रिपोर्ट : शैलेश सिंह
झारखंड में दो राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले चुनाव ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दे दी है। एक तरफ सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर चली खींचतान के बाद तस्वीर लगभग साफ हो चुकी है, वहीं दूसरी सीट को लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं तेज हैं। विधानसभा के मौजूदा अंकगणित को देखें तो झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के एक उम्मीदवार की जीत लगभग शत-प्रतिशत मानी जा रही है, लेकिन दूसरी सीट पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की संभावित जीत का रास्ता भी कहीं न कहीं जेएमएम के पास बचे अतिरिक्त वोटों से होकर गुजरता दिखाई दे रहा है।

पहले सीट पर जेएमएम का दावा मजबूत
राज्यसभा चुनाव के लिए जेएमएम ने अपने वरिष्ठ नेता और लातेहार विधायक बैजनाथ राम को उम्मीदवार बनाया है। गठबंधन के भीतर प्रारंभिक मतभेदों के बावजूद पार्टी ने अंततः एक ही प्रत्याशी उतारने का फैसला किया, जिससे उसके उम्मीदवार की जीत लगभग सुनिश्चित मानी जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महागठबंधन के पास इतना संख्याबल है कि उसका पहला उम्मीदवार आसानी से जीत दर्ज कर सकता है।
दूसरी सीट पर क्यों बढ़ा रोमांच
दूसरी सीट के लिए स्थिति पूरी तरह अलग है। एनडीए अभी तक अपने अंतिम उम्मीदवार के नाम पर पूरी तरह खुलकर सामने नहीं आया है, लेकिन राजनीतिक गतिविधियां लगातार तेज हो रही हैं। विभिन्न दलों के विधायकों के बीच मुलाकातों और संभावित समर्थन की चर्चाओं ने चुनावी मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है।
इसी बीच कई अन्य नाम भी चर्चा में हैं। परिमल नाथवानी, प्रणव झा, गौरव वल्लभ और कुछ बाहरी राजनीतिक चेहरों के नामांकन पत्र खरीदने या संभावित दावेदारी की खबरों ने सियासी हलचल को और बढ़ा दिया है।
क्या जेएमएम के अतिरिक्त वोट बनेंगे निर्णायक?
राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा इस बात की है कि पहले उम्मीदवार को जिताने के बाद यदि जेएमएम और उसके सहयोगियों के पास कुछ अतिरिक्त वोट बचते हैं तो उनका उपयोग किस दिशा में होगा।
क्या ये वोट गठबंधन धर्म निभाने में खर्च होंगे?
क्या इन वोटों से किसी सहयोगी दल के प्रत्याशी को लाभ मिलेगा?
या फिर राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार कोई नया समीकरण उभरेगा?
यही वह प्रश्न है जिसने दूसरी सीट को बेहद रोचक बना दिया है।
नई राजनीतिक बिसात और पुराने आरोप
झारखंड की राजनीति में राज्यसभा चुनाव हमेशा से जोड़-तोड़ और क्रॉस वोटिंग की चर्चाओं के केंद्र में रहे हैं। इस बार भी विपक्ष और सत्तापक्ष के बीच एक-दूसरे पर राजनीतिक समझौते और गुप्त रणनीति बनाने के आरोप लगाए जा रहे हैं। कुछ नेताओं ने तो भाजपा और जेएमएम के बीच संभावित अंदरूनी तालमेल तक के सवाल उठाए हैं।
हालांकि किसी भी दल ने ऐसे आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
संभावित प्रत्याशियों की चर्चा
राजनीतिक हलकों में जिन नामों की चर्चा सबसे अधिक है, उनमें—
* बैजनाथ राम (जेएमएम)
* प्रणव झा (कांग्रेस)
* परिमल नाथवानी
* गौरव वल्लभ
* एनडीए का संभावित अधिकृत प्रत्याशी
* अन्य निर्दलीय या समर्थित उम्मीदवार
शामिल बताए जा रहे हैं। अंतिम तस्वीर नामांकन और समर्थन पत्रों के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगी।

हेमंत सोरेन के फैसले पर टिकी निगाहें
राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नजर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की रणनीति पर टिकी हुई है। यदि महागठबंधन पूरी एकजुटता के साथ चलता है तो एक सीट उसकी झोली में जाना तय माना जा रहा है। लेकिन दूसरी सीट पर बचने वाले वोट किस दिशा में जाएंगे, यही इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक रहस्य बन गया है।
झारखंड का यह राज्यसभा चुनाव केवल दो सांसद चुनने का चुनाव नहीं, बल्कि आने वाले राजनीतिक समीकरणों की दिशा तय करने वाला मुकाबला बनता जा रहा है। एक तरफ जेएमएम के उम्मीदवार की जीत लगभग निश्चित दिखाई दे रही है, वहीं दूसरी ओर एनडीए की संभावित सफलता का गणित उन अतिरिक्त वोटों पर टिकता नजर आ रहा है, जो पहले चरण के बाद जेएमएम के खाते में बच सकते हैं।
अब सबकी नजर नामांकन, अंतिम उम्मीदवारों की सूची और विधानसभा के उस चुनावी अंकगणित पर है, जो यह तय करेगा कि दूसरी सीट पर राजनीतिक बाजी किसके हाथ लगती है।










