भूख, प्यास, डर और खत्म होता नेटवर्क — सांगाजाटा के इनामी नक्सली इस्राइल पूर्ति की मौत ने खोली परतें
मुठभेड़ का सच: एक लाश, कई सवाल
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
टोंटो-गोइलकेरा थाना सीमा पर कोल्हान के घने जंगलों में 29 अप्रैल की सुबह हुई मुठभेड़ में एक लाख रुपए के इनामी नक्सली इस्राइल पूर्ति उर्फ अमृत का शव जब घटनास्थल पर पड़ा मिला, तो वह सिर्फ एक मौत की कहानी नहीं थी, बल्कि नक्सल संगठन के भीतर पनप रही टूटन और बिखराव का जीता-जागता सबूत बनकर सामने आया।
सांगाजाटा गांव निवासी इस्राइल पूर्ति, जो कभी सीटीआई कैडर का सक्रिय सदस्य था, अब एक ऐसे अंत तक पहुंचा जहां उसके पास न पर्याप्त हथियार थे, न भोजन, न सहयोग—और न ही बचने का कोई रास्ता।

वर्दी छोड़कर ‘ग्रामीण’ बनने की मजबूरी
सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि मारा गया नक्सली वर्दी में नहीं था। वह सामान्य ग्रामीणों की तरह साधारण कपड़ों में था।
यह बदलाव नक्सलियों की रणनीति में बड़ा संकेत देता है—
* अब वे पहचान छिपाने के लिए आम ग्रामीणों के बीच घुलने-मिलने की कोशिश कर रहे हैं
* दूर से पुलिस या सुरक्षा बलों की नजर से बचने की मजबूरी बढ़ गई है
लेकिन यही रणनीति अब उनके लिए उल्टा भी पड़ रही है, क्योंकि ग्रामीणों का भरोसा पहले जैसा नहीं रहा।
भूख-प्यास से जूझता ‘लाल आतंक’
घटनास्थल से मिले सामान और हालात एक बेहद गंभीर तस्वीर पेश करते हैं।
नक्सलियों के पास खाने-पीने का पर्याप्त इंतजाम नहीं था।
* पिट्ठू बैग में पानी का गैलन टंगा मिला
* खाने के सीमित और बचे-खुचे सामान
* लंबे समय से नियमित भोजन नहीं मिलने के संकेत
भीषण गर्मी में जंगलों के प्राकृतिक जल स्रोतों पर पुलिस की पैनी नजर ने नक्सलियों के लिए पानी तक जुटाना मुश्किल कर दिया है।
नतीजा:
नक्सली अब सिर्फ पुलिस से नहीं, बल्कि भूख और प्यास से भी लड़ रहे हैं।
कमजोर होता शरीर, टूटता मनोबल
लगातार भागते रहना, भोजन की कमी, और हर पल मौत का डर—इन सबने नक्सलियों की शारीरिक और मानसिक स्थिति को बुरी तरह प्रभावित किया है।
* शरीर कमजोर पड़ रहा है
* मानसिक दबाव चरम पर है
* हर आवाज, हर हलचल में खतरा महसूस हो रहा है
इस्राइल पूर्ति की हालत भी यही कहानी बयां कर रही थी—एक ऐसा लड़ाका जो अब लड़ने की स्थिति में नहीं था।
हथियार और गोला-बारूद की किल्लत
कभी अत्याधुनिक हथियारों से लैस रहने वाले नक्सली अब संसाधनों की भारी कमी से जूझ रहे हैं।
* सीमित हथियार
* कम होती गोलियां
* नए हथियारों की सप्लाई लगभग बंद
हर मुठभेड़ के बाद उनका शस्त्र भंडार घटता जा रहा है, जबकि सुरक्षा बल लगातार मजबूत हो रहे हैं।
