मेडिकल लापरवाही, ठेका श्रमिकों का शोषण और अमानवीय व्यवस्था पर संघ का तीखा प्रहार
बैठक में उठा मजदूरों का दर्द, प्रबंधन पर सीधा हमला
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
झारखंड मज़दूर संघर्ष संघ किरीबुरू और सेल प्रबंधन के बीच स्थानीय समस्याओं को लेकर हुई लंबी और तीखी बैठक आखिरकार कई बड़े सवाल छोड़ गई। बैठक का केंद्र बिंदु रहा—मेडिकल व्यवस्था की बदहाली और ठेका श्रमिकों के साथ हो रहा अन्याय।
संघ के केंद्रीय अध्यक्ष रमा पाण्डे ने दो टूक शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि अगर अनैतिक कार्यों पर लगाम नहीं लगी, तो संगठन किसी भी हद तक जाने को तैयार है।

अस्पताल की अमानवीय तस्वीर: शव के लिए भी संघर्ष
बैठक में सबसे ज्यादा आक्रोश उस मुद्दे पर देखने को मिला, जिसमें कर्मचारियों या उनके आश्रितों की मृत्यु के बाद अस्पताल द्वारा शव को घर तक पहुंचाने के लिए एम्बुलेंस नहीं दी जाती।
* परिजनों को शव ले जाने के लिए भटकना पड़ता है
* आर्थिक और मानसिक रूप से टूट चुके परिवारों को और अपमान झेलना पड़ता है
इसे “अमानवीय और शर्मनाक” बताते हुए संघ ने तत्काल सुधार की मांग की।
प्रबंधन का जवाब:
अब मृतक का शव घर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी सेल प्रबंधन और अस्पताल की होगी—यह आश्वासन दिया गया।
रेफरल सिस्टम पर गंभीर सवाल
अस्पताल की सबसे बड़ी खामी—रेफर करने में देरी और मनमानी—बैठक में जमकर उठी।
संघ ने तीखे सवाल दागे:
* एक बार रेफर होने के बाद मरीज को रिव्यू में क्यों नहीं भेजा जाता?
* क्या एक बार रेफर होने के बाद मरीज पूरी तरह ठीक हो जाता है?
* एक डॉक्टर की इच्छा पर रेफर क्यों निर्भर करता है?
अस्पताल प्रबंधन इन सवालों का संतोषजनक जवाब देने में पूरी तरह विफल रहा।
मेडिकल एथिक्स की खुलेआम अनदेखी
महामंत्री राजेन्द्र सिंधिया ने मेडिकल एथिक्स का हवाला देते हुए स्पष्ट कहा—
* मरीज को उसके इलाज का पूरा ब्यौरा देना अनिवार्य है
* रेफर होने पर मेडिकल रिकॉर्ड उपलब्ध कराना जरूरी है
लेकिन हकीकत यह है कि:
* मरीजों को अपने ही इलाज का विवरण मांगना पड़ता है
* दवाइयों और इलाज की जानकारी छुपाई जाती है
यह सीधे तौर पर मेडिकल एथिक्स का उल्लंघन है।
‘रेफर में देरी’ = जान से खिलवाड़
बैठक में सबसे तीखा हमला इस बात पर हुआ कि मरीजों को एक-दो हफ्ते बाद रेफर किया जाता है।
संघ ने सवाल उठाया:
“मेडिकल एथिक्स के किस नियम में लिखा है कि रेफर एक हफ्ते बाद होगा?”
इस सवाल पर अस्पताल प्रबंधन पूरी तरह निरुत्तर रहा।
स्पष्ट संदेश दिया गया—
“योजनाएं बदल सकती हैं, लेकिन एक बार जान चली गई तो वापस नहीं आएगी।”

डॉक्टर और मशीनों की कमी, फिर भी लापरवाही क्यों?
संघ ने यह भी उजागर किया कि:
* अस्पताल में डॉक्टरों की भारी कमी है
* जांच के लिए पर्याप्त मशीनें नहीं हैं
ऐसी स्थिति में रेफर ही एकमात्र विकल्प होना चाहिए, लेकिन यहां भी देरी और मनमानी हो रही है।
यह स्थिति मरीजों के जीवन के साथ खिलवाड़ से कम नहीं।
बाहर बीमार कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत
एक अहम फैसला यह लिया गया कि किरीबुरू से बाहर छुट्टी पर गए कर्मचारियों के बीमार होने पर:
रेफर पेपर न मिलने पर भी इलाज का खर्च दिया जाएगा
मेडिकल ट्रैवलिंग अलाउंस 5000 से बढ़ाकर 11000 रुपये किया गया
यह निर्णय कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत साबित होगा।
एम्बुलेंस सुविधा में बड़ा बदलाव
बैठक में यह भी तय हुआ:
* IGH के लिए 12-सीटर AC एम्बुलेंस दी जाएगी
* एक नई एम्बुलेंस की मांग को भी मंजूरी
साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि मरीज को रेफर कराने के लिए यूनियन को अस्पताल नहीं आना पड़े—यह जिम्मेदारी अस्पताल की होगी।
ठेका श्रमिकों का शोषण: अब नहीं चलेगा
बैठक में ठेका श्रमिकों के मुद्दे भी जोरदार तरीके से उठे।
मुख्य शिकायतें:
* ठेकेदार पैसे नहीं देते
* मजदूरों को अचानक काम से बैठा दिया जाता है
संघ ने सख्त चेतावनी दी:
* बिना कारण किसी श्रमिक को नहीं हटाया जा सकता
* 15 दिन पहले नोटिस देना अनिवार्य होगा
कारण स्पष्ट करना होगा
अन्यथा संगठन श्रम कानून के तहत कड़ा कदम उठाएगा।
प्रबंधन को भी दी गई जिम्मेदारी
सिर्फ ठेकेदार ही नहीं, बल्कि सेल प्रबंधन को भी चेताया गया कि:
* ऐसे मामलों पर नजर रखे
* नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करे
लंबी बैठक, कई फैसले—1 मई से लागू
घंटों चली इस बैठक में कई अहम मुद्दों पर सहमति बनी।
सबसे बड़ी बात यह रही कि—
👉 सभी फैसलों को 1 मई (श्रमिक दिवस) से लागू करने की घोषणा की गई

अब ‘सिस्टम’ बदलेगा या संघर्ष तेज होगा?
किरीबुरू की इस बैठक ने साफ कर दिया है कि मजदूर अब चुप रहने वाले नहीं हैं।
मेडिकल लापरवाही, अमानवीय व्यवहार और श्रमिकों के शोषण के खिलाफ अब सीधी लड़ाई शुरू हो चुकी है।
अगर प्रबंधन ने वादों को जमीन पर नहीं उतारा, तो आने वाले दिनों में यह आंदोलन और उग्र रूप ले सकता है।
संघ का साफ संदेश:
👉 “या तो व्यवस्था सुधरेगी, या फिर संघर्ष और तेज होगा।”












