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“टेंडर का तिलिस्म या 2000 करोड़ का खेल? ग्रामीण कार्य विभाग में ‘मैनेजमेंट’ के नाम पर महाघोटाले का आरोप”

On: April 22, 2026 6:34 PM
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मुख्य अभियंता अवधेश कुमार पर गंभीर सवाल—नियम दरकिनार, चहेतों को ठेका, और सिस्टम को बना दिया ‘सेटिंग मशीन’?

रिपोर्ट: शैलेश सिंह

झारखंड में टेंडर नहीं, ‘टेंडर मैनेजमेंट’ का खेल!

झारखंड के ग्रामीण कार्य विभाग से जो परतें खुल रही हैं, वो सिर्फ अनियमितता नहीं बल्कि एक संगठित “टेंडर तंत्र” की कहानी बयान कर रही हैं—जहां नियम किताबों में हैं और ज़मीन पर “सेटिंग-गेटिंग” का राज चलता है।
इस पूरे मामले के केंद्र में हैं—अवधेश कुमार, जो मुख्य अभियंता के पद पर रहते हुए विभागीय निविदाओं के निष्पादन में कथित रूप से ऐसी महारत हासिल कर चुके हैं कि “कौन पास होगा और कौन फेल”—यह पहले से तय होता है।

टेक्निकल में खेल, फाइनेंसियल में फिक्स!

सूत्रों का दावा है कि निविदा प्रक्रिया में सबसे बड़ा खेल “टेक्निकल सिलेक्शन” में होता है।
* योग्य संवेदकों को “नॉन-रिस्पॉन्सिव” घोषित कर बाहर कर दिया जाता है
* जबकि चहेते संवेदकों को “रिस्पॉन्सिव” बनाकर आगे बढ़ाया जाता है
* अंततः सिर्फ 1-2 ठेकेदारों का फाइनेंसियल बीड खोला जाता है
यानी टेंडर से पहले ही विजेता तय—बाकी सब औपचारिकता!

RTI से दूरी, कोर्ट तक पहुंचेगा मामला

अवधेश कुमार पर आरोप सिर्फ टेंडर मैनेजमेंट तक सीमित नहीं हैं।
* सूचना के अधिकार (RTI) में मांगी गई जानकारी नहीं दी जाती
* मामले को लेकर उच्च न्यायालय में याचिका भी दायर करने की तैयारी है
सवाल उठता है—अगर सब कुछ नियम से है, तो जानकारी देने में डर कैसा?

पद, प्रभाव और ‘पैरवी’ का खेल

अवधेश कुमार का सेवा इतिहास खुद कई सवाल खड़े करता है—
* कार्यपालक अभियंता से मुख्य अभियंता तक लंबा कार्यकाल
* कई बार एक साथ 3-3 पदों का प्रभार
* नियमों के विपरीत प्रोन्नति के बावजूद पद पर बने रहना
सूत्रों का दावा है कि विभागीय स्तर पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत है कि नियम भी उनके सामने कमजोर पड़ जाते हैं।

चहेतों को ठेका, योग्य बाहर—सरायकेला से पूरे राज्य तक खेल

सूत्रों के मुताबिक, पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन के कार्यकाल में सरायकेला प्रमंडल में ऐसे संवेदकों को काम दे दिया गया, जिन्होंने निविदा की शर्तें तक पूरी नहीं की थीं।
दूसरी ओर—
* अनुभवी और योग्य संवेदकों को टेक्निकल में बाहर कर दिया गया
* नए और अनुभवहीन ठेकेदारों को काम सौंप दिया गया
यह सिर्फ अनियमितता नहीं, बल्कि योग्य ठेकेदारों के अधिकारों का सीधा हनन है।

‘प्रावैधिकी सचिव’ को दरकिनार—क्यों?

विभाग ने मुख्य अभियंता कार्यालय में प्रावैधिकी सचिव का पद सृजित किया और उस पर सुनील चंद्र नाथ की नियुक्ति भी की।
लेकिन हैरानी की बात—
* किसी भी टेंडर फाइल में उनका मंतव्य नहीं लिया गया
यानी जिस पद को निगरानी के लिए बनाया गया, उसे ही सिस्टम से बाहर कर दिया गया!
यह सीधे-सीधे संकेत देता है कि अंदरखाने कुछ ऐसा चल रहा था जिसे औपचारिक निगरानी से दूर रखना जरूरी समझा गया।

CM ग्राम सेतु योजना में ‘बंदरबांट’ का आरोप

सूत्रों के अनुसार, पूर्व मंत्री आलमगीर आलम और इरफ़ान अंसारी के कार्यकाल में स्वीकृत मुख्यमंत्री ग्राम सेतु योजना के तहत पुल निर्माण में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई।
* संवेदकों के चयन में नियमों की अनदेखी
* ठेके देने में पक्षपात
* भारी कमीशन वसूली के आरोप
कुल मिलाकर 1400 करोड़ की योजनाओं में ‘बंदरबांट’ की चर्चा!

