लंबे समय से चल रही भाजपा में शामिल होने की अटकलों से बढ़ रही राजनीतिक हलचल !
रिपोर्ट शैलेश सिंह
चक्रधरपुर के दबंग, चर्चित और जनाधार वाले विधायक सुखराम उरांव को लेकर लंबे समय से राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। चर्चा इस बात की है कि यदि झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के कद्दावर आदिवासी नेता सुखराम उरांव भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लेते हैं तो पश्चिम सिंहभूम जिले की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। इतना ही नहीं, सिंहभूम लोकसभा सीट समेत जिले की कई विधानसभा सीटों का राजनीतिक गणित भी पूरी तरह बदल सकता है।
काफी दिनों से उनके भाजपा में जाने की चर्चाओं ने राजनीतिक पर्यवेक्षकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। हालांकि अभी तक इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर लगातार चर्चाएं हो रही हैं।

आदिवासी क्षेत्रों में मजबूत पकड़, गैर आदिवासियों में भी प्रभाव
सुखराम उरांव की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उनका व्यापक जनाधार माना जाता है। उनकी पकड़ केवल आदिवासी बहुल ग्रामीण इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि चक्रधरपुर, चाईबासा और अन्य शहरी क्षेत्रों में भी उनकी अच्छी स्वीकार्यता देखी जाती है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पश्चिम सिंहभूम जिले में ऐसे नेताओं की संख्या बहुत कम है जिनकी पकड़ आदिवासी और गैर आदिवासी दोनों वर्गों में समान रूप से हो। सुखराम उरांव उन चुनिंदा नेताओं में शामिल माने जाते हैं जिनके समर्थकों का आधार जाति, वर्ग और क्षेत्रीय सीमाओं से आगे तक फैला हुआ है।
विशेषकर युवाओं, खिलाड़ियों और सामाजिक संगठनों के बीच उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ी है। यही कारण है कि वे केवल एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नेता नहीं माने जाते बल्कि जिले के बड़े आदिवासी चेहरे के रूप में देखे जाते हैं।

सन्नी उरांव की जीत ने दिया बड़ा राजनीतिक संदेश
चक्रधरपुर नगरपालिका अध्यक्ष पद के चुनाव ने सुखराम उरांव की राजनीतिक ताकत को और मजबूती से स्थापित किया। उन्होंने अपने पुत्र सन्नी उरांव को चुनावी मैदान में उतारा और सन्नी उरांव ने शानदार जीत दर्ज की।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि चक्रधरपुर शहरी क्षेत्र में गैर आदिवासी मतदाताओं की संख्या अधिक है। इसके बावजूद सन्नी उरांव की जीत ने यह संकेत दिया कि सुखराम उरांव का प्रभाव केवल ग्रामीण आदिवासी इलाकों तक सीमित नहीं है बल्कि शहरों में भी उनकी मजबूत पकड़ है।
यह परिणाम इस बात का भी संकेत माना गया कि सुखराम उरांव ने अपने समर्थकों का एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया है जो पारंपरिक वोट बैंक की सीमाओं से आगे बढ़ चुका है।

तीन बार विधायक बनकर स्थापित की अलग पहचान
सुखराम उरांव चक्रधरपुर विधानसभा क्षेत्र से तीन बार विधायक निर्वाचित हो चुके हैं। वर्ष 2005, 2019 और 2024 में उन्होंने जनता का विश्वास जीतकर विधानसभा पहुंचने में सफलता हासिल की।
वर्ष 2019 का चुनाव विशेष रूप से चर्चा में रहा, जब उन्होंने भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद स्वर्गीय लक्ष्मण गिलुवा को पराजित कर राजनीतिक हलकों को चौंका दिया था। उस चुनाव में मिली जीत ने उन्हें कोल्हान क्षेत्र के सबसे प्रभावशाली नेताओं की श्रेणी में ला खड़ा किया।
इसके बाद 2024 में लगातार दूसरी बार जीत दर्ज कर उन्होंने उस राजनीतिक मिथक को भी तोड़ दिया कि चक्रधरपुर सीट से लगातार दो बार जीत हासिल करना आसान नहीं है।

मनोहरपुर से लेकर सरायकेला तक फैला नेटवर्क
सुखराम उरांव की राजनीतिक पहुंच केवल चक्रधरपुर तक सीमित नहीं मानी जाती। मनोहरपुर विधानसभा क्षेत्र में भी उनका प्रभाव देखा जाता है। उनकी पत्नी नवमी उरांव लंबे समय से सक्रिय राजनीति और सामाजिक गतिविधियों से जुड़ी रही हैं।
2009 के विधानसभा चुनाव में नवमी उरांव ने मनोहरपुर सीट से चुनाव लड़कर कड़ा मुकाबला किया था। उस चुनाव के परिणामों ने यह संकेत दिया था कि मनोहरपुर क्षेत्र में भी उरांव परिवार की अच्छी राजनीतिक पकड़ है।
इसके अलावा चाईबासा, जगन्नाथपुर, सरायकेला, मझगांव और खरसावां जैसे क्षेत्रों में भी उनके समर्थकों और कार्यकर्ताओं का मजबूत नेटवर्क बताया जाता है। यही कारण है कि उन्हें केवल एक विधानसभा क्षेत्र का नेता नहीं बल्कि पूरे जिले का प्रभावशाली चेहरा माना जाता है।

