लिखित समझौता लागू नहीं हुआ तो आंदोलन भी नहीं रुकेगा
रिपोर्ट शैलेश सिंह
सेल गुवा की रांजाबुरु खदान में जारी अनिश्चितकालीन आंदोलन को लेकर सारंडा विकास समिति दुईया-जामकुंडिया के सचिव सह सारंडा पीढ़ के मानकी लागुड़ा देवगम ने सेल प्रबंधन, मां सरला ठेका कंपनी और आंदोलन विरोधी गतिविधियों में शामिल लोगों पर जोरदार हमला बोला है। उन्होंने दो टूक कहा कि बीते 10 अगस्त से चल रहा अनिश्चितकालीन आंदोलन तब तक जारी रहेगा, जब तक पूर्व में किए गए लिखित समझौते को पूरी तरह धरातल पर लागू नहीं किया जाता।
लागुड़ा देवगम ने कहा कि पूर्व के आंदोलन के दौरान मंत्री दीपक बिरुवा, एसडीओ, बीडीओ और सेल प्रबंधन के उच्च अधिकारियों की मौजूदगी में प्रभावित ग्रामीणों और बेरोजगारों की मांगों को लेकर लिखित समझौता हुआ था। लेकिन लंबे समय बाद भी उस समझौते को लागू नहीं किया गया। यही वजह है कि ग्रामीणों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है।

“समझौता कागज पर नहीं, जमीन पर चाहिए”
मानकी लागुड़ा देवगम ने कहा कि ग्रामीण अब केवल आश्वासन सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्हें कागज पर किए गए समझौते का वास्तविक लाभ जमीन पर चाहिए। उनका कहना है कि जब तक समझौते की शर्तों को लागू नहीं किया जाता, रांजाबुरु खदान में चल रहा आंदोलन किसी भी कीमत पर समाप्त नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि प्रभावित गांवों के लोगों ने बार-बार शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें रखीं, लेकिन उनकी मांगों को गंभीरता से लेने के बजाय उन्हें दबाने का प्रयास किया जा रहा है।
“मुकदमे और गिरफ्तारी से आंदोलन नहीं टूटेगा”
लागुड़ा देवगम ने आरोप लगाया कि मां सरला कंपनी और उसके कुछ स्थानीय कथित बिचौलियों द्वारा पुलिस प्रशासन के साथ मिलकर आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि आंदोलन में शामिल ग्रामीणों और बेरोजगार युवाओं पर गलत तरीके से मुकदमे दर्ज कर उन्हें जेल भेजने की कोशिश की जा रही है।
उन्होंने कहा, “कुछ लोगों को लगता है कि मुकदमा दर्ज कराकर और जेल भेजकर आंदोलन को खत्म कर देंगे, लेकिन वे अपने मंसूबे में सफल नहीं होंगे। हमें न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है।”
मानकी ने कहा कि आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि प्रभावित ग्रामीणों के अधिकार और रोजगार के सवाल को लेकर है।
“आदिवासी महिलाओं पर हाईवा चढ़ाने की कोशिश की शिकायत पर कार्रवाई क्यों नहीं?”
लागुड़ा देवगम ने गुवा पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि समिति अध्यक्ष की ओर से लिखित शिकायत देकर आरोप लगाया गया था कि आंदोलन के दौरान मां सरला कंपनी के एक चालक ने आदिवासी महिलाओं पर हाईवा चढ़ाने की कोशिश की थी।
उनका आरोप है कि इस शिकायत पर पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज नहीं की, जबकि दूसरे पक्ष की शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज कर गिरफ्तारी की कार्रवाई शुरू कर दी गई।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कानून सबके लिए बराबर है तो दोनों पक्षों की शिकायतों पर समान कार्रवाई क्यों नहीं की गई? उन्होंने पुलिस प्रशासन से निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग की।
“रांजाबुरु खदान खोलने की ग्रामसभा की अध्यक्षता मैंने की थी”
लागुड़ा देवगम ने कहा कि रांजाबुरु खदान को खोलने को लेकर आयोजित ग्रामसभा की अध्यक्षता उन्होंने स्वयं की थी। उन्होंने दावा किया कि उस समय ग्रामीणों ने खदान खोलने के पक्ष में अपनी सहमति दी थी।
उन्होंने कहा कि ग्रामीण खदान के संचालन के विरोधी नहीं हैं। बल्कि वे चाहते हैं कि खदान चले, उत्पादन हो और स्थानीय प्रभावित लोगों को रोजगार मिले।
उनके अनुसार, उस समय गुवा प्रबंधन की ओर से प्रभावित गांवों के करीब 1200 ग्रामीणों को रोजगार देने की बात कही गई थी। लेकिन अब प्रबंधन कथित तौर पर अपने पुराने आश्वासन से पीछे हट रहा है।
“खदान खोलने के लिए सहमति दी, रोजगार के लिए अब संघर्ष क्यों?”
