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भारत चांद पर, लेकिन भोजपुर का पचमा आज भी बांस के पुल पर!

On: July 13, 2026 11:46 AM
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AI, 5G और स्पेस मिशन के दौर में 70 फीट आहर पार करने को ग्रामीण खुद बना रहे चचरी, विकास के दावों पर उठे गंभीर सवाल

रिपोर्ट: शैलेश सिंह

एक तरफ भारत चंद्रमा पर तिरंगा फहरा चुका है, मंगल ग्रह की नई उड़ान की तैयारी में जुटा है, अंतरिक्ष में लगातार नए-नए उपग्रह भेज रहा है, 5G और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया में कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहा है। दूसरी तरफ बिहार के भोजपुर जिले के तरारी विधानसभा क्षेत्र के पिरो प्रखंड अंतर्गत पचमा गांव के लोग आज भी करीब 70 फीट चौड़ी आहर पार करने के लिए बांस की चचरी (अस्थायी पुल) बनाने को मजबूर हैं।
सवाल यह है कि जब देश अंतरिक्ष में पुल बना रहा है, तब क्या बिहार के एक गांव को धरती पर एक पुल भी नसीब नहीं हो सकता?

 

“विकास” का पोस्टर चमका, लेकिन गांव अंधेरे में डूबा

पचमा गांव की कहानी किसी फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की गहरी खाई है।
यह गांव तरारी विधानसभा क्षेत्र में आता है, जहां के विधायक विशाल प्रशांत हैं। ग्रामीणों के अनुसार यह गांव विधायक का सबसे मजबूत समर्थक गांव माना जाता है। चुनाव के समय यहां बड़े-बड़े वादे हुए। लोगों को भरोसा दिलाया गया कि सड़क बनेगी, पुल बनेगा, बिजली सुधरेगी और गांव की तस्वीर बदल जाएगी।
लेकिन आज तस्वीर यह है कि गांव वाले खुद बांस काट रहे हैं, रस्सियां बांध रहे हैं और अपनी मेहनत से पुल बना रहे हैं।

70 फीट की दूरी… और विकास 70 साल पीछे!

जिस आहर को पार करने के लिए एक मजबूत पुल की जरूरत थी, वहां आज ग्रामीण बांस की चचरी तैयार कर रहे हैं।
यह दृश्य किसी पिछड़े इलाके का नहीं, बल्कि उस भारत का है जो दुनिया को डिजिटल इंडिया का सपना दिखा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के दिनों में यह रास्ता जानलेवा बन जाता है। बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और किसान सभी इसी रास्ते से गुजरते हैं। कई बार दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है।
ऐसे में मजबूरी ने लोगों को सरकार का इंतजार छोड़ खुद पुल बनाने पर मजबूर कर दिया।

सड़क बनी… लेकिन बीच रास्ते दम तोड़ दिया विकास

ग्रामीण बताते हैं कि चुनाव से पहले विधायक ने घोषणा की थी कि सड़क निर्माण दो दिनों में शुरू हो जाएगा।
वादे के अनुसार सड़क पर चार पुलियों का निर्माण तेजी से शुरू भी हुआ।
लोगों को लगा कि अब गांव की किस्मत बदल जाएगी।
लेकिन चुनाव खत्म हुआ, परिणाम आया, सरकार बनी और सड़क वहीं रुक गई जहां काम रुका था।
आज भी सड़क अधूरी पड़ी है।
बरसात में कीचड़ ऐसा कि दोपहिया वाहन भी चलाना मुश्किल हो जाता है।
ग्रामीण तंज कसते हैं कि लगता है सड़क भी चुनाव परिणाम का इंतजार करते-करते थक गई।

विधायक जी का दिया ट्रांसफार्मर ?

बिजली है… लेकिन सिर्फ कागजों में!

