डीएमएफटी के 2.95 करोड़ की योजना में एप्रोच सड़क धंसी, ग्रामीणों का आरोप— “यह पुल नहीं, कमीशनखोरी की नींव है”; कार्यपालक अभियंता विशाल खलको पर उठे सबसे बड़े सवाल
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
पश्चिम सिंहभूम के नोवामुंडी प्रखंड अंतर्गत कोटगढ़ पंचायत के कुमिरता राजाबांध नाला पर बन रही करोड़ों की पुलिया योजना अब भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण की बड़ी मिसाल बनकर सामने आई है। डीएमएफटी फंड से बन रही करीब 2 करोड़ 95 लाख 46 हजार 322 रुपये की लागत वाली इस योजना का एप्रोच सड़क पहली ही हल्की बारिश में धंस गया।
यह वही योजना है जिसे क्षेत्रीय जरूरत और जनहित को देखते हुए जगन्नाथपुर विधायक Sonaram Sinku के प्रयास से मंजूरी मिली थी। लेकिन अब यही योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती नजर आ रही है।

जनता के सपनों पर ‘घटिया निर्माण’ का बुलडोजर
कुमिरता राजाबांध नाला पर 2×15.10 मीटर और 3×15.11 मीटर के दो पुल निर्माण का काम चल रहा था। कार्य पूर्ण होने की समयसीमा 23 सितंबर 2025 तय थी। लेकिन एक साल बीतने के बाद भी काम अधूरा पड़ा रहा।
बाद में प्राक्कलन बढ़ाकर ग्रामीण कार्य विभाग, चाईबासा ने यह कार्य कृष्ण देव कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड को आवंटित किया। आरोप है कि कंपनी ने यह काम खुद नहीं किया बल्कि चाईबासा के सचिन कुमार साव को पेटी कॉन्ट्रैक्ट में सौंप दिया।
यहीं से शुरू हुआ गुणवत्ता से खिलवाड़।
गांव वालों ने पहले ही दी थी चेतावनी
ग्रामीणों का कहना है कि निर्माण शुरू होने के साथ ही घटिया सामग्री, कमजोर भराई और तकनीकी मानकों की अनदेखी की शिकायत बार-बार की गई थी। लेकिन विभागीय अधिकारियों ने शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया।
नतीजा सामने है— काम पूरा होने से पहले ही एप्रोच सड़क धराशायी हो गई।
ग्रामीणों का कहना है—
“अगर अभी यह हालत है तो पूरा पुल चालू होने के बाद क्या होगा? क्या किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार किया जा रहा था?”

