ओपी के सामने से रात-दिन दौड़ते हाईवा-ट्रैक्टर, कथित ‘मैनेजमेंट’ के नाम पर वसूली के आरोप; खनन विभाग और टास्क फोर्स की चुप्पी पर भी गंभीर सवाल
रिपोर्ट — शैलेश सिंह
धनबाद के बरवाअड्डा थाना प्रभारी को लेकर विधायक टाइगर जयराम महतो और पुलिस मेन्स एसोसिएशन के बीच सामने आए विवाद ने पुलिस की जवाबदेही और थाना स्तर की कार्यप्रणाली पर बहस छेड़ दी है। इसी बीच पश्चिमी सिंहभूम के जैतगढ़ और जगन्नाथपुर क्षेत्र में कथित अवैध बालू कारोबार को लेकर उठ रही शिकायतों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—
जब पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने वाला कोई विधायक सामने आता है, तब तो विवाद सुर्खियों में आ जाता है, लेकिन जैतगढ़ में रात-दिन बालू लदे हाईवा और ट्रैक्टरों की आवाजाही पर सवाल उठाने वाला कौन है?
स्थानीय ग्रामीणों और सूत्रों के अनुसार जैतगढ़ ओपी क्षेत्र के गुमुरिया, मुंडुई, कुआपाड़ा, तुरली और बारला सहित कई घाटों से कथित रूप से बालू का बड़े पैमाने पर उठाव और परिवहन जारी है। आरोप है कि यह बालू जगन्नाथपुर, नोवामुंडी, बड़ाजामदा, हाटगम्हरिया और आसपास के क्षेत्रों तक पहुंचाया जा रहा है।
यदि ये आरोप सही हैं तो सवाल केवल बालू चोरी का नहीं, बल्कि पुलिस, खनन विभाग, टास्क फोर्स और कथित सिंडिकेट के बीच संभावित सांठगांठ की जांच का भी है।
बरवाअड्डा की गूंज जैतगढ़ तक—क्या यहां भी उठेगा वही सवाल?
विधायक टाइगर जयराम महतो द्वारा बरवाअड्डा थाना प्रभारी की कार्यशैली को लेकर सवाल उठाए जाने के बाद पुलिस व्यवस्था की जवाबदेही पर बहस तेज हुई।
अब जैतगढ़ में भी ग्रामीणों के बीच यही चर्चा है कि अगर किसी थाना क्षेत्र में कथित रूप से अवैध कारोबार लगातार चलता रहे तो उसकी जिम्मेदारी तय कैसे होगी?
क्या केवल किसी जनप्रतिनिधि के सड़क पर उतरने या आवाज उठाने के बाद ही प्रशासन जागेगा?
जैतगढ़ के मामले में तो आरोप इससे भी गंभीर हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कथित बालू लदे वाहन उस क्षेत्र से गुजरते हैं जहां पुलिस की मौजूदगी रहती है।
फिर भी कार्रवाई कितनी हुई?
यही सवाल अब प्रशासन के सामने है।
ओपी के सामने से गुजरता ‘बालू काफिला’!
स्थानीय लोगों का दावा है कि जैतगढ़ मुख्य सड़क से रात-दिन बालू लदे ट्रैक्टर और हाईवा गुजरते हैं।
कई बार एक साथ कई वाहनों के निकलने की बात कही जा रही है।
यदि किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी द्वारा जैतगढ़ बाजार और मुख्य सड़क किनारे मौजूद दुकानों के सीसीटीवी फुटेज की जांच की जाए तो कथित बालू परिवहन की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
कौन सा वाहन कब निकला?
कहां से आया?
किधर गया?
कितनी बार गया?
इन सवालों का जवाब कैमरे और वाहन नंबरों के रिकॉर्ड से निकाला जा सकता है।

सीसीटीवी की जांच हुई तो ‘सिस्टम’ का सच सामने आएगा?
जैतगढ़ बाजार की दुकानों और प्रतिष्ठानों में लगे सीसीटीवी कैमरे इस मामले में अहम सबूत बन सकते हैं।
यदि पिछले कई सप्ताह या महीनों के फुटेज सुरक्षित हैं तो उनकी जांच से कथित बालू परिवहन का पैटर्न सामने आ सकता है।
इसके साथ पुलिस की रात्रि गश्ती का रिकॉर्ड, ड्यूटी चार्ट, जब्त वाहनों का विवरण और खनन विभाग की कार्रवाई का रिकॉर्ड मिलाया जाए तो यह भी पता चल सकता है कि शिकायतों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
अगर सब कुछ वैध है तो जांच से डर कैसा?
गरीब ट्रैक्टर मालिकों पर ‘मासिक मैनेजमेंट’ का बोझ?
