किरीबुरू हिलटॉप ओड़िया स्कूल के स्वर्ण जयंती समारोह में भावुक कर देने वाला दृश्य
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
किरीबुरू हिलटॉप स्थित ओड़िया स्कूल के दो दिवसीय स्वर्ण जयंती समारोह में एक ऐसा पल आया, जिसने पूरे माहौल को भावनाओं के सैलाब में डुबो दिया। यह सिर्फ एक समारोह नहीं था—यह यादों, संघर्ष और सच्ची दोस्ती के पुनर्मिलन का जीवंत दस्तावेज बन गया।

जब सुरों में बसती थी दोस्ती
हारमोनियम और बहेलिया पर गूंजती थी पहचान
करीब 50 वर्ष पहले, जब किरीबुरू आज जैसा विकसित नहीं था, तब यह स्कूल भी अपने शुरुआती संघर्ष के दौर से गुजर रहा था। उन दिनों स्कूल के हर कार्यक्रम की जान हुआ करते थे दो दोस्त—
श्री शत्रुघन प्रधान और श्री रामचंद्र बिहारी।
एक हारमोनियम संभालते, तो दूसरा बहेलिया (वाद्य यंत्र)। चाहे स्कूल का सांस्कृतिक कार्यक्रम हो या आसपास का कोई आयोजन—इन दोनों की जोड़ी लोगों के दिलों पर राज करती थी।
उनकी दोस्ती सिर्फ मंच तक सीमित नहीं थी, बल्कि जीवन के हर संघर्ष में साथ निभाने वाली थी।
संघर्ष के दिनों की कहानी
घर-घर घूमकर जुटाया गया था स्कूल का अस्तित्व
आज जिस ओड़िया स्कूल पर सभी गर्व करते हैं, वह कभी संघर्षों की बुनियाद पर खड़ा हुआ था।
श्री शत्रुघन प्रधान उन लोगों में थे जिन्होंने—
* घर-घर जाकर चंदा इकट्ठा किया
* बच्चों को एक साथ बैठाकर पढ़ाया
* संसाधनों की कमी के बीच शिक्षा की लौ जलाए रखी
जब प्रधान सर वर्षों बाद उसी स्कूल की मिट्टी पर कदम रखे, तो हर याद चलचित्र की तरह आंखों के सामने घूम गई। उनकी आंखें नम हो गईं—क्योंकि यह सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा था।
संकोच, दूरी और फिर अचानक मिलन
बेटे की जुबान से पहले ही दोस्त को पहचान गए प्रधान सर
वर्तमान में सेल खदान में कार्यरत आदित्य बिहारी, जो पूर्व सेल कर्मी रामचंद्र बिहारी के पुत्र हैं, अपने पिता के पुराने मित्र प्रधान सर से मिलना चाहते थे।
लेकिन उनके मन में एक संकोच था—
“क्या सर को मेरे पिता याद होंगे?”
वर्षों की दूरी, बदलता समय और जीवन की व्यस्तता—इन सबने इस सवाल को और गहरा कर दिया।
लेकिन जैसे ही परिचय हुआ, प्रधान सर ने बिना किसी झिझक के खुद ही अपने पुराने दोस्त रामचंद्र बिहारी का नाम लिया।
वह पल जैसे समय को थाम लेने वाला था।
जब गले मिले दो युग
मंच पर बिखर गईं यादें, रो पड़ा हर देखने वाला
जैसे ही दोनों दोस्त आमने-सामने आए, न कोई शब्द था, न कोई औपचारिकता—
बस एक गहरा आलिंगन और आंखों से बहते आंसू।
* 40 साल की दूरी
* अनगिनत यादें
* अधूरी बातें
सब कुछ उस एक पल में समा गया।
मंच पर मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम थीं। यह सिर्फ दो दोस्तों का मिलन नहीं था, बल्कि उस दौर की वापसी थी, जहां रिश्ते सच्चे और गहरे हुआ करते थे।
“जवानी साथ गुजरी, अब वक्त की दहलीज पर खड़े हैं”
भावुक शब्दों ने छू लिया हर दिल
दोनों दोस्तों ने भावुक होकर कहा—
“जवानी में हम साथ थे, आज उम्र के उस मोड़ पर खड़े हैं जहां कल क्या होगा, कोई नहीं जानता। शायद अगर यह मंच नहीं मिलता, तो हम फिर कभी नहीं मिल पाते।”
उन्होंने आयोजन समिति का आभार जताया, जिन्होंने इस अनमोल मिलन को संभव बनाया।
आयोजन समिति का सफल प्रयास
एक मंच ने मिलाए बिछड़े रिश्ते
इस भावुक पल के पीछे आयोजन समिति का बड़ा योगदान रहा।
प्रमुख रूप से—
* राजेंद्र सिंधिया
* रमाकांत परीडा
* अरुण कुमार राउत राय
* राजेश कुमार बेहेरा
* अभिमन्यु सेठी
* बीरेंद्र खिलार
* संतोष कुमार पांडा
सहित अन्य सदस्यों ने इस ऐतिहासिक आयोजन को सफल बनाया।
समिति ने भी कहा—
“हमारा प्रयास सिर्फ कार्यक्रम करना नहीं था, बल्कि उन रिश्तों को फिर से जोड़ना था जो समय के साथ बिछड़ गए थे। आज वह प्रयास सफल हुआ।”