मानकी ने कहा कि ग्रामीणों ने खदान खोलने में सहयोग किया, लेकिन बदले में उन्हें रोजगार और विकास का लाभ नहीं मिला। उनका सवाल है कि जब प्रभावित क्षेत्र के लोगों की जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर खनन का सीधा असर पड़ रहा है तो रोजगार और मुआवजे में उनका पहला अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए?
उन्होंने कहा कि ग्रामीण खदान बंद कराने के पक्ष में नहीं हैं, बल्कि खदान से मिलने वाले रोजगार और अधिकारों में स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित कराने के पक्ष में हैं।
100 लोगों के नाम बताने की मांग
26 अगस्त को गुवा में कुछ लोगों द्वारा आंदोलन के खिलाफ बैठक किए जाने और खदान बंद रहने से 100 से अधिक स्थानीय स्टाफ व मजदूरों के प्रभावित होने संबंधी बयान पर भी लागुड़ा देवगम ने तीखी प्रतिक्रिया दी।
उन्होंने कहा कि जो लोग 100 से अधिक स्थानीय कर्मचारियों और मजदूरों के प्रभावित होने की बात कर रहे हैं, उन्हें पहले यह बताना चाहिए कि ये 100 से अधिक लोग आखिर कहां के रहने वाले हैं।
उन्होंने मांग की कि ऐसे सभी लोगों की सूची सार्वजनिक की जाए और यह भी बताया जाए कि वे किस गांव या क्षेत्र के निवासी हैं।
“1200 और 1800 रोजगार की बात हुई, फिर 100 लोगों की चिंता क्यों?”
लागुड़ा देवगम ने कहा कि पूर्व में गुवा प्रबंधन की ओर से 1200 लोगों को रोजगार देने की बात कही गई थी, जबकि बाद में मां सरला कंपनी की ओर से भी करीब 1800 बेरोजगारों को रोजगार देने की बातें कही गईं।
ऐसे में उनका सवाल है कि यदि हजारों प्रभावित बेरोजगार रोजगार की मांग कर रहे हैं तो कुछ लोग केवल 100 लोगों के रोजगार की चिंता लेकर ठेका कंपनी के पक्ष में क्यों खड़े हैं?
उन्होंने कहा कि “अगर 100 लोग ही स्थानीय हैं तो उनकी पूरी सूची सामने लाई जाए। ग्रामीणों को भी पता चले कि इन लोगों का स्थानीयता और प्रभावित क्षेत्र से क्या संबंध है।”
“बाहर से आए लोग स्थानीयों का रोजगार छीन रहे हैं”
मानकी ने आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो बाहर से गुवा क्षेत्र में आए और स्थानीय लोगों के हिस्से का रोजगार हासिल कर लिया। उन्होंने कहा कि कई लोग सिर्फ एक लोटा-गमछा लेकर यहां आए और आज स्थानीय लोगों के रोजगार पर कब्जा जमाए बैठे हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे लोगों में कुछ ने सेल की जमीन पर कथित रूप से अवैध कब्जा कर आवासीय सुविधाओं का भी लाभ उठाया है।
“हमारी जमीन बंजर हुई, रोजगार भी दूसरे ले गए”
लागुड़ा देवगम ने कहा कि खदान से प्रभावित आदिवासी और मूलवासी ग्रामीण दोहरी मार झेल रहे हैं। एक तरफ उनकी खेती की जमीन, नदी-नाले और प्राकृतिक संसाधन खनन से प्रभावित हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ रोजगार के अवसर भी उनके हाथ से निकल रहे हैं।
उन्होंने कहा कि ग्रामीणों के खेतों में लौह चूर्ण, मिट्टी और पत्थरों के कारण खेती प्रभावित हुई है। कई स्थानों पर जमीन बंजर हो चुकी है।
उनका दावा है कि तत्कालीन उपायुक्त के स्तर से इसकी जांच भी कराई गई थी और दर्जनों गांवों के किसानों की जमीन के बंजर होने की स्थिति सही पाई गई थी। इसके बावजूद प्रभावित किसानों को अब तक मुआवजा नहीं मिला।

“आज जमीन बंजर, कल खदान बंद—कौन रहेगा यहां?”
