वर्ग के खिलाड़ियों के लिए आवासीय प्रशिक्षण, उत्कृष्टता केंद्र और रेंगारी, जलडेगा तथा कुरडेग में गैर-आवासीय प्रशिक्षण केंद्र युवा खिलाड़ियों को आगे बढ़ने का अवसर दे रहे हैं।
यह बदलाव केवल आधारभूत संरचना का विस्तार नहीं है। यह उस सोच का बदलाव है जिसमें प्रतिभा को परिस्थितियों के भरोसे छोड़ने के बजाय व्यवस्थित प्रशिक्षण के माध्यम से निखारा जा रहा है।

खूंटी और गुमला भी पीछे नहीं

खूंटी भी झारखंड के प्रमुख हॉकी केंद्रों में अपनी मजबूत जगह बना चुका है। यहां बालक-बालिकाओं के लिए आवासीय सुविधाओं के साथ बालिकाओं के लिए 40 बिस्तरों वाला छात्रावास और गोविंदपुर, तोरपा, मुरहू, खूंटी तथा मरनहाड़ा में प्रशिक्षण केंद्र संचालित हैं।
गुमला, कामडारा, कोनबीर, रांची, लातेहार, हुलहुंडू और हजारीबाग में भी विभिन्न स्तरों पर आवासीय एवं गैर-आवासीय खेल प्रशिक्षण की व्यवस्था ने राज्य के खेल नेटवर्क को विस्तार दिया है।
पूर्वी सिंहभूम में टाटा अकादमी और जमशेदपुर स्थित राष्ट्रीय हॉकी अकादमी ने भी राज्य की खेल प्रतिभाओं को उच्च स्तर का मंच देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

 

हजारीबाग बना बहु-खेल प्रतिभाओं का केंद्र

हजारीबाग का स्पोर्ट्स ट्रेनिंग सेंटर यानी एसटीसी भी झारखंड की खेल यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। पिछले दो वर्षों में यहां हॉकी के साथ-साथ तीरंदाजी में भी खिलाड़ियों के प्रदर्शन ने इस केंद्र की क्षमता को नई पहचान दी है।
एसटीसी हजारीबाग में खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करने की जिम्मेदारी अनुभवी प्रशिक्षकों की टीम संभाल रही है। सीनियर हॉकी कोच विवेक चतुर्वेदी और असिस्टेंट हॉकी कोच आबिद अली, तीरंदाजी कोच उधम सिंह और मोहम्मद दानिश अंसारी के मार्गदर्शन में हॉकी खिलाड़ियों को लगातार बेहतर बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

केंद्र के सेंटर इंचार्ज एवं असिस्टेंट डायरेक्टर करण साधवानी की देखरेख में प्रशिक्षण व्यवस्था को व्यवस्थित रूप देने की दिशा में काम किया जा रहा है।
एसटीसी की उपलब्धियों का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एसटीसी की राष्ट्रीय मेडल रैंकिंग में हजारीबाग केंद्र को दूसरी रैंकिंग हासिल है। यह उपलब्धि केंद्र से जुड़े खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों के निरंतर परिश्रम का परिणाम है।

लक्ष्य पर निगाह, तीर पर विश्वास

तीरंदाजी ऐसा खेल है जिसमें केवल शारीरिक क्षमता ही पर्याप्त नहीं होती। इसके लिए एकाग्रता, मानसिक मजबूती, धैर्य, तकनीक और दबाव में सही निर्णय लेने की क्षमता आवश्यक होती है।
झारखंड के युवा तीरंदाज इन सभी क्षेत्रों में लगातार खुद को साबित कर रहे हैं। उनमें से एक उभरता हुआ नाम है कीर्ति, जिसने कम उम्र में ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर झारखंड की तीरंदाजी को नई उम्मीद दी है।

कीर्ति की उपलब्धियों ने बढ़ाया भरोसा

कीर्ति ने जूनियर एशिया कप टीम स्पर्धा में ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया है। जूनियर एशिया कप स्टेज-III में भागीदारी के साथ उन्होंने विश्व कप स्टेज-III में भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।
विश्व कप स्टेज-IV की व्यक्तिगत स्पर्धा में चौथा स्थान हासिल करना उनके बढ़ते आत्मविश्वास और उच्च स्तर की क्षमता का प्रमाण है।
राष्ट्रीय स्तर पर भी कीर्ति का प्रदर्शन शानदार रहा है। 2025 के देहरादून नेशनल गेम्स में उन्होंने टीम स्पर्धा में ब्रॉन्ज मेडल जीता। बोलपुर में आयोजित जूनियर नेशनल में गोल्ड मेडल हासिल कर उन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया।
ऑल इंडिया इंटर-यूनिवर्सिटी प्रतियोगिता, भटिंडा पंजाब में सिल्वर मेडल जीतना भी उनकी उपलब्धियों में शामिल है।
अब कीर्ति के सामने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और बड़ी चुनौती है। जापान में 19 सितंबर से 4 अक्टूबर तक आयोजित होने वाले एशियाई खेलों के लिए उनका नामांकन झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य के युवा खिलाड़ियों के लिए गर्व और प्रेरणा का विषय है।