DMFT फंड में भी ‘हाथ साफ’?

सबसे चौंकाने वाला आरोप DMFT (District Mineral Foundation Trust) फंड को लेकर है।
सूत्रों का दावा—
* दूसरे विभागों की एजेंसियों की निविदा भी ग्रामीण कार्य विभाग ने निष्पादित की
* बिना किसी अधिकृत आदेश के टेंडर प्रक्रिया चलाई गई
* धनबाद, पाकुड़, चतरा, रामगढ़, रांची सहित कई जिलों में गड़बड़ी
अनुमान—500 करोड़ से ज्यादा DMFT फंड में खेल!
यह पूरी तरह नियमों के खिलाफ बताया जा रहा है, क्योंकि संबंधित विभागों के पास खुद सक्षम इंजीनियर और व्यवस्था मौजूद है।

2000 करोड़ का ‘टेंडर बम’?

सूत्रों की मानें तो—
* CM ग्राम सेतु योजना + DMFT फंड
* राज्य और जिला स्तर की परियोजनाएं
कुल मिलाकर 2000 करोड़ रुपये तक के टेंडर घोटाले की आशंका!
अगर यह सच साबित हुआ, तो यह झारखंड के सबसे बड़े इंजीनियरिंग घोटालों में से एक होगा।

‘गवाह’ और ‘शिकायत’ से खुल सकता है राज

इस पूरे मामले में दो अहम बातें सामने आ रही हैं—
* सुनील चंद्र नाथ को गवाह बनाया जाए
* वंचित संवेदकों को खुलकर शिकायत करने का मौका दिया जाए
अगर ऐसा हुआ, तो यह घोटाला सिर्फ विभाग तक सीमित नहीं रहेगा—
बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों तक हड़कंप मचा सकता है।

हाईकोर्ट की दहलीज पर दस्तक

सूत्रों के अनुसार, गणेश प्रसाद, अध्यक्ष—झारखंड राज्य भ्रष्टाचार उन्मूलन समिति—इस मामले में उच्च न्यायालय में जनहित याचिका (PIL) दायर करने की तैयारी में हैं।
यानी अब मामला सड़क से कोर्ट तक पहुंचने वाला है।

हेमंत सरकार पर सीधा असर

इस पूरे विवाद का राजनीतिक असर भी साफ दिख रहा है।
हेमंत सोरेन सरकार पहले ही विभिन्न मुद्दों पर विपक्ष के निशाने पर है। ऐसे में—
* विभागीय भ्रष्टाचार के आरोप
* बड़े पैमाने पर टेंडर घोटाले की चर्चा
सरकार की साख पर सीधा असर डाल रही है।

ट्रेज़री घोटाले के बाद अब टेंडर पर नजर

हाल ही में ट्रेज़री से अवैध निकासी का मामला सामने आया, जिसके बाद सरकार ने सभी कोषागारों की जांच शुरू की।
अब सवाल उठ रहा है—
क्या उसी सख्ती से टेंडर सिस्टम की भी जांच होगी?

मांग: केंद्रीय एजेंसी से जांच हो

इतने बड़े आरोपों के बाद अब मांग उठ रही है कि—
* पूरे मामले की जांच किसी केंद्रीय एजेंसी को सौंपी जाए
* टेंडर प्रक्रिया की फॉरेंसिक ऑडिट हो
* दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो
क्योंकि अगर यह मामला दबा, तो यह सिर्फ एक घोटाला नहीं रहेगा—
यह सिस्टम के पतन का प्रमाण बन जाएगा।

इंजीनियर या ‘टेंडर आर्किटेक्ट’?

अवधेश कुमार पर लगे आरोप साबित होते हैं या नहीं, यह जांच का विषय है।
लेकिन जो सवाल उठे हैं, वे बेहद गंभीर हैं।
क्या सरकारी इंजीनियर अब विकास के नहीं, “टेंडर मैनेजमेंट” के आर्किटेक्ट बन गए हैं?
अगर जवाब “हाँ” है, तो खतरा सिर्फ पैसों का नहीं—
पूरे सिस्टम के ढहने का है।

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सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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