यह सिर्फ चुनाव नहीं, 2029 की पटकथा है।
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
झारखंड की सत्ता के गलियारों में लंबे समय से दबे असंतोष का विस्फोट आखिर राज्यसभा चुनाव में खुलकर सामने आ गया। वोटों का आंकड़ा पुरी तरह पक्ष में होने और सत्ता में साझेदार होने के बावजूद कांग्रेस अपने उम्मीदवार को नहीं जिता सकी। यह सिर्फ हार नहीं, बल्कि महागठबंधन की राजनीतिक सेहत पर लगा गहरा घाव है।
मध्य प्रदेश में नामांकन संकट के बाद झारखंड में मिली यह हार कांग्रेस के लिए राजनीतिक अपमान से कम नहीं। जिस गठबंधन की एकता की दुहाई दिल्ली में दी जा रही थी, उसकी असलियत रांची में मतगणना के साथ उजागर हो गई।
कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा की हार और निर्दलीय Parimal Nathwani की जीत ने यह साफ कर दिया कि सत्ता के भीतर भरोसा खत्म हो चुका है।
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विधानसभा का गणित: आंकड़े बता रहे हैं बगावत की कहानी
झारखंड विधानसभा में कुल 81 सदस्य हैं। मौजूदा राजनीतिक स्थिति लगभग इस प्रकार है:
* महागठबंधन – 56
* एनडीए – 24
* अन्य/निर्दलीय – 1
अगर महागठबंधन पूरी तरह एकजुट रहता तो कांग्रेस उम्मीदवार को आराम से जीत मिलनी चाहिए थी। लेकिन परिणाम क्या आया?
* Baijnath Ram – 30 वोट
* Parimal Nathwani – 28 वोट
* प्रणव झा – 20 वोट
* 3 वोट रद्द
यह आंकड़े खुद गवाही दे रहे हैं कि सत्ता के भीतर कहीं न कहीं क्रॉस वोटिंग हुई।
कांग्रेस के भीतर ही फूट, मंत्री बनाम विधायक का टकराव
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा लंबे समय से रही है कि झारखंड कांग्रेस के कई मंत्री अपने ही विधायकों से तालमेल नहीं बैठा पा रहे। संगठन और सरकार के बीच समन्वय लगातार कमजोर हुआ है।
कई विधायक खुलकर नहीं, लेकिन अंदरखाने नाराज बताए जाते रहे हैं। आरोप यह भी लगते रहे कि सत्ता में बैठे कुछ मंत्री जमीनी कार्यकर्ताओं और सहयोगी विधायकों से दूरी बनाकर चल रहे हैं। यही दूरी अब वोटिंग में “साइलेंट रिवोल्ट” बनकर सामने आई।
कांग्रेस का संकट सिर्फ विपक्ष नहीं, अपने घर के भीतर भी है।
हेमंत सोरेन के लिए खतरे की घंटी
Hemant Soren के लिए यह नतीजा सीधा संदेश है—सरकार बची है, लेकिन गठबंधन की आत्मा घायल है।
आज अगर राज्यसभा चुनाव में सहयोगी एक-दूसरे पर भरोसा नहीं कर पाए, तो कल बजट, विश्वास मत या किसी बड़े राजनीतिक संकट में यही दरार सरकार के लिए भारी पड़ सकती है।
सरकार की संख्या अभी सुरक्षित दिखती है, लेकिन राजनीति में “अविश्वास” संख्या से ज्यादा खतरनाक होता है।
कांग्रेस का आरोप और वामदल का पलटवार
कांग्रेस प्रभारी के. राजू ने सीधे Rashtriya Janata Dal और वाम दलों पर “धोखे” का आरोप लगाया। लेकिन वामपंथी नेताओं ने पलटवार करते हुए कांग्रेस को ही कटघरे में खड़ा कर दिया।
यह आरोप-प्रत्यारोप बता रहा है कि गठबंधन की गाड़ी अब खड़खड़ाने लगी है।
जब साथी दल एक-दूसरे पर बिकने का आरोप लगाने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि सत्ता की साझेदारी अब मजबूरी ज्यादा है, भरोसा कम।

नाथवानी की जीत: एनडीए का सटीक वार
Parimal Nathwani की जीत ने बीजेपी को बड़ा राजनीतिक हथियार दे दिया है।
Bharatiya Janata Party अब इसे “महागठबंधन की अंद रूनी टूट” का राष्ट्रीय उदाहरण बनाकर पेश करेगी।
यह सिर्फ एक सीट नहीं, बल्कि 2029 विधानसभा चुनाव की रणनीतिक शुरुआत है।
एनडीए की अगली चाल क्या होगी?
राजनीतिक विश्लेषण कहता है कि अब एनडीए तीन बड़े मोर्चों पर हमला करेगा:
1. कांग्रेस-जेमएम दरार को गहरा करना
जहां अविश्वास है, वहां राजनीति की जमीन सबसे उपजाऊ होती है। बीजेपी यही खेलेगी।
2. असंतुष्ट विधायकों को साधना
कांग्रेस और गठबंधन के भीतर नाराज नेताओं को जोड़ने की कोशिश तेज होगी।
3. “अस्थिर सरकार” का नैरेटिव बनाना
जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि जो सरकार अपने वोट नहीं संभाल सकती, वह राज्य क्या संभालेगी?
क्या सरकार पर संकट है?
तत्काल नहीं। लेकिन राजनीतिक रूप से संकट शुरू हो चुका है।
यह परिणाम बताता है कि महागठबंधन की दीवारें बाहर से मजबूत दिख रही हैं, लेकिन भीतर से दरक रही हैं।
अगर कांग्रेस अपने घर को नहीं संभालती और हेमंत सोरेन सहयोगियों के बीच भरोसा बहाल नहीं करते, तो यह दरार आने वाले महीनों में राजनीतिक भूकंप का कारण बन सकती है।
साफ संदेश
राज्यसभा चुनाव ने झारखंड की राजनीति को आईना दिखा दिया है—
सत्ता में मुस्कान है, लेकिन भीतर गहरी तल्खी।
कांग्रेस की हार ने बता दिया कि गठबंधन में सब कुछ सामान्य नहीं।
और एनडीए के लिए यह संकेत है कि झारखंड की सत्ता की लड़ाई अब सिर्फ विपक्ष की नहीं, बल्कि सत्ता के भीतर से ही शुरू हो चुकी है।











