रोजगार और विकास की मांग पर डटे सारंडा के 18 गांवों के बेरोजगार युवा
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
सेल, गुवा की रांजाबुरु खदान में अनिश्चितकालीन बंदी का आंदोलन आज पांचवें दिन भी जारी है। इस आंदोलन में सारंडा के 18 गांवों के ग्रामीण बेरोजगार रोजगार और विकास की मांग को लेकर डटे हुए हैं। आंदोलन सारंडा विकास समिति के बैनर तले 23 फरवरी की सुबह से शुरू हुआ था, जो अब लगातार तेज होता जा रहा है।
आंदोलन के कारण खदान की सभी गतिविधियां पूरी तरह ठप हैं। भारी मशीनें जहां की तहाँ खड़ी हैं और उत्पादन कार्य पूरी तरह बंद हो चुका है। ग्रामीण आंदोलन स्थल पर दिन-रात डटे हुए हैं और अपनी मांगों पर अडिग हैं।

“आज आदिवासी पीछे रहेंगे तो कल सब कुछ छिन जाएगा”
आंदोलनकारियों का कहना है कि यह केवल रोजगार की लड़ाई नहीं, बल्कि आदिवासियों के अधिकार और भविष्य की लड़ाई है। उनका साफ संदेश है—
“आज अगर आदिवासी चुप रहे, तो कल उनके जंगल, जमीन और रोजगार सब छीन लिए जाएंगे।”
ग्रामीणों का आरोप है कि नई खदान शुरू होने के बावजूद स्थानीय युवाओं को रोजगार नहीं दिया जा रहा है, जबकि बाहर से लोगों को काम पर रखा जा रहा है। इससे गांवों में बेरोजगारी और असंतोष तेजी से बढ़ रहा है।
75 प्रतिशत स्थानीय रोजगार की मुख्य मांग
इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य नई रांजाबुरु खदान में प्रभावित गांवों के 75 प्रतिशत बेरोजगार युवाओं को रोजगार दिलाना है। इसके साथ ही आंदोलनकारी निम्न मांगें भी उठा रहे हैं—
* ट्रांसपोर्टिंग और ड्राइविंग कार्यों में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता
* ठेका कार्यों में गांव के लोगों की भागीदारी
* स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं का विकास
* CSR के तहत गांवों में ठोस विकास कार्य
ग्रामीणों का कहना है कि खदान से सबसे अधिक प्रभावित वही लोग हैं, लेकिन उन्हें ही विकास से वंचित रखा जा रहा है।
मानकी लागुड़ा देवगम और मुखिया राजू शांडिल के नेतृत्व में आंदोलन
यह आंदोलन सारंडा पीढ़ के मानकी लागुड़ा देवगम और गंगदा पंचायत के मुखिया राजू शांडिल के नेतृत्व में चल रहा है। दोनों नेताओं ने कहा कि जब तक प्रबंधन ठोस आश्वासन नहीं देता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह संघर्ष लंबा चल सकता है, क्योंकि अब ग्रामीण पीछे हटने के मूड में नहीं हैं।
कई संगठनों का मिला समर्थन
आंदोलन को अब सामाजिक और आदिवासी संगठनों का भी समर्थन मिलने लगा है।
मानकी-मुंडा संघ, आदिवासी हो समाज युवा महासभा सहित कई संगठनों ने आंदोलन को जायज ठहराते हुए अपना समर्थन दिया है।
इन संगठनों का कहना है कि यह केवल एक खदान का मामला नहीं, बल्कि पूरे सारंडा क्षेत्र के आदिवासी युवाओं के भविष्य से जुड़ा सवाल है।
प्रबंधन और ठेका कंपनी की चुप्पी
पांच दिन बीत जाने के बावजूद अब तक न तो प्रबंधन की ओर से और न ही ठेका कंपनी की ओर से कोई प्रतिनिधि आंदोलनकारियों से वार्ता करने पहुंचा है। इससे ग्रामीणों में नाराजगी और बढ़ गई है।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि जानबूझकर उनकी मांगों को नजरअंदाज किया जा रहा है ताकि आंदोलन कमजोर पड़े, लेकिन ग्रामीणों ने साफ कर दिया है कि वे बिना समाधान के पीछे नहीं हटेंगे।
आंदोलन स्थल बना एकता का केंद्र
आंदोलन स्थल पर गांव-गांव से लोग पहुंच रहे हैं। महिलाएं, बुजुर्ग और युवा सभी आंदोलन में शामिल हो चुके हैं। रात-दिन वहीं डेरा डालकर लोग अपनी मांगों को बुलंद कर रहे हैं। नारे गूंज रहे हैं—
“रोजगार नहीं तो खनन नहीं”
“हमारी जमीन, हमारा हक”










