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जैतगढ़ के बालू घाटों पर ‘माफिया राज’! खुलेआम कानून की हत्या, सिस्टम बना मूक दर्शक

On: April 18, 2026 12:23 PM
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जगन्नाथपुर पुलिस–खनन विभाग की मिलीभगत से दिन-रात लूट, पेशा कानून कुचला—नदी और आदिवासी अधिकार खतरे में

रिपोर्ट — शैलेश सिंह

जगन्नाथपुर थाना अंतर्गत जैतगढ़ ओपी क्षेत्र के गुमुरिया, मुंडुई, कुआपाड़ा, तुरली और बारला बालू घाट आज अवैध खनन के ऐसे अड्डे बन चुके हैं, जहां कानून सिर्फ कागजों में जिंदा है। जमीन पर हकीकत यह है कि यहां माफियाओं का सीधा शासन चलता है और प्रशासन—चाहे वह पुलिस हो, खनन विभाग हो या टास्क फोर्स—सबकी भूमिका संदेह के घेरे में है।
उच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेशों के बावजूद इन घाटों से अवैध बालू का उठाव बदस्तूर जारी है। दिन हो या रात, ट्रैक्टर, हाईवा और जेसीबी की आवाजें यह साबित करती हैं कि यहां शासन नहीं, बल्कि ‘सिस्टम से संरक्षित अपराध’ चल रहा है।

पेशा कानून की खुलेआम धज्जियां

पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम—यानी पेशा कानून—स्पष्ट कहता है कि आदिवासी क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों पर पहला अधिकार ग्राम सभा का होगा।
लेकिन जैतगढ़ में हो क्या रहा है?
* ग्राम सभा से कोई अनुमति नहीं
* बालू घाटों की कोई वैध नीलामी नहीं
* स्थानीय पंचायतों की पूरी तरह अनदेखी
यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि आदिवासी स्वशासन की हत्या है। सवाल यह है—सरकार आखिर ग्राम सभाओं को मजबूत क्यों नहीं करना चाहती?

दिन-रात चल रहा ‘बालू का साम्राज्य’

गुमुरिया, मुंडुई, कुआपाड़ा, तुरली और बारला घाटों पर हर दिन दर्जनों ट्रैक्टर 100 से अधिक ट्रिप करते हैं।
सब कुछ होता है—
* बिना चालान
* बिना परमिट
* बिना सरकारी अनुमति
और यह सब पुलिस की आंखों के सामने।
स्थानीय लोगों के अनुसार, कई बार एक साथ 20–30 ट्रैक्टरों का काफिला निकलता है। गांवों के आसपास बड़े पैमाने पर अवैध स्टॉकयार्ड बनाए गए हैं, जहां जेसीबी से बालू लोड कर हाईवा के जरिए दूर-दराज तक सप्लाई किया जाता है।
यह कोई छुपा हुआ अपराध नहीं—यह ‘खुलेआम चल रही समानांतर अर्थव्यवस्था’ है।

पुलिस की भूमिका—रक्षक या दर्शक?

जगन्नाथपुर थाना (जैतगढ़ ओपी) की पुलिस पर सबसे गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है—
“पुलिस सिर्फ ट्रैक्टर गिनती है, रोकती नहीं।”
अगर कोई गरीब ट्रैक्टर मालिक बिना ‘माफिया टैक्स’ दिए काम करता है, तो उसकी गाड़ी तुरंत पकड़ ली जाती है, केस दर्ज होता है।
लेकिन जो माफिया के सिस्टम में शामिल हैं—उनके ट्रैक्टर और हाईवा बिना किसी रोक-टोक के चलते रहते हैं।
यह दोहरी नीति क्या दर्शाती है?
* क्या पुलिस कार्रवाई चुनिंदा लोगों पर ही होती है?
* क्या ‘ऊपर तक सेटिंग’ के बिना इतना बड़ा नेटवर्क चल सकता है?

खनन विभाग—सबसे बड़ा ‘मौन सहयोगी’

खनन विभाग की भूमिका इस पूरे खेल में सबसे ज्यादा संदिग्ध है।
* घाटों की नीलामी नहीं कराई गई
* अवैध खनन पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं
* प्राथमिकी दर्ज नहीं होती
* जब्ती के बाद वाहन छोड़ दिए जाते हैं
ऐसा लगता है जैसे विभाग ने जानबूझकर मैदान खाली छोड़ दिया हो, ताकि माफिया खुलकर खेल सकें।

टास्क फोर्स—नाम बड़ा, काम शून्य

जिला स्तर पर खनन टास्क फोर्स की बैठकें होती हैं, आदेश जारी होते हैं, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं बदलता।
सवाल उठता है—
* क्या टास्क फोर्स सिर्फ कागजी खानापूर्ति है?
* क्या कार्रवाई की सूचना पहले ही माफियाओं तक पहुंच जाती है?

