जैतगढ़ से चंपुआ तक रात के अंधेरे में बेखौफ उत्खनन, ट्रैक्टरों की कतारों से सड़कें बेहाल; प्रशासनिक कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल
रिपोर्ट — शैलेश सिंह
झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम से लेकर ओडिशा के क्योंझर जिले के चंपुआ क्षेत्र तक बालू के कथित अवैध उत्खनन और परिवहन का बड़ा नेटवर्क सक्रिय होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। जैतगढ़ ओपी क्षेत्र के गुमुरिया, मुंडुई, कुआपाड़ा, तुरली और बारला घाट से लेकर चंपुआ तहसील के भंडा क्षेत्र और जगन्नाथपुर थाना क्षेत्र के कोंक्वा नाला व वैतरणी घाट तक बालू के अवैध कारोबार के आरोप लगाए जा रहे हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि रात के अंधेरे में ट्रैक्टर और भारी वाहनों की आवाजाही लगातार जारी रहती है, जबकि पुलिस, खनन विभाग और प्रशासन की कार्रवाई प्रभावी नजर नहीं आती। सीमावर्ती इलाकों में अलग-अलग घाटों से निकलने वाली बालू कथित रूप से डिपो और स्टॉकयार्ड तक पहुंचाई जाती है और वहां से दूसरे क्षेत्रों में भेजी जाती है।

रात 11 बजे से सुबह 6 बजे तक ‘बालू एक्सप्रेस’
ओडिशा के चंपुआ तहसील अंतर्गत भंडा इलाके में मरमेडो नाला के कंदनाली घाट, जिसे स्थानीय स्तर पर चत्री गढ़ुआ घाट भी कहा जाता है, तथा भंडा कब्रिस्तान घाट से रात करीब 11 बजे से सुबह 6 बजे तक ट्रैक्टरों से बालू ढोए जाने की शिकायत है।
कंदनाली घाट से निकलने वाले बालू लदे ट्रैक्टर बंसाही होते हुए भंडा-बंकासाही चौक की ओर जाने की बात सामने आई है। वहीं भंडा कब्रिस्तान घाट से कथित रूप से निकाली गई बालू को भंडा पेट्रोल पंप के पीछे बनाए गए डिपो में जमा किया जाता है और वहां से विभिन्न इलाकों में भेजे जाने का आरोप है।
भारी ट्रैक्टरों ने सड़क को बनाया बदहाल
लगातार भारी बालू लदे ट्रैक्टरों के परिचालन से भंडा-बंसाही सड़क की स्थिति खराब होने की शिकायत स्थानीय लोग कर रहे हैं। सुबह के समय स्कूल जाने वाले बच्चे, कामकाजी लोग और बाजार आने-जाने वाले ग्रामीण तेज रफ्तार ट्रैक्टरों के कारण दुर्घटना की आशंका में रहते हैं।
लोगों का कहना है कि यदि रात के समय बालू ढुलाई पर निगरानी होती और वाहनों की जांच की जाती, तो कथित अवैध कारोबार पर काफी हद तक रोक लग सकती थी।
जैतगढ़ के पांच घाटों पर भी गंभीर आरोप
झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में जैतगढ़ ओपी क्षेत्र के गुमुरिया, मुंडुई, कुआपाड़ा, तुरली और बारला बालू घाटों को लेकर भी स्थानीय स्तर पर गंभीर शिकायतें सामने आ रही हैं।
ग्रामीणों के अनुसार इन घाटों से बड़ी संख्या में ट्रैक्टरों द्वारा बालू उठाव किया जाता है। कई स्थानों पर कथित रूप से बालू के स्टॉकयार्ड बनाए गए हैं, जहां जेसीबी की मदद से बालू लोड कर बड़े वाहनों से दूसरे क्षेत्रों में भेजे जाने की बात कही जा रही है।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र प्रशासनिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में संबंधित विभागों के लिए इन घाटों पर वास्तविक स्थिति की जांच कर कार्रवाई करना जरूरी हो गया है।
पेशा कानून पर भी उठ रहे सवाल
अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की भूमिका और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े अधिकारों को लेकर पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम यानी पेसा कानून के प्रावधानों का हवाला देते हुए ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि ग्राम सभाओं को विश्वास में लिए बिना प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से आदिवासी स्वशासन की भावना प्रभावित होती है। उनका सवाल है कि यदि ग्राम सभा और स्थानीय समुदाय के अधिकारों की अनदेखी हो रही है तो प्रशासन इस पर स्पष्ट स्थिति क्यों नहीं रखता?
