गुवा सेल में मुंडा-मानकी का बिगुल, पहाड़ पर डटे ग्रामीणों ने ठप किया उत्पादन, “अब आर-पार की लड़ाई”
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
Steel Authority of India Limited की गुवा लौह अयस्क खदान में सोमवार तड़के सुबह 4 बजे से शुरू हुआ अनिश्चितकालीन चक्का जाम आंदोलन अब बड़े जनआंदोलन का रूप लेता जा रहा है। मानकी सुरेश चांपिया और विभिन्न गांवों के मुंडाओं के नेतृत्व तथा पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के समर्थन में चल रहे इस आंदोलन ने सेल प्रबंधन की नींद उड़ा दी है। खदान क्षेत्र के ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दे दी है कि जब तक 500 स्थानीय बेरोजगारों को रोजगार देने पर लिखित समझौता नहीं होता, तब तक खदान का पहिया नहीं घूमेगा।
ग्रामीणों का आरोप है कि सेल प्रबंधन ने पिछली वार्ता में जो आश्वासन दिया था, उसे पूरी तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इसी “वादा खिलाफी” के खिलाफ अब ग्रामीणों ने आर्थिक नाकेबंदी का रास्ता चुना है। आंदोलनकारियों ने खदान के कई अहम हिस्सों को पूरी तरह जाम कर दिया है।

“पहाड़ हमारा, खनिज हमारा, रोजगार भी हमारा”
आंदोलन में शामिल काशिया पेचा गांव निवासी मंगता सुरीन ने कहा कि वर्षों से ग्रामीण अपनी जमीन, जंगल और जल खोते आ रहे हैं, लेकिन बदले में उन्हें सिर्फ प्रदूषण और बेरोजगारी मिली है। उन्होंने कहा कि अब ग्रामीण झूठे आश्वासन नहीं, सीधा रोजगार चाहते हैं।
ग्रामीणों ने गुवा खदान के क्रशिंग प्लांट, मेन गेट, लोडिंग प्वाइंट और रांजाबुरु क्षेत्र को पूरी तरह बंद कर दिया है। आंदोलनकारियों का कहना है कि यह सिर्फ आंदोलन नहीं बल्कि “अस्तित्व की लड़ाई” है।
“लाल पानी” से खेत बर्बाद, फिर भी चुप है प्रबंधन
ग्रामीणों ने कारो नदी में बह रहे कथित “लाल पानी” को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि खदान से निकलने वाला प्रदूषित पानी खेतों को बर्बाद कर रहा है। खेती प्रभावित हो रही है, जल स्रोत दूषित हो रहे हैं और पूरा इलाका पर्यावरणीय संकट झेल रहा है।
आंदोलनकारियों ने कहा कि जब कंपनी करोड़ों का मुनाफा कमा सकती है तो प्रभावित गांवों के लोगों को रोजगार देने में आखिर दिक्कत क्या है?

75% स्थानीय नियोजन नीति लागू करने की मांग
ग्रामीणों ने झारखंड सरकार की 75 प्रतिशत स्थानीय नियोजन नीति को सख्ती से लागू करने की मांग की है। उनका आरोप है कि बाहरी लोगों को नौकरी देकर स्थानीय युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।
मुंडा-मानकी ने साफ कहा कि यदि स्थानीय नीति लागू होती तो आज हजारों आदिवासी युवक बेरोजगार नहीं घूम रहे होते।

