नोवामुंडी की बैठक बेनतीजा, प्रबंधन 10% शुल्क पर अड़ा, ग्रामीण बोले— “हमें पहले जैसा पूरा मुफ्त इलाज चाहिए”
रिपोर्ट शैलेश सिंह
टाटा स्टील और उसकी विभिन्न खदानों से प्रभावित ग्रामीण प्रतिनिधियों तथा कंपनी के सीएसआर विभाग के अधिकारियों के बीच निःशुल्क स्वास्थ्य सुविधा को लेकर 25 जून को नोवामुंडी में हुई विशेष बैठक तीखी बहस और टकराव के बीच बेनतीजा रही। बैठक में दर्जनों प्रभावित गांवों के प्रतिनिधियों ने अपनी बात जोरदार ढंग से रखते हुए स्पष्ट कहा कि स्वास्थ्य के सवाल पर अब किसी तरह का समझौता स्वीकार नहीं होगा।
बैठक के दौरान ग्रामीणों ने कंपनी प्रबंधन पर सीधा सवाल दागा कि जब खदानों से निकलने वाले लौह अयस्क से अरबों का कारोबार हो रहा है, तो प्रभावित गांवों के बीमार लोगों से इलाज के नाम पर पैसा क्यों वसूला जा रहा है? ग्रामीणों ने कहा कि पहले टाटा स्टील अस्पतालों में प्रभावित गांवों के लोगों का इलाज पूरी तरह निःशुल्क होता था, लेकिन बाद में प्रबंधन ने नियम बदलते हुए इलाज की 50 फीसदी राशि लेना शुरू कर दिया।
ग्रामीणों ने इसे अन्यायपूर्ण बताते हुए कहा कि खदानों की वजह से सबसे ज्यादा नुकसान गांवों को झेलना पड़ता है। धूल, धुआं, जल प्रदूषण और पर्यावरणीय असंतुलन के कारण लोग लगातार बीमार पड़ रहे हैं। ऐसे में इलाज के लिए पैसे वसूलना जख्म पर नमक छिड़कने जैसा है।

“प्रदूषण आपकी, बीमारी हमारी, तो जिम्मेदारी भी आपकी”
इसी तेवर के साथ ग्रामीणों ने कहा कि वे खदान संचालन के विरोधी नहीं हैं, लेकिन उससे पैदा होने वाली समस्याओं का समाधान कंपनी को ही करना होगा। ग्रामीणों ने पुरानी व्यवस्था बहाल करते हुए पूर्णतः निःशुल्क इलाज की मांग दोहराई।
बैठक में कंपनी के सीएसआर अधिकारियों ने 50 फीसदी शुल्क घटाकर 10 फीसदी राशि लेने का प्रस्ताव रखा, लेकिन ग्रामीणों ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। उनका कहना था कि यह कोई राहत नहीं, बल्कि अधिकारों से समझौता है।
ग्रामीणों का साफ संदेश— “सेहत पर सौदेबाजी मंजूर नहीं”
ग्रामीण प्रतिनिधियों ने स्पष्ट कर दिया कि जब तक पहले जैसी निःशुल्क चिकित्सा सुविधा बहाल नहीं होती, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि प्रबंधन ने उनकी मांगों को गंभीरता से नहीं लिया, तो आगे आंदोलन और तेज होगा।
इस वार्ता में टाटा स्टील की विजय-2 खदान से प्रभावित टाटिबा गांव के मुंडा हाजा हेम्ब्रम, मोटाए हेम्ब्रम, दामोदर बारी, सृजोन के शंकर चातोंबा, बराईबुरु निवासी लेंगा पूर्ति समेत कई गांवों के दर्जनों प्रतिनिधि मौजूद थे।
यह बैठक भले खत्म हो गई हो, लेकिन खदान प्रभावित ग्रामीणों की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। अब देखना होगा कि टाटा स्टील सामाजिक जिम्मेदारी निभाती है या फिर मुनाफे की दीवार के पीछे ग्रामीणों की सेहत को अनदेखा करती है।













