मनोहरपुर में 53 करोड़ की योजना पर उठे भ्रष्टाचार के गंभीर सवाल, ग्रामीण आज भी बूंद-बूंद पानी को मोहताज
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
पश्चिम सिंहभूम जिले के मनोहरपुर प्रखंड में केन्द्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन योजना अब ग्रामीणों के लिए राहत नहीं बल्कि “सरकारी लूट और विभागीय भ्रष्टाचार” का प्रतीक बनती जा रही है। करोड़ों रुपये खर्च होने के दावों के बावजूद दर्जनों गांवों के हजारों ग्रामीण आज भी नदी-नाले का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं।
इसी गंभीर मामले को लेकर भारत आदिवासी पार्टी के अध्यक्ष सुशील बारला ने राज्यपाल के नाम प्रखंड विकास पदाधिकारी, मनोहरपुर को ज्ञापन सौंपकर उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। उन्होंने जल जीवन मिशन के नाम पर “व्यापक वित्तीय अनियमितता, सरकारी धन के दुरुपयोग और विभागीय मिलीभगत” का आरोप लगाया है।

53 करोड़ की योजना, लेकिन गांवों में पानी की एक बूंद नहीं
सुशील बारला ने अपने पत्र में कहा कि मनोहरपुर प्रखंड अंतर्गत लाईलोर पंचायत के 9 गांवों के 1196 परिवारों को पाइपलाइन के माध्यम से शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए लगभग 53 करोड़ 28 लाख 71 हजार 497 रुपये खर्च किए गए।
योजना के तहत विशाल जलमीनार और पाइपलाइन बिछाने का काम होना था ताकि हर घर तक नल से पानी पहुंचे। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि आज तक ग्रामीणों को पाइपलाइन से एक बूंद पानी भी नसीब नहीं हुआ।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी फाइलों में योजना को सफल दिखाकर करोड़ों रुपये की बंदरबांट कर ली गई, जबकि धरातल पर काम अधूरा पड़ा है।
कई टोले आज भी मुख्य पाइपलाइन से वंचित
ज्ञापन में बताया गया कि लाईलोर पंचायत के कई गांवों और टोलों में आज तक मुख्य पाइपलाइन तक नहीं बिछाई गई।
इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—
* मुण्डा टोला – 41 परिवार
* कुड़ितुका टोला – 23 परिवार
* बाबू टोला – 13 परिवार
* रायकापाट खुली टोला – 15 परिवार
* गिरजा टोला
* डोमलाई टुगरी टोला – 14 परिवार
इसके अलावा गिडुंग समेत कई गांवों में केवल मुख्य पाइपलाइन डालकर खानापूर्ति कर दी गई, लेकिन घर-घर नल कनेक्शन नहीं दिया गया।
विभाग का दावा और धरातल की सच्चाई में बड़ा अंतर
पेयजल एवं स्वच्छता प्रमंडल, चक्रधरपुर ने अपने पत्रांक 1203 दिनांक 21 नवंबर 2025 में दावा किया था कि पंचायत के 9 गांवों के 1196 परिवारों को पाइपलाइन के माध्यम से शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया जा रहा है।
लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि यह दावा सिर्फ “कागजी खेल” है।
ग्रामीणों के अनुसार लाईलोर में स्थापित 12 लाख लीटर क्षमता वाले जलमीनार से रायकापाट, गिन्डुग, डोमलाई, पंचपहिया, रबंगदा समेत अन्य गांवों तक आज तक नियमित जलापूर्ति शुरू नहीं हो सकी है।
करोड़ों खर्च, लेकिन सिर्फ खड़ी कर दी गई जलमीनार
सुशील बारला ने आरोप लगाया कि यही स्थिति डिम्बुली पंचायत के हाकागुई गांव और रायडीह पंचायत के जोजोगुटू क्षेत्र की भी है।
हाकागुई में 8 गांवों तक पानी पहुंचाने के लिए जलमीनार बनाई गई, लेकिन पाइपलाइन कार्य अधूरा है। वहीं जोजोगुटू योजना में भी पांच गांवों तक पानी पहुंचाने का दावा किया गया, मगर स्थिति बदहाल है।
ग्रामीणों का कहना है कि विभाग और संवेदकों ने सिर्फ सीमेंट-कंक्रीट की संरचनाएं खड़ी कर सरकारी राशि की निकासी कर ली, जबकि पानी सप्लाई की मूल व्यवस्था आज तक पूरी नहीं हुई।
“नदी-नाला का पानी पीने को मजबूर ग्रामीण”
गर्मी के इस मौसम में स्थिति और भयावह हो गई है। कई गांवों के लोग आज भी नदी, नाला और चुआं का पानी पीने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि सरकार ने “हर घर नल, हर घर जल” का सपना दिखाया, लेकिन धरातल पर भ्रष्टाचार ने उस सपने को निगल लिया।
महिलाओं को कई किलोमीटर दूर से पानी ढोना पड़ रहा है। बच्चों और बुजुर्गों में जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है।
“यह सिर्फ लापरवाही नहीं, राजकोषीय अपराध है”
भारत आदिवासी पार्टी के अध्यक्ष सुशील barla ने कहा कि यह मामला केवल विभागीय लापरवाही का नहीं बल्कि सीधे-सीधे “राजकोषीय अपराध” का है।
उन्होंने आरोप लगाया कि करोड़ों रुपये खर्च दिखाकर सरकारी खजाने को चूना लगाया गया है। संवेदकों, विभागीय अधिकारियों और योजना की निगरानी करने वाले जिम्मेदार लोगों की मिलीभगत के बिना इतना बड़ा खेल संभव नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि ग्रामीणों के स्वास्थ्य और बुनियादी अधिकारों के साथ खिलवाड़ किया गया है, जिसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
SIT, विजिलेंस और ACB जांच की मांग
सुशील बारला ने राज्यपाल से मांग की है कि—
* जल जीवन मिशन की सभी योजनाओं की SIT, Vigilance और ACB से जांच कराई जाए।
* दोषी संवेदकों और अधिकारियों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज हो।
* योजना की वित्तीय और तकनीकी ऑडिट कराई जाए।
* सरकारी राशि के दुरुपयोग की जांच कर जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई हो।
* जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
“जल जीवन मिशन या भ्रष्टाचार मिशन?”
मनोहरपुर क्षेत्र में जल जीवन मिशन की हालत अब गंभीर सवाल खड़े कर रही है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि ग्रामीणों को पानी नहीं मिल रहा, तो आखिर पैसा गया कहां?
क्या सरकारी फाइलों में ही पानी बहा दिया गया?
क्या विभाग और संवेदकों ने मिलकर योजनाओं को भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया?
क्या ग्रामीणों की प्यास पर कमीशनखोरी भारी पड़ गई?
इन सवालों का जवाब अब जांच एजेंसियों को देना होगा। क्योंकि जल जीवन मिशन का उद्देश्य लोगों तक पानी पहुंचाना था, लेकिन मनोहरपुर में यह योजना भ्रष्टाचार, अधूरे निर्माण और सरकारी उदासीनता की जीती-जागती मिसाल बनती नजर आ रही है।