“हैंड माइनिंग के साथ रैक लोडिंग भी मैनुअल करो”
आंदोलनकारियों की एक बड़ी मांग रांजाबुरु खदान में हैंड माइनिंग के साथ-साथ रैक लोडिंग को भी मैनुअल करने की है। ग्रामीणों का कहना है कि मशीनों के कारण स्थानीय मजदूरों का रोजगार खत्म हो रहा है। यदि मैनुअल कार्य बढ़ेगा तो सैकड़ों ग्रामीणों को काम मिलेगा।
मधु कोड़ा की मौजूदगी में भी नहीं थी बनी बात
उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पहले खदान प्रभावित 18 गांवों के मुंडा, मानकी, मुखिया और ग्रामीण प्रतिनिधियों की बैठक पूर्व मुख्यमंत्री Madhu Koda की मौजूदगी में सेल अधिकारियों के साथ हुई थी। लेकिन वार्ता बेनतीजा रही।
सूत्रों के अनुसार आंदोलनकारी 500 से कम रोजगार पर मानने को तैयार नहीं थे, जबकि प्रबंधन सीमित नियुक्ति की बात कर रहा था। वार्ता विफल होने के बाद ही सुरेश चांपिया गुट ने 11 मई से खदान बंद आंदोलन की घोषणा कर दी थी।
दूसरी ओर मानकी लागुड़ा देवगम गुट ने दो दिन पहले आंदोलन शुरू किया था, लेकिन प्रशासन द्वारा 20 मई को वार्ता कराने के आश्वासन के बाद उन्होंने आंदोलन समाप्त कर दिया। अब सुरेश चांपिया गुट पूरी ताकत के साथ मोर्चा संभाले हुए है।

“पहाड़ी पर डटे हैं आंदोलनकारी, कोई अधिकारी बात करने नहीं आया”
मंगता सुरीन ने दावा किया कि मानकी, मुंडा फिलहाल खदान के अंदर ऊपरी पहाड़ी क्षेत्र में डटे हुए हैं। पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा भी आंदोलनकारियों का हौसला बढ़ाने और अपना समर्थन देने आंदोलन स्थल पर पहुंचे। उन्होंने कहा कि अब तक कोई वरिष्ठ अधिकारी उनसे वार्ता करने नहीं पहुंचा है। आंदोलन निरंतर जारी है।
उन्होंने तीखे शब्दों में कहा—
“अगर नीचे हमारे किसी आंदोलनकारी से बात हुई होगी तो हमें जानकारी नहीं। हम यहां पहाड़ पर बैठे हैं और कंपनी का कोई बड़ा अधिकारी बातचीत करने तक नहीं आया। इससे साफ है कि प्रबंधन ग्रामीणों को गंभीरता से नहीं ले रहा।”

प्रबंधन बोला — “अभी 25 लोगों को देंगे रोजगार”
वहीं सेल प्रबंधन के अधिकारी सूत्रों का कहना है कि फिलहाल 25 लोगों को रोजगार से जोड़ा जा सकता है। उनका कहना है कि जो गांव सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे, उन्हें विशेष प्राथमिकता के तहत कुछ अधिक लोगों को रोजगार दी जा सकती है। उत्पादन बढ़ने के साथ आगे और लोगों को रोजगार दिया जाएगा।
हालांकि आंदोलनकारी इस प्रस्ताव को “ऊंट के मुंह में जीरा” बता रहे हैं। उनका कहना है कि 25 नौकरी देकर हजारों प्रभावित लोगों का गुस्सा शांत नहीं किया जा सकता।
खदान बंदी से उत्पादन पर संकट
आंदोलन के कारण गुवा लौह अयस्क खदान में उत्पादन और परिवहन व्यवस्था प्रभावित होने लगी है। यदि आंदोलन लंबा खिंचता है तो इसका असर सेल के उत्पादन लक्ष्य पर भी पड़ सकता है। रेलवे रैक लोडिंग और खनिज आपूर्ति बाधित होने की आशंका बढ़ गई है।
अब सबकी नजर प्रशासन और सेल प्रबंधन पर टिकी है कि वे आंदोलनकारियों की मांगों पर क्या रुख अपनाते हैं। लेकिन फिलहाल पहाड़ पर बैठे ग्रामीणों का एक ही संदेश है—
“रोजगार दो, नहीं तो खदान बंद रहेगा।”












