जन वितरण प्रणाली में घटिया खाद्यान्न की आपूर्ति से गरीबों की थाली और सेहत दोनों पर संकट
पैक्ड नमक पानी में घुला तो नीचे जमा हो गई बालू, कुछ बोरियों में फंगस लगा काला गेहूं और चावल के दाने भी मिले
खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की जांच व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल, आखिर किसकी निगरानी में गरीबों तक पहुंच रहा घटिया राशन?
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
नोवामुंडी। झारखंड सरकार की जन वितरण प्रणाली के माध्यम से गरीब परिवारों को सस्ता खाद्यान्न उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। नोवामुंडी प्रखंड क्षेत्र में गरीबों के बीच वितरण के लिए रखे गए खाद्यान्न में कथित तौर पर बालू मिला पैक्ड नमक और फंगस लगा गेहूं मिलने से हड़कंप की स्थिति है। सवाल सिर्फ राशन की गुणवत्ता का नहीं, बल्कि उन गरीब परिवारों के स्वास्थ्य का है, जो सरकारी व्यवस्था पर भरोसा कर अपने परिवार का पेट भरने के लिए इसी राशन पर निर्भर हैं।

नमक पानी में घुला, बालू बर्तन की सतह पर बैठ गई
शहर के दर्जनों गरीब परिवारों की ओर से लगातार शिकायतें मिलने के बाद नोवामुंडी प्रखंड की एक जन वितरण प्रणाली दुकान में रखे पैक्ड नमक की गुणवत्ता को देखने का प्रयास किया गया। दुकान में वितरण के लिए रखे गए एक-एक किलो के पैक्ड नमक में से एक पैकेट खोला गया और नमक को पानी में घोलकर देखा गया।
बताया गया कि नमक पानी में घुल गया, लेकिन उसमें मौजूद बालू नीचे बर्तन की सतह पर जमा हो गई। इस दृश्य ने सरकारी राशन की गुणवत्ता की निगरानी व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
गरीब उपभोक्ताओं का कहना है कि जब नमक में मिलावट आंखों के सामने दिखाई दे रही है तो फिर इसकी आपूर्ति से पहले इसकी गुणवत्ता की जांच किस स्तर पर की जाती है?
गेहूं की बोरी में फंगस, कई दाने काले
मामला सिर्फ नमक तक सीमित नहीं है। उसी क्षेत्र में गरीबों के बीच वितरण के लिए रखी गई गेहूं की कुछ बोरियों में फंगस लगा हुआ गेहूं भी मिला। गेहूं के कई दाने काले दिखाई दिए, जबकि कुछ जगहों पर गेहूं के साथ चावल के दाने भी मौजूद थे।
हालांकि बताया गया कि ऐसी स्थिति एक-दो बोरियों में ही देखने को मिली, लेकिन सवाल फिर भी गंभीर है कि खराब या संदिग्ध गुणवत्ता वाला अनाज आखिर सरकारी वितरण प्रणाली तक पहुंचा कैसे?
क्या गोदाम में गेहूं और चावल की होती है ऐसी हैंडलिंग?
गेहूं में चावल के दाने मिलने के बाद एक और सवाल खड़ा हो गया है। स्थानीय स्तर पर आशंका जताई जा रही है कि कहीं गोदामों में गेहूं और चावल की बोरियों की अनुचित तरीके से हैंडलिंग तो नहीं होती? यदि अलग-अलग अनाज की बोरियों से गिरे हुए दानों को बाद में दोबारा किसी बोरी में भरकर भेजा जाता है, तो यह सरकारी खाद्यान्न व्यवस्था की गंभीर लापरवाही का मामला हो सकता है।
हालांकि इस आशंका की पुष्टि संबंधित विभाग की जांच के बाद ही हो सकती है। इसलिए पूरे मामले की वैज्ञानिक तरीके से खाद्य गुणवत्ता जांच कराया जाना जरूरी है।
सबसे बड़ा सवाल—खाद्य सुरक्षा अधिकारी करते क्या हैं?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल खाद्य सुरक्षा और आपूर्ति विभाग की निगरानी व्यवस्था को लेकर है। सरकारी खाद्यान्न गरीबों के बीच वितरित होने से पहले उसकी गुणवत्ता की जांच की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
यदि खाद्यान्न की नियमित जांच होती है तो बालू मिला नमक, फंगस लगा गेहूं और काले पड़े अनाज के दाने सरकारी राशन की दुकानों तक कैसे पहुंच रहे हैं? और यदि जांच नहीं होती तो फिर गरीबों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी कौन लेगा?

गरीब राशन लेते हैं, लेकिन खराब नमक फेंकने को मजबूर
स्थानीय गरीब उपभोक्ताओं का कहना है कि उन्हें सरकारी राशन में मिलने वाले घटिया नमक की जानकारी होने के बावजूद कई बार उसे मजबूरी में उठाना पड़ता है। बाद में जब उसकी गुणवत्ता खराब मिलती है तो ऐसे नमक को उपयोग करने के बजाय लोग उसे बाहर फेंक देते हैं।
ऐसी स्थिति में सरकार की खाद्य सुरक्षा योजना का उद्देश्य ही प्रभावित होता दिखाई देता है। गरीब को मिलने वाला खाद्यान्न यदि उपयोग के योग्य नहीं है तो उसे राशन देने की पूरी कवायद किस काम की?
जनता और सरकार का नुकसान, आपूर्तिकर्ताओं को फायदा?
सरकारी राशन व्यवस्था का उद्देश्य गरीब परिवारों को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण खाद्यान्न उपलब्ध कराना है। लेकिन यदि खराब गुणवत्ता का खाद्यान्न ही दुकानों तक पहुंच रहा है तो इसका सीधा नुकसान गरीब उपभोक्ताओं और सरकारी व्यवस्था—दोनों को हो रहा है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि ऐसी व्यवस्था का लाभ केवल उन लोगों को हो सकता है जो घटिया खाद्यान्न की आपूर्ति कर आर्थिक फायदा उठा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि के लिए विभागीय जांच आवश्यक है।
स्वास्थ्य से खिलवाड़ हुआ तो जिम्मेदार कौन?
फंगस लगा या खराब अनाज लगातार खाने से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में खाद्य विभाग को मामले को महज राशन वितरण की सामान्य शिकायत मानकर टालने के बजाय इसे जनस्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर मामला मानकर जांच करनी चाहिए।
गरीबों की थाली किसी प्रयोगशाला का नमूना नहीं है कि जो मिला, वह खा लिया जाए। सरकारी योजना के नाम पर मिलने वाला खाद्यान्न कम से कम स्वच्छ, सुरक्षित और निर्धारित गुणवत्ता का होना ही चाहिए।
नमक और गेहूं के नमूने लेकर हो जांच
जरूरत है कि संबंधित विभाग तत्काल उक्त जन वितरण प्रणाली दुकान समेत क्षेत्र की अन्य दुकानों में उपलब्ध नमक और गेहूं के नमूने लेकर अधिकृत प्रयोगशाला में जांच कराए। साथ ही जिस स्तर से खाद्यान्न की आपूर्ति हुई है, वहां तक जांच की कड़ी पहुंचाई जाए।
यदि जांच में खाद्यान्न की गुणवत्ता निर्धारित मानकों से कम पाई जाती है तो आपूर्ति श्रृंखला में जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक बोरी गेहूं या एक पैकेट नमक का नहीं है। सवाल उन हजारों गरीब परिवारों की सेहत का है, जिनकी थाली में सरकार के भरोसे का राशन पहुंचता है।