‘माफिया टैक्स’—संगठित वसूली तंत्र

इस अवैध कारोबार का सबसे खतरनाक पहलू है—संगठित वसूली।
* प्रति ट्रैक्टर: ₹15,000–₹20,000 प्रति माह
* हाईवा: दोगुना या तिगुना
यह पैसा जाता है—
* माफिया गिरोह के पास
* उनके राजनीतिक संरक्षकों तक
* और उस हिस्से तक, जो प्रशासन की चुप्पी खरीदता है
जो पैसा नहीं देता—
* उसका ट्रैक्टर जब्त
* केस दर्ज
* डराकर बाहर कर दिया जाता है
यह पूरी व्यवस्था किसी संगठित अपराध सिंडिकेट से कम नहीं।

राजनीतिक संरक्षण—माफिया की असली ताकत

सूत्रों के अनुसार इस पूरे नेटवर्क को कुछ प्रभावशाली लोगों का संरक्षण प्राप्त है।
यही लोग तय करते हैं—
* कौन घाट पर काम करेगा
* कौन ट्रांसपोर्ट करेगा
* किसे कितना हिस्सा मिलेगा
अगर कोई अधिकारी ईमानदारी दिखाता है, तो उसका तबादला लगभग तय हो जाता है।
यह गठजोड़—
माफिया + राजनीति + अफसरशाही
आज जैतगढ़ को अवैध खनन का गढ़ बना चुका है।

पर्यावरण पर सबसे बड़ा हमला

यह सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं है—यह प्रकृति के खिलाफ युद्ध है।
जेसीबी से नदी की धारा काटी जा रही है। इसके परिणाम:
* नदी का रुख बदल रहा है
* खेतों में कटाव
* भूजल स्तर गिर रहा है
* पुल-पुलियों की नींव कमजोर
* बाढ़ का खतरा कई गुना बढ़ा
आने वाले वर्षों में इसका असर भयावह हो सकता है, लेकिन प्रशासन की चुप्पी इस विनाश को तेज कर रही है।

‘बालू हाईवे’ में बदलती सड़कें

जैतगढ़ से नोवामुंडी, बड़ाजामदा, जगन्नाथपुर और आसपास के क्षेत्रों की सड़कें अब ‘बालू हाईवे’ बन चुकी हैं।
दिन-रात में जहां पुलिस पेट्रोलिंग होनी चाहिए, वहां—
* ट्रैक्टरों की कतार
* हाईवा की तेज रफ्तार
* और चौकियों की खामोशी
स्थानीय लोग साफ कहते हैं—
“सब सेटिंग है, तभी कोई नहीं रोकता।”

सरकारी खजाने को करोड़ों का चूना

अनुमान के मुताबिक—
* रोजाना करीब ₹15-20 लाख की बालू तस्करी
* सालाना ₹30–35 करोड़ का नुकसान
अगर वैध नीलामी होती, तो यह पैसा सरकारी खजाने में जाता।
लेकिन अभी?
यह सीधा माफियाओं की जेब में जा रहा है।

ग्रामीणों में आक्रोश, लेकिन आवाज दबाई जाती है

गांव के लोग इस पूरे खेल से परेशान हैं, लेकिन बोलने से डरते हैं।
* धमकी दी जाती है
* घर तक दबाव बनाया जाता है
* शिकायत करने पर कार्रवाई नहीं होती
अब कई पंचायतों में तनाव बढ़ रहा है।

ग्राम सभा को कमजोर करने की साजिश

अगर पेशा कानून लागू हो जाए, तो—
* घाट का नियंत्रण ग्राम सभा के पास होगा
* माफियाओं का खेल खत्म हो जाएगा
* राजस्व पारदर्शी होगा
यही कारण है कि—
* ग्राम सभा को अधिकार नहीं दिया जा रहा
* पंचायतों को नजरअंदाज किया जा रहा
यह एक सुनियोजित रणनीति प्रतीत होती है।

CNT जमीन पर ‘माफिया महल’

सूत्रों के अनुसार एक बड़े माफिया ने खुटियापदा क्षेत्र में आदिवासी की CNT जमीन पर अवैध रूप से आलीशान मकान खड़ा कर लिया है।
यह सिर्फ जमीन का कब्जा नहीं—
यह आदिवासी अधिकारों पर सीधा हमला है।

सब जानते हैं—फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं?

सबको पता है—
* कौन माफिया है
* कौन संरक्षण दे रहा है
* पैसा कहां जा रहा है
* तस्करी कब और कैसे होती है
फिर भी—
कार्रवाई शून्य।
यह चुप्पी अपने आप में सबसे बड़ा सबूत है।

अंतिम सवाल—क्या सरकार माफियाओं के सामने झुक चुकी है?

आज सवाल सिर्फ अवैध बालू का नहीं है।
यह लड़ाई है—
* आदिवासी अधिकारों की
* ग्राम सभा की ताकत की
* पर्यावरण के अस्तित्व की
* और सरकारी सिस्टम की साख की
अगर अब भी—
* घाटों की वैध नीलामी नहीं हुई
* पेशा कानून लागू नहीं हुआ
* माफियाओं पर कार्रवाई नहीं हुई
तो आने वाले समय में जैतगढ़ के ये घाट पूरी तरह बर्बाद हो जाएंगे।

अब नहीं तो कभी नहीं

जैतगढ़ की यह कहानी सिर्फ एक इलाके की नहीं है—यह उस सिस्टम की पोल खोलती है, जहां कानून कमजोर और माफिया मजबूत हो चुके हैं।
अब फैसला सरकार और प्रशासन को करना है—
क्या वे कानून लागू करेंगे?
या फिर बालू माफियाओं को ही ‘स्थानीय सरकार’ बनने देंगे?

(अगली कड़ी में:- कौन कौन है इस माफिया साम्राज्य का बड़ा चेहरा…किसके हिस्से में जाती है कितनी हिस्सेदारी… कैसे चलता है पूरा नेटवर्क)

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सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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