विशाल खलको पर सबसे बड़े आरोप
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा सवाल ग्रामीण कार्य प्रमंडल चक्रधरपुर के कार्यपालक अभियंता सह चाईबासा के प्रभारी कार्यपालक अभियंता Vishal Khalko पर उठ रहे हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि पूरा निर्माण कार्य उनकी निगरानी में हुआ और वही इस कथित भ्रष्टाचार के मुख्य केंद्र हैं।
ग्रामीणों और पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर एप्रोच सड़क नहीं टूटती तो पूरी राशि का भुगतान कर दिया जाता और भ्रष्टाचार दबा रह जाता।
यानी सड़क का धंसना भ्रष्टाचार की परतें खोल गया।
टूटने के बाद शुरू हुई ‘बचाव जांच’
सूत्रों के अनुसार जैसे ही सड़क धंसी, विशाल खलको खुद कनीय अभियंता अशोक चौधरी के साथ मौके पर पहुंचे। लेकिन लोगों का आरोप है कि यह जांच नहीं बल्कि “सबूत मिटाने की कवायद” थी।
जेसीबी मंगाकर धंसे हिस्से को हटवाया गया और फिर से निर्माण शुरू करवाया गया।
स्थानीय लोगों का कहना है—
“अगर जांच ईमानदार होती तो पहले नमूने लिए जाते, गुणवत्ता रिपोर्ट बनती और दोषियों पर कार्रवाई होती। लेकिन यहां पहले मिटाओ, फिर बनाओ का खेल शुरू हो गया।”
बिना कनीय अभियंता की मौजूदगी, अधिकारियों के इशारे पर चलता है खेल?
यह मामला सिर्फ एक पुलिया तक सीमित नहीं है। क्षेत्र में लगातार यह आरोप उठते रहे हैं कि बड़ी-बड़ी योजनाओं में कार्यस्थल पर कनीय अभियंताओं की नियमित मौजूदगी नहीं रहती।
काम का पूरा नियंत्रण संवेदक और बड़े अधिकारियों के बीच सेटिंग से चलता है।
जमीनी निगरानी कमजोर है और इसी का फायदा उठाकर निर्माण गुणवत्ता से समझौता किया जाता है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि जब तक ऊपर से संरक्षण रहेगा, नीचे भ्रष्टाचार का खेल यूं ही चलता रहेगा।
विधायक की योजना पर ही डाका?
यह योजना विधायक सोनाराम सिंकु की पहल पर लाई गई थी ताकि ग्रामीणों को बरसात में आवागमन की सुविधा मिल सके। लेकिन अब लोग कह रहे हैं कि विधायक की जनहितकारी सोच को भी भ्रष्ट सिस्टम ने निगल लिया।
नोवामुंडी प्रखंड अध्यक्ष मंजित प्रधान ने विधायक को मामले की जानकारी देते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है।
उन्होंने कहा—
“अगर दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो यह जनता के साथ खुला विश्वासघात होगा।”
डीसी का आदेश और जमीन पर लापरवाही
जिले के उपायुक्त Manish Kumar ने पहले ही सभी कार्यपालक अभियंताओं को स्पष्ट निर्देश दिया है कि डीएमएफटी फंड से चल रही योजनाओं की स्थल पर जाकर जांच करें और ढलाई व सड़क निर्माण की गुणवत्ता सुनिश्चित करें।
लेकिन सवाल यह है कि जब डीसी के आदेश थे, तो फिर यह घटिया निर्माण कैसे हुआ?
क्या अधिकारियों ने निर्देशों को नजरअंदाज किया?
या फिर सब कुछ संवेदक की मिलीभगत से हुआ?
चक्रधरपुर-चाईबासा प्रमंडल की पुरानी फाइलें खुलीं तो बड़ा खेल सामने आ सकता है
सूत्रों का दावा है कि विशाल खलको के कार्यकाल में चक्रधरपुर और चाईबासा प्रमंडल में हुए तमाम निर्माण कार्यों में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं। बिना जांच के संवेदकों को प्रायः पैसा विमुक्त किया गया।
अगर इन सभी योजनाओं और विमुक्त राशि की निष्पक्ष जांच हो जाए तो करोड़ों के भ्रष्टाचार का बड़ा नेटवर्क उजागर हो सकता है।
कई लोगों का कहना है कि यह सिर्फ एक पुलिया नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की बीमारी का नमूना है।

जनता पूछ रही— कौन देगा जवाब?
अब बड़ा सवाल यह है—
* क्या विशाल खलको पर कार्रवाई होगी?
* क्या पेटी कॉन्ट्रैक्टर की भूमिका की जांच होगी?
* क्या निर्माण एजेंसी को ब्लैकलिस्ट किया जाएगा?
* क्या डीएमएफटी की राशि की तकनीकी ऑडिट होगी?
फिलहाल कुमिरता की यह धंसी सड़क सिर्फ मिट्टी नहीं, बल्कि सरकारी सिस्टम की विश्वसनीयता के धंसने का प्रतीक बन गई है।
और अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला सिर्फ पुलिया तक सीमित नहीं रहेगा— बल्कि पूरे ग्रामीण कार्य विभाग के लिए एक बड़े भ्रष्टाचार के दस्तावेज में बदल सकता है।