कीर्ति से हजारों बेटियों को प्रेरणा

कीर्ति की सफलता केवल एक खिलाड़ी की उपलब्धि नहीं है। यह उन हजारों ग्रामीण और आदिवासी बेटियों के लिए संदेश है, जो खेल के क्षेत्र में अपना भविष्य बनाना चाहती हैं।
जहां कभी खेलों में बेटियों की भागीदारी को लेकर कई सामाजिक और आर्थिक बाधाएं सामने आती थीं, वहीं आज झारखंड की बेटियां राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पदक जीत रही हैं।
कीर्ति की यात्रा बताती है कि सही प्रशिक्षण, अवसर और परिवार तथा समाज का सहयोग मिलने पर झारखंड की बेटियां किसी भी खेल में देश का प्रतिनिधित्व कर सकती हैं।

सुमन गोप ने भी दिखाया दम

झारखंड की तीरंदाजी प्रतिभाओं में सुमन गोप का नाम भी उल्लेखनीय है। उन्होंने SGFI नाडियाड, गुजरात 2024 में शानदार प्रदर्शन करते हुए तीन गोल्ड और एक सिल्वर मेडल हासिल किया।
सीनियर नेशनल जमशेदपुर 2024 में सुमन ने दो ब्रॉन्ज मेडल जीते। सब-जूनियर नेशनल 2025, जयपुर में उन्होंने दो गोल्ड, दो सिल्वर और एक ब्रॉन्ज मेडल हासिल कर अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन किया।
जूनियर नेशनल 2024, बोलपुर में भी उन्होंने सिल्वर मेडल अपने नाम किया।
सुमन की उपलब्धियों का यह सिलसिला बताता है कि झारखंड में तीरंदाजी की नई पौध कितनी तेजी से तैयार हो रही है।

हॉकी के साथ तीरंदाजी की नई ताकत

एसटीसी हजारीबाग की विशेष उपलब्धि यह है कि पिछले दो वर्षों में हॉकी और आर्चरी दोनों खेलों में खिलाड़ियों ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि यदि प्रशिक्षण केंद्रों में सुविधाएं, प्रशिक्षक, वैज्ञानिक प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं का पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराया जाए तो झारखंड के खिलाड़ी अलग-अलग खेलों में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकते हैं।
हॉकी की मजबूत परंपरा के साथ तीरंदाजी का बढ़ता प्रभाव झारखंड को आने वाले समय में बहु-खेल प्रतिभाओं का प्रमुख केंद्र बना सकता है।

SAI की भूमिका से मिल रहा नया मंच

भारतीय खेल प्राधिकरण झारखंड में प्रतिभाओं को पहचानने और उन्हें आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। रांची और हजारीबाग स्थित केंद्रों तथा मोरहाबादी उत्कृष्टता केंद्र के माध्यम से युवा खिलाड़ियों को बेहतर प्रशिक्षण और सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।
10 से 14 वर्ष की आयु के खिलाड़ियों के लिए चयन परीक्षण आयोजित किए जाते हैं। प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को चयन के बाद प्रशिक्षण केंद्रों में बेहतर सुविधाओं के साथ प्रशिक्षित किया जाता है।
ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों से आने वाले बच्चों के लिए यह व्यवस्था किसी वरदान से कम नहीं है। इन केंद्रों के माध्यम से उन्हें खेल विज्ञान, शक्ति एवं अनुकूलन प्रशिक्षण, फिजियोथेरेपी, पोषण, मानसिक तैयारी और उच्च स्तरीय प्रतियोगिताओं का अनुभव प्राप्त होता है।

खेलो इंडिया से बढ़ेगी उम्मीद

केंद्रीय खेल मंत्रालय की नई रूपरेखा वाली खेलो इंडिया योजना से झारखंड के खेल क्षेत्र को और मजबूती मिलने की उम्मीद है। 2026-31 की योजना में पिछले आवंटन की तुलना में आठ गुना वृद्धि करते हुए 36,441 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
योजना में प्रतिभा पहचान, खेल अवसंरचना और खेल प्रौद्योगिकी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर जोर दिया गया है। खिलाड़ियों की संख्या में भी बड़ी वृद्धि का लक्ष्य रखा गया है।
राज्यों की भूमिका बढ़ने और 60:40 केंद्र-राज्य लागत साझेदारी मॉडल के माध्यम से प्रतिभा विकास को आगे बढ़ाने की योजना झारखंड जैसे राज्यों के लिए महत्वपूर्ण अवसर लेकर आई है।
यदि इसका प्रभावी क्रियान्वयन होता है तो सिमडेगा, खूंटी, गुमला, हजारीबाग, रांची और राज्य के अन्य क्षेत्रों में मौजूद प्रतिभाओं को और बेहतर मंच मिल सकता है।

