नई पुलिया का फाउंडेशन बहा, सड़क उखड़ी, दर्जनों गांवों का संपर्क टूटने का खतरा; ग्रामीण बोले– अधिकारी और संवेदक की मिलीभगत ने विकास को बना दिया मजाक।”
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
सारंडा के दर्जनों गांवों की जीवनरेखा मानी जाने वाली लगभग 10 किलोमीटर लंबी सैडल से कुमडीह सड़क आज भ्रष्टाचार की ऐसी कहानी बयां कर रही है, जिसे देखकर विकास कार्यों पर सवाल खड़े होना लाजिमी है। करीब 11 करोड़ रुपये की लागत से बनी यह सड़क और पुलिया डेढ़ वर्ष भी ठीक से नहीं टिक सकी। पहली ही बारिश में सड़क की परत उखड़ गई, जगह-जगह गड्ढे बन गए और अब कुमडीह गांव से लगभग 300 मीटर पहले बनी नई पुलिया का आधार ही पानी में बह चुका है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि तेज बारिश हुई तो पुलिया किसी भी समय धराशायी हो सकती है।

11 करोड़ खर्च, लेकिन गुणवत्ता शून्य
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (आरसीपीएल फंड) के तहत आरडब्ल्यूडी विभाग, चक्रधरपुर प्रमंडल द्वारा लगभग 11 करोड़ रुपये की लागत से इस सड़क और पुलिया का निर्माण कराया गया। निर्माण कार्य जमशेदपुर के ठेकेदार आलोक सिंह द्वारा कराया गया। विभागीय अधिकारियों की देखरेख में यह कार्य पूरा हुआ, लेकिन निर्माण की गुणवत्ता ऐसी रही कि डेढ़ साल के भीतर ही पूरी सड़क सवालों के घेरे में आ गई।
इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद सड़क की हालत देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि विकास के नाम पर सरकारी धन का खुला खेल खेला गया। ग्रामीणों का आरोप है कि विभागीय अधिकारियों और ठेकेदार की मिलीभगत के कारण प्राक्कलन की खुली अनदेखी की गई।

पहली बारिश ने खोल दी पोल
ग्रामीण बताते हैं कि सड़क निर्माण पूरा होने के तुरंत बाद पहली ही बारिश में सड़क की परत उखड़ने लगी। डामर का लेयर इतना पतला था कि जगह-जगह गिट्टियां बाहर निकल आईं। कई स्थानों पर बड़े-बड़े गड्ढे बन गए।
लोगों का कहना है कि निर्माण के समय ही यह साफ दिख रहा था कि सड़क निर्धारित मानकों के अनुसार नहीं बनाई जा रही है। उन्होंने इसका विरोध भी किया, लेकिन किसी अधिकारी ने उनकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया।
आज स्थिति यह है कि करोड़ों रुपये की लागत से बनी सड़क नई कम और कई वर्षों पुरानी जर्जर सड़क अधिक दिखाई देती है।

नई पुलिया बनी मौत का जाल
सड़क से भी अधिक गंभीर स्थिति पुलिया की है।
कुमडीह गांव से लगभग 300 मीटर पहले बनी नई पुलिया का फाउंडेशन ग्रामीणों के अनुसार पर्याप्त गहराई तक नहीं बनाया गया। पुलिया के नीचे सुरक्षा के लिए की गई कंक्रीट ढलाई भी मानक के अनुरूप नहीं हुई। परिणामस्वरूप पहली ही बारिश के तेज बहाव में नीचे की पूरी ढलाई बह गई।
अब पुलिया का आधार पूरी तरह कमजोर हो चुका है। ग्रामीणों को डर है कि यदि लगातार बारिश हुई तो पूरी पुलिया फाउंडेशन समेत बह सकती है।
यदि ऐसा हुआ तो यह केवल एक पुलिया का टूटना नहीं होगा बल्कि दर्जनों गांवों का जिला मुख्यालय से संपर्क पूरी तरह कट जाएगा।

दर्जनों गांवों की सांस है यह सड़क
यह सड़क केवल एक सड़क नहीं बल्कि सारंडा के दर्जनों गांवों की जीवनरेखा है।
इसी मार्ग से किसान अपनी उपज और वनोपज बाजार तक पहुंचाते हैं। बीमार मरीजों को अस्पताल ले जाया जाता है। बच्चे पढ़ाई के लिए बाहर जाते हैं। ग्रामीण प्रखंड और जिला मुख्यालय तक पहुंचते हैं।
यदि सड़क टूट गई या पुलिया बह गई तो पूरे क्षेत्र का संपर्क बाधित हो जाएगा। बरसात के दिनों में लोगों को कई किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ेगी। आपातकालीन स्थिति में मरीजों की जान पर भी बन सकती है।