पचमा गांव की बिजली व्यवस्था भी किसी व्यंग्य से कम नहीं।
तार है।
खंभे हैं।
बिजली भी आती है।
लेकिन वोल्टेज ऐसा कि न मोटर चलती है, न पंखा और न ही बल्ब ठीक से जल पाता है।
गांव वालों के अनुसार नया ट्रांसफार्मर भी आ गया, लेकिन आज तक लगाया नहीं गया।
यानी ट्रांसफार्मर गांव में मेहमान बनकर पड़ा है, लेकिन सेवा शुरू करने की अनुमति शायद अभी तक नहीं मिली।

‘जब विधायक जी बोलेंगे, तभी ट्रांसफार्मर लगेगा!’

ग्रामीणों का आरोप है कि जब उन्होंने बिजली विभाग से ट्रांसफार्मर लगाने की बात कही तो उन्हें जवाब मिला—
“जब तक विधायक जी नहीं बोलेंगे, तब तक ट्रांसफार्मर नहीं लगाया जाएगा।”
यदि ग्रामीणों का यह दावा सही है, तो सवाल उठता है कि क्या सरकारी मशीनरी नियमों से चलेगी या किसी जनप्रतिनिधि की अनुमति से?
लोग पूछ रहे हैं कि आखिर वह शुभ मुहूर्त कब आएगा, जब ट्रांसफार्मर चालू होगा और गांव में सामान्य वोल्टेज पहुंचेगा?

पुल का वादा भी अधूरा, अब जनता खुद बनी इंजीनियर

ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के दौरान आहर पर स्थायी पुल बनाने का भी आश्वासन दिया गया था।
लेकिन पुल नहीं बना।
नतीजा यह हुआ कि अब गांव के लोग खुद बांस का पुल तैयार कर रहे हैं।
यह दृश्य विकास के सरकारी दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

‘100 साल पहले तुमसे प्यार था…’

गांव में लोग व्यंग्य करते हुए मशहूर गीत गा रहे हैं—
“100 साल पहले तुमसे प्यार था, आज भी है और कल भी रहेगा।”
इस गीत के जरिए ग्रामीण अपने जनप्रतिनिधि के प्रति कटाक्ष कर रहे हैं।
उनका कहना है कि समर्थन तो आज भी है, लेकिन बदले में विकास की तस्वीर अब तक अधूरी ही है।

कंकड़ वाला विकास!

ग्रामीणों की पीड़ा भी कम दिलचस्प नहीं।
उनका कहना है—
“विकास का खाना तो मिला, लेकिन उसमें इतने कंकड़ और पत्थर मिले हैं कि न निगलते बन रहा है और न उगलते।”
यानी कुछ काम हुए भी तो इतने अधूरे कि राहत कम और परेशानी ज्यादा मिल रही है।

डिजिटल इंडिया बनाम बांस इंडिया?

एक तरफ सरकार डिजिटल इंडिया, विकसित भारत और आधुनिक बिहार की बात करती है।
दूसरी तरफ पचमा गांव के लोग अपने हाथों से बांस का पुल बना रहे हैं।
क्या यही विकसित गांव की तस्वीर है?
क्या यही अमृतकाल का सपना है?
या फिर विकास अभी भी चुनावी भाषणों की फाइलों में बंद पड़ा है?

ग्रामीणों की मांग

ग्रामीणों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से मांग की है कि—
* आहर पर शीघ्र स्थायी पुल का निर्माण कराया जाए।
* अधूरी सड़क का निर्माण तत्काल पूरा किया जाए।
* वर्षों से पड़े नए ट्रांसफार्मर को तुरंत चालू कराया जाए।
* गांव की बिजली व्यवस्था में सुधार किया जाए।
बरसात से पहले आवागमन की स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

 

अब जवाब किसके पास?

देश चांद पर पहुंच चुका है।
तकनीक आसमान छू रही है।
लेकिन पचमा गांव आज भी बांस के सहारे विकास की नदी पार करने की कोशिश कर रहा है।
अब सवाल जनता पूछ रही है—
क्या पचमा गांव को भी कभी विकास का पक्का पुल मिलेगा, या फिर आने वाली पीढ़ियां भी बांस की चचरी बनाकर ही लोकतंत्र का सफर तय करेंगी?

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