ईमानदार नेतृत्व तभी सफल होता है, जब अधिकारी और कर्मचारी भी उसी सोच के साथ काम करें
जनता फाइलों से नहीं, व्यवस्था से परेशान है; बदलाव की शुरुआत नीचे तक पहुंचनी होगी
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
पश्चिमी सिंहभूम को लंबे समय बाद ऐसा जिला प्रशासन मिला है, जो केवल सरकारी बैठकों तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि आम लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं को समझने और उनके समाधान की दिशा में लगातार पहल कर रहा है। जिला उपायुक्त मनीष कुमार की कार्यशैली को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि उनका जोर केवल योजनाओं की घोषणा पर नहीं, बल्कि सरकारी सेवाओं को अंतिम व्यक्ति तक समयबद्ध और सरल तरीके से पहुंचाने पर है।
4 अगस्त को ही राइट टू सर्विस एक्ट की समीक्षा बैठक में उन्होंने जाति, आय, स्थानीय निवासी, दाखिल-खारिज, जन्म एवं मृत्यु प्रमाण-पत्र सहित सभी प्रकार के आवेदनों का समय-सीमा के भीतर निष्पादन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। साथ ही प्रखंडों और पंचायतों में विशेष शिविर लगाने का निर्णय यह दर्शाता है कि प्रशासन लोगों को कार्यालयों तक बुलाने के बजाय सेवाओं को गांव तक पहुंचाने की सोच के साथ आगे बढ़ रहा है।

यही है सुशासन की असली परिभाषा
किसी भी जिले की पहचान केवल बड़ी योजनाओं से नहीं बनती, बल्कि इस बात से बनती है कि एक गरीब, किसान, मजदूर, छात्र, विधवा या बुजुर्ग को अपने छोटे-छोटे सरकारी काम कराने में कितनी परेशानी होती है।
एक जाति प्रमाण-पत्र, आय प्रमाण-पत्र या दाखिल-खारिज जैसे सामान्य कार्य के लिए यदि किसी व्यक्ति को कई बार प्रखंड और अंचल कार्यालय का चक्कर लगाना पड़े, तो यह केवल उसकी परेशानी नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था की कमजोरी है।
जनता की सबसे बड़ी शिकायत—फाइलें चलती कम, रुकती ज्यादा हैं
ग्रामीण क्षेत्रों से अक्सर यह शिकायत सामने आती है कि आवेदन जमा करने के बाद लोग कई-कई सप्ताह और महीनों तक कार्यालयों के चक्कर लगाते रहते हैं। कई मामलों में आवेदकों को यह तक नहीं बताया जाता कि उनका आवेदन किस स्तर पर लंबित है या उसमें क्या कमी है।
ऐसी शिकायतें भी आती रही हैं कि कुछ कार्यालयों में फाइलें लंबे समय तक लंबित रहती हैं, जिससे विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति, युवाओं की नौकरी, किसानों के भूमि संबंधी कार्य तथा जरूरतमंद परिवारों की सरकारी योजनाओं का लाभ प्रभावित होता है।
ऐसी स्थिति में सबसे अधिक परेशानी गरीब और दूरदराज के गांवों में रहने वाले लोगों को उठानी पड़ती है, जिन्हें प्रत्येक चक्कर में मजदूरी छोड़नी पड़ती है और यात्रा पर अतिरिक्त खर्च भी करना पड़ता है।

नेतृत्व अच्छा है, अब सिस्टम को बदलना होगा
उपायुक्त चाहे जितने अच्छे निर्देश दें, उनका वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देगा जब प्रखंड, अंचल, जिला और अन्य विभागों के सभी अधिकारी एवं कर्मचारी उसी गंभीरता के साथ उनका पालन करें।
यदि हर अधिकारी प्रतिदिन लंबित आवेदनों का निष्पादन करे, हर कर्मचारी नागरिकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करे और हर कार्यालय समयबद्ध सेवा देने की संस्कृति विकसित करे, तो बहुत कम समय में पश्चिमी सिंहभूम की प्रशासनिक तस्वीर बदल सकती है।
फाइलों का बोझ नहीं, समय पर निपटारा बने प्राथमिकता
कई सरकारी कार्यालयों में वर्षों से लंबित फाइलों का बोझ एक बड़ी समस्या रहा है। यदि प्रत्येक अधिकारी अपनी टेबल पर आने वाली फाइलों का नियमित निस्तारण करता रहे, तो न केवल लंबित मामलों की संख्या घटेगी बल्कि कार्यालयों का कार्यभार भी स्वतः कम होता जाएगा।
समय पर निर्णय लेने वाली व्यवस्था ही प्रभावी प्रशासन की पहचान होती है।

विशेष शिविर बन सकते हैं गेम चेंजर
यदि पंचायत स्तर पर नियमित शिविर लगते हैं और वहीं प्रमाण-पत्रों, राजस्व तथा अन्य सेवाओं का निष्पादन होने लगता है, तो हजारों ग्रामीणों को जिला मुख्यालय, प्रखंड और अंचल कार्यालयों के अनावश्यक चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।
इससे प्रशासन और जनता के बीच विश्वास भी मजबूत होगा।
हर विभाग को निभानी होगी जिम्मेदारी
यह केवल जिला प्रशासन या उपायुक्त की जिम्मेदारी नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य, राजस्व, पंचायती राज, समाज कल्याण, ग्रामीण विकास, आपूर्ति, कृषि, पेयजल, बिजली तथा अन्य सभी विभागों के अधिकारियों और कर्मचारियों को भी समान जिम्मेदारी के साथ कार्य करना होगा।
यदि सभी विभाग आपसी समन्वय और पारदर्शिता के साथ काम करें, तो पश्चिमी सिंहभूम को समस्याओं से मुक्त और सुशासन का मॉडल जिला बनाने का लक्ष्य कठिन नहीं रहेगा।
जनता भी बने सहभागी
प्रशासनिक सुधार केवल आदेशों से नहीं आते। जनता को भी सही दस्तावेजों के साथ आवेदन करना, गलत माध्यमों से बचना और भ्रष्टाचार के मामलों की शिकायत संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाना चाहिए। जब प्रशासन और जनता दोनों अपनी जिम्मेदारियां निभाएंगे, तभी व्यवस्था में स्थायी बदलाव संभव होगा।

बदलाव का अवसर
पश्चिमी सिंहभूम आज ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां एक सकारात्मक प्रशासनिक सोच दिखाई दे रही है। अब आवश्यकता इस बात की है कि जिला उपायुक्त मनीष कुमार की जनहित केंद्रित कार्यशैली को सभी विभागों के अधिकारी और कर्मचारी भी पूरी निष्ठा से अपनाएं। यदि ऐसा हुआ, तो आने वाले वर्षों में यह जिला केवल प्राकृतिक संपदा के लिए ही नहीं, बल्कि पारदर्शी, संवेदनशील और जनोन्मुख प्रशासन के लिए भी पूरे झारखंड में एक नई पहचान बना सकता है।