इस कथित कारोबार का एक और गंभीर पहलू छोटे ट्रैक्टर मालिकों से कथित मासिक वसूली का है।
स्थानीय सूत्रों का आरोप है कि कुछ लोगों द्वारा ट्रैक्टर मालिकों से एक निश्चित रकम यह कहकर ली जाती है कि पुलिस, खनन विभाग और अन्य संबंधित स्तरों पर ‘मैनेजमेंट’ करना पड़ता है।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
लेकिन अगर यह सच है तो जांच एजेंसियों को यह पता लगाना होगा कि रकम कौन वसूलता है, पैसा कहां जाता है और किसके संरक्षण में यह व्यवस्था चलती है।
क्योंकि सवाल केवल एक ट्रैक्टर का नहीं है।
सवाल उस कथित नेटवर्क का है जो दर्जनों वाहनों को नियंत्रित करता है।
छोटे ट्रैक्टर वालों से वसूली, बड़े हाईवा वालों पर मेहरबानी?
स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप है कि कथित सिंडिकेट छोटे ट्रैक्टर मालिकों को दबाव में रखता है, जबकि बड़े हाईवा के जरिए अधिक मात्रा में बालू की ढुलाई करने वालों का कारोबार चलता रहता है।
यदि यह आरोप सही है तो यह अपने आप में गंभीर जांच का विषय है।
क्यों छोटे वाहन कार्रवाई की जद में आते हैं?
बड़े वाहनों की निगरानी कौन करता है?
किसके पास कितने वाहन हैं?
किसके नाम से वाहन पंजीकृत हैं?
और किस-किस स्थान पर बालू का स्टॉक किया जा रहा है?
इन सवालों के जवाब से कथित सिंडिकेट की पूरी संरचना सामने आ सकती है।

खनन विभाग की ‘खामोशी’ सबसे बड़ा सवाल
अवैध खनन रोकने की जिम्मेदारी खनन विभाग की भी है।
फिर सवाल उठता है कि जिन घाटों से कथित रूप से लगातार बालू उठ रहा है, वहां विभागीय निरीक्षण कितनी बार हुआ?
कितने वाहन पकड़े गए?
कितनी प्राथमिकी दर्ज हुई?
कितना जुर्माना वसूला गया?
कितनी मात्रा में बालू जब्त किया गया?
और जब वाहन पकड़े गए तो उनके खिलाफ आगे क्या कार्रवाई हुई?
यदि रिकॉर्ड कार्रवाई की कहानी नहीं बताते तो फिर जमीन पर चल रहा यह कारोबार किसकी निगरानी में है?
टास्क फोर्स की बैठकें या सिर्फ कागजी कार्रवाई?
जिला स्तर पर अवैध खनन के खिलाफ टास्क फोर्स गठित है और समय-समय पर कार्रवाई के निर्देश भी जारी होते हैं।
लेकिन ग्रामीणों का सवाल है कि अगर आदेश इतने सख्त हैं तो जैतगढ़ क्षेत्र में कथित अवैध बालू परिवहन पर उनका असर क्यों नहीं दिखाई देता?
कागज पर टास्क फोर्स मजबूत, सड़क पर बालू माफिया मजबूत—आखिर क्यों?
अब जरूरत संयुक्त छापेमारी की नहीं बल्कि पूरे नेटवर्क की जांच की है।
गुमुरिया से बारला तक नदी की छाती पर मशीनें?
गुमुरिया, मुंडुई, कुआपाड़ा, तुरली और बारला क्षेत्र के विभिन्न घाटों से कथित रूप से बालू उठाव की शिकायतें हैं।
कई जगह मशीनों के इस्तेमाल के आरोप भी सामने आ रहे हैं।
यदि जेसीबी जैसी मशीनों से नदी की धारा के भीतर बड़े पैमाने पर बालू उठाया जा रहा है तो इससे नदी की प्राकृतिक संरचना प्रभावित हो सकती है।
ग्रामीणों के अनुसार कई स्थानों पर गहरे गड्ढे बन रहे हैं।
ऐसे गड्ढे भविष्य में ग्रामीणों और बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं।
चंपुआ में भी रात के अंधेरे का खेल?
झारखंड के जैतगढ़ से सटे ओडिशा के क्योंझर जिले के चंपुआ तहसील क्षेत्र में भी कथित अवैध बालू परिवहन की शिकायतें सामने आ रही हैं।
भंडा इलाके के मरमेडो नाला स्थित कंदनाली/चत्री गढ़ुआ घाट तथा भंडा कब्रिस्तान घाट से रात करीब 11 बजे से सुबह 6 बजे तक ट्रैक्टरों से बालू ढुलाई किए जाने का स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया है।
कथित रूप से कुछ बालू भंडा पेट्रोल पंप के पीछे बनाए गए डिपो में पहुंचाया जाता है और वहां से आगे भेजे जाने की बात कही जा रही है।
यदि झारखंड और ओडिशा दोनों ओर ऐसी गतिविधियां एक साथ चल रही हैं तो यह केवल स्थानीय समस्या नहीं बल्कि सीमावर्ती क्षेत्र में बालू परिवहन के पूरे नेटवर्क की संयुक्त जांच का मामला बन जाता है।
कोंक्वा नाला और वैतरणी भी निशाने पर
जगन्नाथपुर थाना क्षेत्र के कोंक्वा नाला और वैतरणी घाट से भी कथित अवैध बालू उत्खनन की शिकायतें हैं।
वैतरणी घाट से निकाले गए बालू को काड़ोंकोड़ा, मानिकपुर, मानाबेड़ा, दलपोस और बांसकांटा सहित विभिन्न स्थानों पर कथित रूप से स्टॉक किए जाने की बात कही जा रही है।
ग्रामीणों का आरोप है कि छठ घाट के आसपास लगातार बालू उठाव के कारण नदी का स्वरूप बदल गया है और कई स्थानों पर गहरे गड्ढे बन गए हैं।
बालू की कीमत पर आदिवासी और ग्रामीण अधिकारों का सवाल
पेशा क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों पर ग्राम सभा की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाया जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि घाटों का संचालन वैध तरीके से हो रहा है तो ग्राम सभा, पर्यावरणीय स्वीकृति, खनन अनुमति, परिवहन चालान और राजस्व रिकॉर्ड की स्थिति सार्वजनिक होनी चाहिए।
ग्राम सभा कमजोर और कथित बालू सिंडिकेट मजबूत—क्या यही विकास का मॉडल है?