ग्रामीणों की चेतावनी को किया गया नजरअंदाज
ग्रामीणों का कहना है कि निर्माण कार्य के दौरान उन्होंने कई बार ठेकेदार को सड़क की गुणवत्ता को लेकर चेताया था।
उनका आरोप है कि सड़क पर बहुत पतली डामर की परत डाली जा रही थी। पुलिया की नींव भी अपेक्षित गहराई तक नहीं बनाई जा रही थी।
लेकिन उनकी बात सुनने के बजाय ठेकेदार ने काम जारी रखा। विभाग के अधिकारी भी कभी मौके पर जांच करने नहीं पहुंचे।
आज वही आशंकाएं सच साबित होती दिखाई दे रही हैं।
अधिकारी रहे गायब, ठेकेदार करता रहा मनमानी
ग्रामीणों का आरोप बेहद गंभीर है।
उनका कहना है कि सड़क और पुलिया निर्माण के दौरान विभाग के कोई भी अभियंता नियमित निरीक्षण के लिए स्थल पर नहीं आते थे।
जब निगरानी करने वाले अधिकारी ही मौके पर नहीं पहुंचे तो ठेकेदार को मनमानी करने का खुला अवसर मिल गया।
यदि समय पर गुणवत्ता जांच होती तो शायद आज सड़क और पुलिया की यह स्थिति नहीं होती।

सूचना बोर्ड भी गायब, आखिर क्यों?
निर्माण कार्य से संबंधित सूचना बोर्ड पहले कुमडीह गांव के समीप लगाया गया था।
लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि बाद में ठेकेदार ने जेसीबी मशीन से उसे उखाड़कर नाले में फेंक दिया।
इस घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ था तो सूचना बोर्ड हटाने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या निर्माण से जुड़ी जानकारी छिपाने की कोशिश की गई?
ग्रामीणों की मांग है कि इसकी भी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
केवल छोटी गाड़ियां चलती हैं, फिर भी सड़क टूटी
ग्रामीण बताते हैं कि इस सड़क पर भारी वाहनों का परिचालन लगभग नहीं होता।
मुख्य रूप से छोटी चारपहिया गाड़ियां, बाइक और वन विभाग के वाहन ही इस सड़क से गुजरते हैं।
जब भारी वाहनों का दबाव ही नहीं है, तब डेढ़ वर्ष के भीतर सड़क की ऐसी दुर्दशा केवल खराब निर्माण गुणवत्ता की ओर इशारा करती है।

सरकारी धन की खुली बर्बादी
11 करोड़ रुपये की लागत से बनी सड़क यदि डेढ़ वर्ष में टूटने लगे तो यह केवल निर्माण में लापरवाही नहीं बल्कि सरकारी धन की बर्बादी का मामला भी है।
ग्रामीणों का कहना है कि जनता के टैक्स का पैसा विकास के नाम पर खर्च दिखाया गया लेकिन धरातल पर गुणवत्तापूर्ण काम नहीं हुआ।
यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो भविष्य में भी इसी प्रकार सरकारी योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती रहेंगी।
जांच हुई तो खुल सकते हैं बड़े राज
निर्माण कार्य की यदि किसी स्वतंत्र तकनीकी एजेंसी से जांच कराई जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि—
* सड़क में मानक से कम डामर का उपयोग हुआ।
* पुलिया का फाउंडेशन कमजोर बनाया गया।
* कंक्रीट की ढलाई प्राक्कलन के अनुरूप नहीं हुई।
* गुणवत्ता परीक्षण नहीं कराया गया।
* विभागीय निरीक्षण लगभग नहीं हुआ।
यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है तो करोड़ों रुपये के घोटाले का मामला सामने आ सकता है।
सबसे बड़ा सवाल—भुगतान कैसे हो गया?
* जब निर्माण कार्य मानकों के अनुरूप नहीं था तो फिर माप पुस्तिका किस आधार पर तैयार हुई?
* भुगतान से पहले गुणवत्ता परीक्षण किसने किया?
* कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र किसने जारी किया?
* यदि निर्माण में इतनी गंभीर खामियां थीं तो पूरा भुगतान आखिर किस आधार पर कर दिया गया?
इन सवालों का जवाब विभागीय अधिकारियों को देना होगा।

ग्रामीणों की मांग—कड़ी कार्रवाई हो
ग्रामीणों ने सरकार से मांग की है कि इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।
उनका कहना है कि—
* निर्माण कार्य की तकनीकी जांच हो।
* भुगतान की प्रक्रिया की जांच हो।
* दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
* संबंधित कार्यपालक अभियंता पर विभागीय एवं दंडात्मक कार्रवाई हो।
* माप पुस्तिका तैयार करने वाले सहायक अभियंता और कनीय अभियंता की भूमिका की जांच कर आवश्यक कार्रवाई की जाए।
* संबंधित संवेदक को ब्लैकलिस्ट किया जाए तथा यदि जांच में वित्तीय अनियमितता सिद्ध हो तो कानून के अनुसार राशि की वसूली और आपराधिक कार्रवाई की जाए।
अब सरकार की परीक्षा
सारंडा की यह सड़क आज केवल एक निर्माण कार्य नहीं बल्कि सरकारी व्यवस्था की विश्वसनीयता की परीक्षा बन गई है।
यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी सड़क पहली बारिश नहीं झेल पाती और पुलिया बहने की कगार पर पहुंच जाती है, तो यह पूरे सिस्टम पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।
अब देखना यह होगा कि सरकार और विभाग इस मामले में लीपापोती करते हैं या फिर जिम्मेदार अधिकारियों और संवेदक के खिलाफ कठोर कार्रवाई कर जनता का विश्वास कायम रखते हैं।
क्योंकि यदि समय रहते इस पुलिया की मरम्मत और सड़क की गुणवत्ता सुधारने का काम नहीं हुआ, तो अगली तेज बारिश के साथ सिर्फ पुलिया ही नहीं बहेगी, बल्कि विकास के उन तमाम दावों की भी पोल खुल जाएगी, जिनके सहारे करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं।














