इलाज के अभाव में हो रही मौतों पर प्रशासन मौन, छोटानागरा सीएचसी से जामदा रेफरल अस्पताल तक बदहाल व्यवस्था
रिपोर्ट शैलेश सिंह।
झारखंड के सबसे दुर्गम और खनन प्रभावित क्षेत्रों में शामिल सारंडा वन क्षेत्र आज भी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। घने जंगलों, पहाड़ी रास्तों और खनन से उपजे सामाजिक–आर्थिक संकट के बीच रहने वाले हजारों आदिवासी परिवारों की सेहत अब गंभीर खतरे में है। इसी गंभीर स्थिति को लेकर क्षेत्रीय विधायक सोनाराम सिंकु ने दिशा (DISHA) समिति, पश्चिमी सिंहभूम के समक्ष सशक्त हस्तक्षेप करते हुए स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली पर सीधा सवाल खड़ा किया है।

विधायक ने समिति की अध्यक्ष को दिए गए आवेदन में छोटानागरा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, राज्यस्तरीय जामदा रेफरल अस्पताल और जेटिया प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में सम्पूर्ण स्वास्थ्य सुविधा बहाल करने की मांग की है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि इलाज के अभाव में हो रही मौतें केवल संयोग नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम हैं।
खनन से मुनाफा, आदिवासियों को बदहाली
सारंडा क्षेत्र देश के सबसे समृद्ध लौह अयस्क भंडारों में से एक है। करोड़ों रुपये का खनन राजस्व यहां से सरकार और कंपनियों को मिलता है, लेकिन इसके बदले क्षेत्र के मूल निवासियों को आज तक समुचित स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिल पाई। विधायक सोनाराम सिंकु ने अपने आवेदन में इस विरोधाभास की ओर इशारा करते हुए कहा कि खनन से उजड़े गांव, प्रदूषण से बीमार होती आबादी और जर्जर स्वास्थ्य ढांचा — यह तस्वीर किसी भी विकसित राज्य के लिए शर्मनाक है।
छोटानागरा सीएचसी: नाम बड़ा, काम अधूरा
छोटानागरा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को सारंडा क्षेत्र का केंद्रीय स्वास्थ्य संस्थान माना जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट है।
यहां
- डॉक्टरों के कई पद वर्षों से खाली पड़े हैं,
- 24×7 आपात सेवा कागजों तक सीमित है,
- प्रसव सुविधा के नाम पर संसाधनों की भारी कमी है,
- एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड और पैथोलॉजी जांच या तो उपलब्ध नहीं हैं या अक्सर बंद रहती हैं।
नतीजा यह है कि गंभीर मरीजों को प्राथमिक इलाज के बाद ही बाहर रेफर कर दिया जाता है, जबकि कई मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।
जामदा रेफरल अस्पताल: रेफरल ही अंतिम इलाज?
राज्यस्तरीय दर्जा प्राप्त जामदा रेफरल अस्पताल भी अपनी भूमिका निभाने में पूरी तरह विफल साबित हो रहा है। विधायक ने कहा कि रेफरल अस्पताल का मतलब मरीजों को बचाना होता है, न कि उन्हें केवल आगे भेज देना।
अस्पताल में
- विशेषज्ञ डॉक्टरों का अभाव,
- आईसीयू और ट्रॉमा केयर जैसी सुविधाओं की कमी,
- पर्याप्त नर्सिंग स्टाफ न होना,
- आधुनिक चिकित्सा उपकरणों की अनुपलब्धता
जैसी समस्याएं वर्षों से बनी हुई हैं। कई बार तो गंभीर मरीजों को चाईबासा या रांची रेफर करने में इतना समय लग जाता है कि उनकी जान बचाना मुश्किल हो जाता है।
जेटिया पीएचसी: ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोर कड़ी
सुदूर वनवर्ती गांवों के लिए जेटिया प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र एकमात्र सहारा है, लेकिन यह केंद्र भी संसाधनों के अभाव से जूझ रहा है। दवाइयों की अनियमित आपूर्ति, सीमित ओपीडी समय और एम्बुलेंस सुविधा के अभाव में ग्रामीणों को मजबूरी में झोलाछाप चिकित्सकों पर निर्भर होना पड़ता है, जिससे स्थिति और गंभीर हो जाती है।
इलाज के अभाव में मौतें, प्रशासनिक चुप्पी पर सवाल
विधायक सोनाराम सिंकु ने अपने आवेदन में यह भी उल्लेख किया है कि कई मामलों में मरीजों की मौत इलाज के अभाव में हुई है। इसके बावजूद न तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होती है और न ही स्वास्थ्य ढांचे को दुरुस्त करने की ठोस पहल नजर आती है।
उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य सुविधा कोई उपकार नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार है। जनता को इससे वंचित रखना सीधा अन्याय है।
दिशा समिति में सर्वोच्च प्राथमिकता की मांग
विधायक ने दिशा समिति से मांग की है कि इस विषय को बैठक में सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ रखा जाए और उनके प्रस्ताव को पारित कर स्वास्थ्य विभाग को स्पष्ट निर्देश दिए जाएं। उन्होंने जोर देकर कहा कि
- डॉक्टरों की नियमित नियुक्ति,
- दवाइयों व जांच सुविधाओं की उपलब्धता,
- एम्बुलेंस व आपात सेवाओं का सुदृढ़ीकरण,
- विशेषज्ञ चिकित्सा व्यवस्था की बहाली
बिना देरी के सुनिश्चित की जाए।
जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी या सिस्टम की परीक्षा?
सोनाराम सिंकु ने कहा कि जनप्रतिनिधि होने के नाते यह उनकी जिम्मेदारी है कि वे सारंडा और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की आवाज सरकार तक पहुंचाएं। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि स्वास्थ्य व्यवस्था में शीघ्र सुधार नहीं हुआ, तो जनता का आक्रोश बढ़ना तय है।
ग्रामीणों की उम्मीदें विधायक पर टिकीं
स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने विधायक की इस पहल का स्वागत किया है। उनका कहना है कि यदि दिशा समिति और स्वास्थ्य विभाग ने इस आवेदन को गंभीरता से लिया, तो सारंडा क्षेत्र के हजारों लोगों को राहत मिल सकती है। अब सवाल यह है कि वर्षों से उपेक्षित इस क्षेत्र की सेहत पर कब वास्तविक मरहम लगेगा।
अब निगाहें प्रशासन पर
सारंडा की स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने का यह मुद्दा अब दिशा समिति के पटल पर है। देखना यह है कि यह प्रस्ताव भी फाइलों में दबकर रह जाता है या फिर वास्तव में जमीनी बदलाव की शुरुआत बनता है।