भाजपा को मिल सकता है बड़ा राजनीतिक लाभ
यदि भविष्य में सुखराम उरांव भाजपा में शामिल होते हैं तो पार्टी को पश्चिम Singhbhum और कोल्हान क्षेत्र में बड़ा लाभ मिलने की संभावना जताई जा सकती है।
भाजपा लंबे समय से कोल्हान में अपने संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। आदिवासी बहुल क्षेत्रों में पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई है। ऐसे में सुखराम उरांव जैसे जनाधार वाले नेता का भाजपा में शामिल होना पार्टी के लिए राजनीतिक संजीवनी साबित हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भाजपा को आदिवासी मतदाताओं के बीच नई स्वीकार्यता मिल सकती है और संगठनात्मक स्तर पर भी मजबूती आएगी।

सिंहभूम लोकसभा सीट पर बदल सकता है चुनावी गणित
राजनीतिक चर्चाओं का सबसे बड़ा केंद्र सिंहभूम लोकसभा सीट है। यदि भाजपा सुखराम उरांव को लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाती है तो चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।
सिंहभूम लोकसभा क्षेत्र में आदिवासी मतदाताओं की संख्या निर्णायक मानी जाती है। सुखराम उरांव की आदिवासी समाज में मजबूत पकड़ भाजपा को बड़ा लाभ दिला सकती है। वहीं गैर आदिवासी वर्ग में उनकी स्वीकार्यता पार्टी के लिए अतिरिक्त फायदा साबित हो सकती है।
युवाओं और खेल – संस्कृति जगत से जुड़े लोगों के बीच उनकी लोकप्रियता भी चुनावी माहौल में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

मधु कोड़ा और गीता कोड़ा की मौजूदगी बनेगी बड़ी चुनौती
हालांकि सुखराम उरांव के लिए राह पूरी तरह आसान नहीं होगी। भाजपा में पहले से पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा और पूर्व सांसद गीता कोड़ा जैसे बड़े राजनीतिक चेहरे मौजूद हैं।
दोनों नेताओं का सिंहभूम लोकसभा क्षेत्र में अपना अलग राजनीतिक प्रभाव और पहचान है। ऐसे में टिकट वितरण के समय भाजपा नेतृत्व के सामने संतुलन बनाने की चुनौती रहेगी।
यदि पार्टी सुखराम उरांव को प्राथमिकता देती है तो यह कोल्हान की राजनीति में एक नए शक्ति केंद्र के उभरने का संकेत होगा। वहीं यदि मधु कोड़ा या गीता कोड़ा को टिकट मिलता है तो सुखराम उरांव के भाजपा में शामिल होने की संभावना कम रहेगी या उनकी भूमिका संगठनात्मक स्तर पर महत्वपूर्ण हो सकती है।

भाजपा का शीर्ष नेतृत्व ले सकता है चौंकाने वाला फैसला
भाजपा का शीर्ष नेतृत्व कई बार ऐसे निर्णय ले चुका है जिसने राजनीतिक विश्लेषकों को भी हैरान किया है। पार्टी अक्सर जीत की संभावना और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर उम्मीदवारों का चयन करती है।
यही कारण है कि राजनीतिक पर्यवेक्षक किसी भी संभावना से इनकार नहीं कर रहे हैं। यदि भाजपा को लगता है कि सुखराम उरांव के चेहरे पर चुनाव लड़ना अधिक लाभदायक होगा, तो पार्टी बड़ा राजनीतिक दांव खेलने से पीछे नहीं हटेगी।

कोल्हान की राजनीति के केंद्र में सुखराम उरांव
फिलहाल सुखराम उरांव को लेकर चल रही चर्चाएं केवल अटकलें हैं, लेकिन इतना तय है कि वे आज कोल्हान क्षेत्र की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। उनका जनाधार, संगठन क्षमता, युवा वर्ग में लोकप्रियता और विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में सक्रिय समर्थक उन्हें अन्य नेताओं से अलग पहचान देते हैं।
आने वाले समय में यदि उनके राजनीतिक कदम बदलते हैं तो केवल चक्रधरपुर ही नहीं, बल्कि पूरे पश्चिम सिंहभूम और सिंहभूम लोकसभा क्षेत्र की राजनीति का स्वरूप बदल सकता है। फिलहाल सबकी निगाहें इसी बात पर टिकी हैं कि क्या सुखराम उरांव कोई बड़ा राजनीतिक फैसला लेते हैं या फिर झामुमो के साथ ही अपनी राजनीतिक यात्रा जारी रखते हैं।