लेवी बंद, ‘आर्थिक रीढ़’ टूटी
नक्सलियों की सबसे बड़ी ताकत—उनकी आर्थिक व्यवस्था—अब लगभग ध्वस्त हो चुकी है।
पहले:
* विकास योजनाओं से लेवी
* ठेकेदारों से वसूली
* बीड़ी पत्ता और अन्य जंगल उत्पादों से आय
अब:
* लेवी पूरी तरह बंद
* ठेकेदारों का डर खत्म
* प्रशासन की सख्ती से आय के रास्ते बंद
सीधा असर:
नक्सलियों के पास अब न भोजन खरीदने के पैसे हैं, न हथियार जुटाने की क्षमता।
IED: खुद के लिए ही बना खतरा
जंगलों में बिछाए गए प्रेशर IED, जो कभी सुरक्षा बलों के लिए खतरा थे, अब खुद नक्सलियों के लिए जानलेवा बनते जा रहे हैं।
* रास्तों की अनिश्चितता
* खुद के लगाए बमों की लोकेशन का भ्रम
* भागते समय खुद ही शिकार बनने का खतरा
यह स्थिति उनकी रणनीतिक विफलता को साफ दर्शाती है।
ग्रामीणों ने छोड़ा साथ
नक्सल आंदोलन की सबसे मजबूत कड़ी—ग्रामीण समर्थन—अब लगभग खत्म हो चुका है।
* गांवों में अब सहयोग नहीं मिल रहा
* लोग अपनी जान जोखिम में नहीं डालना चाहते
* पुलिस और प्रशासन के प्रति विश्वास बढ़ा है
पहले जहां ग्रामीण छिपने, खाने और जानकारी देने में मदद करते थे, अब वही लोग दूरी बना रहे हैं।
सिकुड़ता ‘रेड जोन’
हर मुठभेड़ के साथ नक्सलियों का प्रभाव क्षेत्र घटता जा रहा है।
* आधार क्षेत्र सीमित हो रहा है
* मैनपावर तेजी से घट रहा है
* बाहरी सहयोग खत्म हो रहा है
कोल्हान के जंगल, जो कभी उनका गढ़ थे, अब उनके लिए ‘फंसने का जाल’ बनते जा रहे हैं।
दो ही रास्ते: सरेंडर या मौत
मौजूदा हालात नक्सलियों के सामने एक कठोर सच्चाई रख रहे हैं—
पहला रास्ता:
सरेंडर कर मुख्यधारा में लौटना, नया जीवन शुरू करना
दूसरा रास्ता:
जंगलों में भटकते रहना और किसी मुठभेड़ में दर्दनाक मौत का इंतजार
इस्राइल पूर्ति की मौत इस दूसरे रास्ते का जीता-जागता उदाहरण बन गई है।
सुरक्षा बलों की रणनीति का असर
यह पूरा घटनाक्रम सुरक्षा बलों की बदलती रणनीति की सफलता भी दर्शाता है—
* जल स्रोतों पर निगरानी
* सप्लाई लाइन काटना
* लगातार सर्च ऑपरेशन
* स्थानीय नेटवर्क को तोड़ना
इन सबने मिलकर नक्सलियों को ‘चारों तरफ से घेर’ लिया है।
अंत की ओर बढ़ता नक्सलवाद
कोल्हान के जंगलों से उठती यह कहानी सिर्फ एक मुठभेड़ की नहीं, बल्कि एक पूरे आंदोलन के कमजोर पड़ने की कहानी है।
इस्राइल पूर्ति की मौत ने साफ कर दिया है कि अब नक्सलियों के पास न ताकत बची है, न संसाधन, न समर्थन—
सिर्फ बचा है डर, भूख और अनिश्चित भविष्य।
अगर हालात ऐसे ही रहे, तो वो दिन दूर नहीं जब कोल्हान के जंगलों से ‘लाल आतंक’ का नाम सिर्फ इतिहास के पन्नों में रह जाएगा।