यह सवाल प्रशासन को जवाब देना होगा।
सरकारी खजाने को कितना नुकसान?
स्थानीय स्तर पर रोजाना लाखों रुपये के बालू कारोबार के दावे किए जा रहे हैं।
हालांकि इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है।
यदि बालू का उठाव वैध है तो सरकार के पास उसका पूरा राजस्व रिकॉर्ड होना चाहिए।
यदि अवैध है तो फिर इतने बड़े पैमाने पर कथित परिवहन कैसे चल रहा है?
यही वह बिंदु है जहां जांच की जरूरत सबसे ज्यादा है।
अब ‘जयराम महतो मॉडल’ की तरह जवाबदेही की मांग?
बरवाअड्डा विवाद ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या जनप्रतिनिधियों को पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं है?
जैतगढ़ का मामला अलग है, लेकिन यहां भी ग्रामीणों के आरोप पुलिस और प्रशासन की जवाबदेही से जुड़े हैं।
इसलिए सवाल यह नहीं कि जैतगढ़ में जयराम महतो आएंगे या नहीं।
सवाल यह है कि—
क्या प्रशासन खुद ग्रामीणों की शिकायतों पर कार्रवाई करेगा?
क्या किसी विधायक या राजनीतिक दबाव का इंतजार किए बिना जांच होगी?
क्या पुलिस और खनन विभाग अपने रिकॉर्ड सार्वजनिक करेंगे?
क्या टास्क फोर्स मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति देखेगी?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या बड़े हाईवा नेटवर्क तक कार्रवाई पहुंचेगी या हमेशा की तरह छोटे ट्रैक्टरों को पकड़कर मामला खत्म कर दिया जाएगा?
अब जांच हुई तो सिर्फ ट्रैक्टर नहीं, पूरा नेटवर्क पकड़ा जाएगा
इस पूरे मामले में स्वतंत्र जांच के लिए प्रशासन को—
सीसीटीवी फुटेज,
वाहनों के नंबर,
ई-चालान,
खनन अनुमति,
घाटों की स्वीकृति,
स्टॉकयार्ड,
रात्रि गश्ती रिकॉर्ड,
जब्ती एवं प्राथमिकी का रिकॉर्ड,
वाहन मालिकों और कथित बिचौलियों की भूमिका
की जांच करनी चाहिए।
जरूरत पड़े तो झारखंड और ओडिशा प्रशासन को संयुक्त अभियान चलाकर सीमा क्षेत्र के सभी संवेदनशील घाटों और परिवहन मार्गों की निगरानी करनी चाहिए।

अंतिम सवाल—जैतगढ़ में कानून चलेगा या ‘बालू सिंडिकेट’?
बरवाअड्डा में विधायक जयराम महतो और पुलिस के बीच विवाद ने पुलिस जवाबदेही का सवाल राजनीतिक मंच पर पहुंचा दिया है।
अब जैतगढ़ में कथित बालू कारोबार को लेकर ग्रामीणों के सवाल प्रशासन के दरवाजे पर हैं।
रात में हाईवा क्यों दौड़ रहे हैं?
ट्रैक्टरों की लगातार आवाजाही कैसे हो रही है?
खनन विभाग की निगरानी कहां है?
टास्क फोर्स की कार्रवाई कहां है?
सीसीटीवी फुटेज की जांच क्यों नहीं होती?
कथित मासिक वसूली के आरोपों की जांच कौन करेगा?
और सबसे बड़ा सवाल—
अगर सब कुछ कानून के मुताबिक है तो जांच से परहेज क्यों? और अगर कानून टूट रहा है तो कार्रवाई में देरी क्यों?
जैतगढ़ की नदी, ग्रामीणों के अधिकार और सरकारी राजस्व किसी कथित सिंडिकेट के हवाले नहीं किए जा सकते।
अब जरूरत कुछ ट्रैक्टर पकड़ने की नहीं, बल्कि अगर आरोप सही पाए जाते हैं तो पूरे कथित नेटवर्क की जड़ तक पहुंचने की है।
क्योंकि सवाल बालू का नहीं—सवाल यह है कि जैतगढ़ में शासन किसका चलेगा: कानून का या कथित बालू सिंडिकेट का?