लागुड़ा देवगम ने आंदोलन विरोधी लोगों पर निशाना साधते हुए कहा कि खदान में जब तक लौह अयस्क रहेगा, तब तक कुछ बाहरी लोग यहां रहकर रोजगार और सुविधाओं का लाभ उठाते रहेंगे। लेकिन जब एक दिन खदान में अयस्क समाप्त होगा और खदान बंद हो जाएगी, तब ऐसे लोग अपना सामान समेटकर यहां से चले जाएंगे।
उन्होंने कहा कि “ये लोग अपना लोटा-गमछा लेकर यहां से चले जाएंगे, लेकिन खदान से प्रभावित ग्रामीण कहां जाएंगे? हमारी जमीन, जंगल, नदी-नाला और जीवन यहीं है। हमें इसी प्रदूषण, बीमारी, बेरोजगारी और बंजर जमीन के साथ यहीं रहना पड़ेगा।”
“नेतृत्व निजी फायदे के लिए नहीं, जनता के हित में होता है”
लागुड़ा देवगम ने कहा कि वास्तविक नेतृत्व वह है जो क्षेत्र के अधिक से अधिक बेरोजगार युवाओं को रोजगार दिलाने का प्रयास करे। किसी ठेका कंपनी के सीमित लोगों के हित को लेकर राजनीति करना नेतृत्व नहीं है।
उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति या समूह वास्तव में स्थानीय लोगों के हित की राजनीति कर रहा है तो उसे प्रभावित गांवों के सैकड़ों बेरोजगार युवाओं की आवाज उठानी चाहिए।
“आंदोलन को साजिश से नहीं दबाया जा सकता”
उन्होंने कहा कि रांजाबुरु आंदोलन अब केवल रोजगार का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रभावित ग्रामीणों के अधिकार, जमीन, मुआवजा और सम्मान की लड़ाई बन चुका है।
उन्होंने आरोप लगाया कि आंदोलन को कमजोर करने के लिए तरह-तरह की रणनीति अपनाई जा रही है। कभी आंदोलनकारियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं तो कभी आंदोलन के समानांतर बैठकें कर ग्रामीणों के बीच भ्रम पैदा करने की कोशिश की जा रही है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि “जब तक लिखित समझौता लागू नहीं होता, तब तक आंदोलन समाप्त नहीं होगा। गिरफ्तारी हो, मुकदमा हो या दबाव बनाया जाए—ग्रामीण अपने अधिकारों की लड़ाई से पीछे नहीं हटेंगे।”
खदान चले, लेकिन स्थानीय अधिकार के साथ
लागुड़ा देवगम ने अंत में फिर स्पष्ट किया कि सारंडा विकास समिति और प्रभावित ग्रामीण खदान बंद कराने की राजनीति नहीं कर रहे हैं। उनकी मांग है कि रांजाबुरु खदान चले, उत्पादन हो, लेकिन सबसे पहले खदान से प्रभावित स्थानीय आदिवासी-मूलवासी ग्रामीणों और बेरोजगार युवाओं के अधिकार सुनिश्चित किए जाएं।
उन्होंने सेल प्रबंधन और मां सरला कंपनी से पूर्व में किए गए लिखित समझौते को तत्काल लागू करने, प्रभावित बेरोजगारों को रोजगार देने और बंजर हुई जमीन का उचित मुआवजा दिलाने की मांग की।
उन्होंने कहा कि जब तक इन मुद्दों का समाधान नहीं होता, रांजाबुरु खदान का अनिश्चितकालीन आंदोलन जारी रहेगा और ग्रामीण अपने अधिकारों की लड़ाई से पीछे नहीं हटेंगे।













