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✊ “रोजगार नहीं तो खनन नहीं”- रांजाबुरु खदान

On: February 26, 2026 4:22 PM
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रांजाबुरु खदान पर आदिवासी स्वाभिमान का उभार, आंदोलन को मिला सामाजिक योद्धा प्रताप सिंह का समर्थन

रिपोर्ट: शैलेश सिंह

सारंडा की धरती एक बार फिर संघर्ष की गूंज से कांप उठी है।
Steel Authority of India Limited (सेल), गुवा की रांजाबुरु खदान में अनिश्चितकालीन बंदी के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन अब सिर्फ रोजगार की मांग नहीं, बल्कि आदिवासी स्वाभिमान और अधिकारों की निर्णायक लड़ाई बन चुका है।
सारंडा विकास समिति के बैनर तले 18 गांवों के ग्रामीणों और बेरोजगार युवाओं द्वारा 23 फरवरी की सुबह से शुरू हुआ यह आंदोलन आज अपने चौथे दिन में प्रवेश कर चुका है।
और इसी चौथे दिन आंदोलन को वह समर्थन मिला, जिसने इसे नई ताकत और नया आत्मविश्वास दे दिया।
जगन्नाथपुर निवासी और सारंडा क्षेत्र के प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता प्रताप सिंह खुद आंदोलन स्थल पर पहुंचे और आंदोलनकारियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो गए।

“यह सिर्फ नौकरी नहीं, अस्तित्व की लड़ाई है” – प्रताप सिंह

आंदोलन स्थल पर ग्रामीणों को संबोधित करते हुए प्रताप सिंह ने कहा—
“जैसे-जैसे यह आंदोलन आगे बढ़ेगा, वैसे-वैसे इसे और व्यापक समर्थन मिलेगा।
यह लड़ाई केवल रोजगार की नहीं है,
यह आदिवासियों के हक, अधिकार और स्वाभिमान की लड़ाई है।
अगर आज आदिवासी पीछे हट गए,
तो कल उनके जंगल, जमीन और रोजगार—सब छीन लिए जाएंगे।”
उनके शब्दों ने आंदोलन में नई जान फूंक दी।
नारे और तेज हुए—
“हमारी जमीन, हमारा जंगल… नौकरी बाहर वालों को क्यों?”
“75 प्रतिशत रोजगार हमारा अधिकार है!”

18 गांवों की एक आवाज: रांजाबुरु खदान पर तालाबंदी

यह आंदोलन सारंडा के 18 गांवों के ग्रामीणों और बेरोजगार युवाओं का साझा संघर्ष है।
इनका आरोप है कि—
नई खदान खुलने के बावजूद
स्थानीय प्रभावित गांवों के युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा
बाहरी लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है
और आदिवासियों को उनके ही संसाधनों से दूर रखा जा रहा है
इसी के विरोध में रांजाबुरु खदान पर अनिश्चितकालीन बंदी लागू की गई है।

नेतृत्व में आदिवासी परंपरा की ताकत

इस आंदोलन का नेतृत्व सारंडा पीढ़ के मानकी लागुड़ा देवगम और गंगदा पंचायत के मुखिया राजू शांडिल कर रहे हैं।
मानकी लागुड़ा देवगम ने साफ कहा—
“हम भीख नहीं मांग रहे,
हम अपना अधिकार मांग रहे हैं।
75 प्रतिशत रोजगार प्रभावित गांवों के बेरोजगारों को देना होगा,
तभी खदान चलेगी।”
मुखिया राजू शांडिल ने चेतावनी देते हुए कहा—
“यह आंदोलन एक-दो दिन का नहीं है।
जब तक लिखित आश्वासन नहीं मिलेगा,
तब तक खदान में काम शुरू नहीं होने दिया जाएगा।”

सारंडा की लड़ाई: जंगल से उठती आवाज

एक समय था जब सारंडा जंगल केवल नक्सलवाद के लिए जाना जाता था।
आज वही सारंडा रोजगार, अधिकार और विकास की नई परिभाषा लिख रहा है।
यह आंदोलन दिखाता है कि अब सारंडा के लोग—
बंदूक नहीं, संविधान की भाषा बोल रहे हैं
हिंसा नहीं, संगठित संघर्ष का रास्ता चुन रहे हैं
और डर नहीं, अधिकार की मांग कर रहे हैं

बढ़ता समर्थन: आंदोलन को मिल रही सामाजिक ताकत

आंदोलनकारियों को अब सिर्फ ग्रामीणों का ही नहीं, बल्कि—
सामाजिक संगठनों
स्थानीय बुद्धिजीवियों
युवाओं
और आदिवासी परंपरागत संस्थाओं
का भी समर्थन मिलना शुरू हो गया है।
चौथे दिन आंदोलन स्थल पर भोजन, पानी, दवाइयों और रात ठहरने की व्यवस्था स्थानीय ग्रामीणों ने स्वयं संभाली।
यह साफ संकेत है कि यह आंदोलन अब जनांदोलन का रूप ले रहा है।

लंबी लड़ाई की तैयारी

आंदोलनकारी स्पष्ट कह चुके हैं कि—
“यह लड़ाई लंबी चलेगी।
जब तक हमारी मांगें नहीं मानी जातीं,
तब तक खदान बंद रहेगी।”
उनकी मुख्य मांगें हैं—
नई खदान में 75% रोजगार प्रभावित गांवों के युवाओं को
स्थायी नौकरी की व्यवस्था
शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार
सड़क, पानी और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं
ग्रामसभा की सहमति से सभी निर्णय

“आज आदिवासी हारे तो कल सब हारेंगे”

प्रताप सिंह के शब्द आंदोलन का नारा बन चुके हैं—
“आज अगर आदिवासी हारे,
तो कल हर गरीब हारेगा।
इसलिए यह लड़ाई सिर्फ सारंडा की नहीं,
पूरे समाज की लड़ाई है।”
उनकी मौजूदगी से आंदोलन को नैतिक बल मिला है और यह संदेश गया है कि यह संघर्ष अकेला नहीं है।

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सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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