ओल चिकी, श्रम और समानता के संदेश के साथ धर्मारगुट्टू टोला में उमड़ा जनसैलाब
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
सारंडा स्थित छोटानागरा गांव के धर्मारगुट्टू टोला में वैशाख पूर्णिमा के पावन अवसर पर संथाल समाज ने अपनी सांस्कृतिक पहचान और गौरव के प्रतीक, रघुनाथ मुर्मू (गुरु गोमके) की 121वीं जयंती पूरे श्रद्धा, उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाई। यह आयोजन न केवल एक जन्मोत्सव था, बल्कि संथाल समाज की भाषा, संस्कृति और सामाजिक चेतना का जीवंत प्रदर्शन भी बना।

परंपरा और पहचान का संगम
धर्मारगुट्टू टोला में सुबह से ही पारंपरिक वेशभूषा में सजे ग्रामीणों का जुटान शुरू हो गया। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक गीतों के बीच कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। महिलाओं और पुरुषों ने मिलकर सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना की और गुरु गोमके को नमन किया।

ओल चिकी लिपि (पारसी) पर गर्व, सांस्कृतिक विरासत का सम्मान
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने ओल चिकी लिपि के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह केवल एक भाषा का माध्यम नहीं, बल्कि संथाल समाज की पहचान और आत्मसम्मान का प्रतीक है।
वक्ताओं ने कहा कि ओल चिकी लिपि ने संथाली भाषा को एक नई दिशा दी और समाज को शिक्षा व जागरूकता के रास्ते पर आगे बढ़ाया।

मजदूर दिवस का संदेश—समानता और सम्मान
वैशाख पूर्णिमा के साथ-साथ कार्यक्रम में मजदूर दिवस के महत्व को भी प्रमुखता से उठाया गया। वक्ताओं ने कहा कि समाज के विकास में मजदूरों की भूमिका अहम है और महिला व पुरुष मजदूरों को समान अधिकार और सम्मान मिलना चाहिए।
“श्रम ही समाज की नींव है, और इसमें किसी भी प्रकार का भेदभाव स्वीकार्य नहीं,”—यह संदेश पूरे कार्यक्रम में गूंजता रहा।
सामाजिक एकता और जागरूकता का आह्वान
इस मौके पर संथाल समाज के लोगों ने सामाजिक एकता, शिक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण पर जोर दिया। युवाओं से अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं को सहेजने की अपील की गई, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी रहें।

इनकी रही सक्रिय भागीदारी
कार्यक्रम में उप मुखिया सह एसटी खेरवाड़ एभेन अखाड़ा के अध्यक्ष रमेश हांसदा, सचिव गोपाल टुडू, नवीन हांसदा, मंगल मुर्मू, रतन मुर्मू सहित बड़ी संख्या में ग्रामीणों की उपस्थिति रही। सभी ने मिलकर इस आयोजन को सफल बनाया।
संथाल समाज की पहचान का जीवंत उदाहरण
धर्मारगुट्टू टोला में आयोजित यह कार्यक्रम इस बात का प्रमाण है कि संथाल समाज आज भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से गहराई से जुड़ा हुआ है। गुरु गोमके की जयंती के माध्यम से न केवल अतीत को याद किया गया, बल्कि भविष्य के लिए एक मजबूत सामाजिक और सांस्कृतिक दिशा भी तय की गई।
यह आयोजन एक संदेश दे गया—अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने श्रम के सम्मान से ही समाज की असली पहचान बनती है।