पदकों की कहानी भी बता रही सफलता

झारखंड की हॉकी व्यवस्था की सफलता का प्रमाण हॉकी इंडिया राष्ट्रीय चैंपियनशिप में राज्य के प्रदर्शन से भी मिलता है। पिछले 16 वर्षों में राज्य ने महिला वर्ग में 34 पदक हासिल किए हैं, जिनमें 10 स्वर्ण, 11 रजत और 13 कांस्य पदक शामिल हैं।
यह आंकड़ा केवल पदकों की संख्या नहीं है, बल्कि उस धरातलीय व्यवस्था की सफलता का प्रमाण है, जिसमें वर्षों से बच्चों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
अब यही सोच तीरंदाजी और अन्य खेलों में भी विकसित करने की आवश्यकता है।

प्रशिक्षकों की मेहनत सबसे बड़ी ताकत

किसी भी खिलाड़ी की सफलता के पीछे केवल खिलाड़ी का परिश्रम नहीं होता। उसके पीछे परिवार, प्रशिक्षक, प्रशिक्षण केंद्र और पूरी व्यवस्था की भूमिका होती है।
खिलाड़ी सुबह से शाम तक अभ्यास करता है, लेकिन उसे सही तकनीक सिखाने, उसकी गलतियों को सुधारने, मानसिक रूप से मजबूत बनाने और प्रतियोगिता के दबाव के लिए तैयार करने का काम प्रशिक्षक करते हैं।
हजारीबाग जैसे केंद्रों में कार्यरत प्रशिक्षक इसी जिम्मेदारी को निभा रहे हैं। हॉकी और तीरंदाजी दोनों में बेहतर परिणाम इसका प्रमाण हैं।

झारखंड के युवा खिलाड़ियों के नाम संदेश

झारखंड के युवा खिलाड़ियों के लिए आज सबसे बड़ा संदेश यही है कि सपने देखने में कभी संकोच न करें।
सिमडेगा के मैदान से निकलकर सलीमा टेटे भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान बन सकती हैं, तो झारखंड की बेटी कीर्ति एशियाई खेलों के लिए नामांकित हो सकती हैं। सुमन गोप राष्ट्रीय स्तर पर लगातार पदक जीत सकती हैं, तो राज्य के हजारों दूसरे बच्चे भी एक दिन देश के लिए पदक जीत सकते हैं।
जरूरत केवल अपने लक्ष्य पर विश्वास रखने की है।

हार नहीं, अगली जीत की तैयारी

खेल में हर प्रतियोगिता में पदक मिलना संभव नहीं है। कभी जीत मिलेगी, कभी हार का सामना करना पड़ेगा। लेकिन हार खिलाड़ी की मंजिल नहीं, बल्कि अगली जीत की तैयारी होती है।
युवा तीरंदाजों को हर तीर के साथ अपनी तकनीक सुधारनी होगी। हर अभ्यास के साथ एकाग्रता बढ़ानी होगी और हर प्रतियोगिता से कुछ नया सीखना होगा।
इसी तरह हॉकी खिलाड़ियों को भी मैदान पर हर दिन अपने खेल में सुधार करना होगा।

सपनों की उड़ान को चाहिए निरंतर समर्थन

झारखंड में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। आवश्यकता है कि खिलाड़ियों को निरंतर प्रशिक्षण, बेहतर मैदान, आधुनिक उपकरण, पौष्टिक भोजन, चिकित्सा सहायता और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने का पर्याप्त अवसर मिलता रहे।
सरकार, SAI, खेल संघों, प्रशिक्षण केंद्रों, कॉरपोरेट संस्थानों और स्थानीय समुदायों को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा।
यदि प्रतिभाओं को बीच रास्ते में संसाधनों की कमी के कारण रुकना नहीं पड़े तो झारखंड देश के सबसे बड़े खेल केंद्रों में शामिल हो सकता है।

हॉकी से तीरंदाजी तक झारखंड की धरती गढ़ रही चैंपियनों की नई पीढ़ी

आने वाला कल झारखंड के नाम

हर सुबह सिमडेगा, खूंटी, गुमला, हजारीबाग, रांची और राज्य के अन्य खेल केंद्रों में बच्चे अपने सपनों के साथ अभ्यास के लिए पहुंचते हैं। किसी के हाथ में हॉकी स्टिक है तो किसी के हाथ में धनुष।
इन बच्चों में से हर कोई अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बने, यह जरूरी नहीं। लेकिन इन हजारों खिलाड़ियों के बीच भारत का अगला बड़ा हॉकी सितारा, अगला अंतरराष्ट्रीय तीरंदाज और अगला पदक विजेता जरूर तैयार हो रहा है।
झारखंड ने हॉकी में देश को गौरव दिलाने की अपनी क्षमता पहले ही साबित कर दी है। अब तीरंदाजी में कीर्ति और सुमन गोप जैसी प्रतिभाएं उस कहानी को आगे बढ़ा रही हैं।
लक्ष्य सामने है, धनुष तना है, तीर तैयार है और हौसला बुलंद है। झारखंड के इन युवा खिलाड़ियों की मेहनत यदि इसी तरह जारी रही तो आने वाले वर्षों में देश के खेल मानचित्र पर इस राज्य की चमक और भी तेज होगी।
झारखंड की धरती ने हॉकी के सितारे दिए हैं, अब यही धरती तीरंदाजी के नए चैंपियन भी गढ़ रही है।

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