चार दौर की बातचीत विफल, 18 गांवों की आपसी फूट बनी सबसे बड़ी बाधा; अधूरी बैठक के बाद फिर बुलाए गए मुंडा-मानकी
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
सारंडा क्षेत्र के गुवा खदान से प्रभावित 18 गांवों में रोजगार को लेकर चल रहा विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। लगातार असफल वार्ताओं और आंदोलनों के बीच अब 20 अप्रैल को होने वाली प्रस्तावित बैठक को ही समाधान की आखिरी उम्मीद के रूप में देखा जा रहा है।
सेल, गुवा प्रबंधन ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि जब तक सभी गांवों के प्रतिनिधि एक साथ बैठकर निर्णय नहीं लेंगे, तब तक इस जटिल समस्या का हल संभव नहीं है।

18 अप्रैल की वार्ता अधूरी, नहीं पहुंचे सभी प्रतिनिधि
प्रबंधन द्वारा 18 अप्रैल को दोपहर 3 बजे सभी 18 गांवों के मुंडा और मानकी को वार्ता के लिए आमंत्रित किया गया था। लेकिन बैठक में केवल पांच गांवों के मुंडा ही उपस्थित हुए, जिससे वार्ता अधूरी रह गई।
प्रतिनिधित्व के अभाव में बैठक को स्थगित कर दिया गया और अब पुनः 20 अप्रैल को दोपहर 3 बजे जनरल ऑफिस, गुवा में बैठक बुलाई गई है।
चार बार वार्ता, लेकिन हर बार नतीजा शून्य
रोजगार की मांग को लेकर चल रहे इस आंदोलन को समाप्त करने के लिए प्रबंधन अब तक चार बार वार्ता कर चुका है, लेकिन हर बार बातचीत किसी न किसी कारण से विफल रही।
15 अप्रैल से शुरू हुई तीन दिवसीय भूख हड़ताल के दौरान भी प्रबंधन ने आंदोलन स्थल पर पहुंचकर वार्ता की कोशिश की। आंदोलनकारियों के प्रतिनिधियों को जनरल ऑफिस बुलाकर बातचीत की गई, लेकिन समाधान नहीं निकल सका।

पहले भी हुआ था समझौता, फिर क्यों भड़का विवाद?
इससे पहले गुवा खदान में अनिश्चितकालीन हड़ताल के दौरान मंत्री दीपक बिरुआ की अध्यक्षता में प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में समझौता हुआ था। उस समय आंदोलन समाप्त भी कर दिया गया था।
लेकिन जमीनी स्तर पर उस समझौते का क्रियान्वयन सही समय से नहीं हो सका, जिसके कारण एक बार फिर दूसरे ग्रुप द्वारा आंदोलन शुरू किया गया और स्थिति पहले जैसी जटिल हो गई।
18 गांव, लेकिन नेतृत्व बंटा—यहीं फंसा पूरा मामला
इस विवाद का सबसे बड़ा कारण है—18 गांवों के बीच एकजुटता का अभाव।
मुंडा और मानकी अलग-अलग गुटों में बंटे हुए हैं। कोई भी समूह दूसरे के नेतृत्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। हर गुट खुद को असली प्रतिनिधि साबित करने में लगा हुआ है, जिससे सामूहिक निर्णय लेना मुश्किल हो गया है।
ग्रामीणों में असंतोष, अपने ही नेतृत्व पर उठ रहे सवाल
कई गांवों में स्थिति ऐसी है कि ग्रामीण अपने ही मुंडा के नेतृत्व को मानने से इंकार कर रहे हैं।
कुछ मुंडाओं पर यह आरोप भी लग रहा है कि वे पहले अपने परिवार या करीबी लोगों को रोजगार दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे आम बेरोजगार युवाओं में आक्रोश बढ़ रहा है और नेतृत्व की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
बाहरी हस्तक्षेप से और उलझा मामला
सूत्रों के अनुसार, कुछ बाहरी लोग भी इस मुद्दे को प्रभावित कर रहे हैं। वे ग्रामीणों को अलग-अलग दिशा में भड़काकर एकजुटता को कमजोर कर रहे हैं।
इसका असर यह हो रहा है कि हर बार वार्ता बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो जाती है।

प्रबंधन की नई रणनीति: ‘सभी एक साथ, तभी समाधान’
गुवा प्रबंधन ने अब स्पष्ट रणनीति अपनाई है कि सभी 18 गांवों के मुंडा और मानकी को एक साथ बैठाकर ही समाधान निकाला जाएगा।
20 अप्रैल की बैठक इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है, जहां सभी पक्षों को एक मंच पर लाकर स्थायी समाधान निकालने की कोशिश की जाएगी।
20 अप्रैल की बैठक तय करेगी आगे की दिशा
गुवा खदान का यह विवाद अब केवल रोजगार का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक एकता और नेतृत्व की परीक्षा बन चुका है।
अब सबकी नजर 20 अप्रैल की बैठक पर टिकी है। अगर इस बार भी एकजुटता नहीं बनी, तो यह विवाद और लंबा खिंच सकता है। वहीं, अगर सभी पक्ष एकमत हुए, तो वर्षों पुरानी समस्या का समाधान भी संभव है।