कोंक्वा नाला से वैतरणी घाट तक शिकायतें
जगन्नाथपुर थाना क्षेत्र के कोंक्वा नाला से भी कथित अवैध बालू उत्खनन की शिकायत सामने आई है। इसके अलावा वैतरणी घाट से बड़े पैमाने पर बालू उठाव किए जाने का आरोप स्थानीय सूत्रों ने लगाया है।
बताया जाता है कि वैतरणी घाट से निकाली गई बालू को काड़ों कोड़ा, मानिकपुर, माना बेड़ा, दलपोस और बांस कांटा सहित विभिन्न स्थानों पर कथित रूप से छिपाकर रखा गया है। आरोप है कि मौका देखकर इस बालू को ऊंचे दामों पर बेचा जाता है।
छठ घाट का स्वरूप तक बदलने का आरोप
वैतरणी नदी के छठ घाट के आसपास लगातार बालू उत्खनन से नदी और घाट का स्वरूप बदलने की शिकायत भी सामने आई है। स्थानीय लोगों के मुताबिक अत्यधिक बालू उठाव के कारण कई स्थानों पर गहरे गड्ढे बन गए हैं, जिनमें पानी भर जाने से हादसे का खतरा बढ़ गया है।
यदि नदी की प्राकृतिक संरचना में इसी तरह हस्तक्षेप जारी रहा तो भविष्य में कटाव, जलधारा में बदलाव और स्थानीय पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका है।
पुलिस-खनन विभाग की निगरानी पर सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि रात-दिन ट्रैक्टरों से बालू की ढुलाई की जा रही है तो संबंधित पुलिस, खनन विभाग और तहसील प्रशासन को इसकी जानकारी क्यों नहीं मिल रही?
स्थानीय लोग आरोप लगा रहे हैं कि कार्रवाई के नाम पर कभी-कभार जांच अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन कथित अवैध कारोबार पर स्थायी रोक नहीं लग पाती। हालांकि पुलिस या खनन विभाग की मिलीभगत के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
‘सेटिंग’ के आरोपों से गरमाया माहौल
सीमावर्ती क्षेत्र में बालू कारोबार को लेकर स्थानीय लोगों के बीच प्रशासन और कथित बालू माफिया के बीच सांठगांठ के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि पूरी व्यवस्था पारदर्शी है तो रात में चलने वाले वाहनों, कथित डिपो और स्टॉकयार्ड की नियमित जांच क्यों नहीं होती?
इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होने पर ही वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
नदी, खेत और गांव—सब पर बढ़ता खतरा
अवैध बालू उत्खनन केवल राजस्व का मामला नहीं है। नदी के तल से अत्यधिक बालू उठाने से नदी की प्राकृतिक संरचना प्रभावित हो सकती है। इससे कटाव, जलधारा में बदलाव और पुल-पुलियों की सुरक्षा पर असर पड़ने की आशंका रहती है।
ग्रामीणों का कहना है कि आज बालू निकल रही है, लेकिन कल इसका खामियाजा खेतों, नदी किनारे बसे गांवों और आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ सकता है।
सरकारी राजस्व को भी नुकसान का सवाल
यदि किसी घाट से वैध तरीके से बालू का उठाव और परिवहन किया जाना है तो उसके लिए निर्धारित नियमों, अनुमति और राजस्व व्यवस्था का पालन जरूरी है। कथित अवैध उत्खनन और परिवहन की स्थिति में सरकार को राजस्व नुकसान होने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन भी होता है।
इसलिए स्थानीय लोगों ने संबंधित विभागों से प्रत्येक घाट की जांच, उत्खनन की मात्रा का आकलन और राजस्व अभिलेखों की जांच कराने की मांग की है।
दो राज्यों की सीमा, लेकिन अपराध का रास्ता एक?
सबसे गंभीर पहलू यह है कि झारखंड और ओडिशा के सीमावर्ती क्षेत्रों में बालू के अवैध कारोबार को लेकर एक-दूसरे से जुड़ी शिकायतें सामने आ रही हैं। एक ओर चंपुआ तहसील के भंडा इलाके में रात के समय ट्रैक्टर परिचालन के आरोप हैं, तो दूसरी ओर जैतगढ़ और जगन्नाथपुर क्षेत्र के घाटों से भी अवैध उत्खनन की शिकायतें हैं।
ऐसे में केवल एक थाना या एक विभाग की कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। दोनों राज्यों के पुलिस, खनन और राजस्व विभागों को संयुक्त अभियान चलाकर घाटों, परिवहन मार्गों और कथित स्टॉकयार्ड की जांच करनी चाहिए।
अब कार्रवाई नहीं हुई तो बढ़ेगा खतरा
स्थानीय लोगों की मांग है कि—
* सभी संदिग्ध बालू घाटों का स्थल निरीक्षण कराया जाए।
* रात के समय बालू परिवहन की विशेष निगरानी हो।
* बिना वैध दस्तावेज चलने वाले वाहनों पर कार्रवाई हो।
* कथित अवैध स्टॉकयार्ड और डिपो की जांच हो।
* नदी घाटों पर मशीनों से हो रहे उत्खनन की जांच की जाए।
* ग्राम सभाओं और स्थानीय समुदाय की शिकायतों को रिकॉर्ड पर लिया जाए।
* झारखंड और ओडिशा प्रशासन संयुक्त रूप से सीमावर्ती क्षेत्रों की निगरानी करे।
सबसे बड़ा सवाल—बालू पर किसका अधिकार?
जैतगढ़ से चंपुआ तक उठ रहे सवाल अब सिर्फ बालू के अवैध कारोबार तक सीमित नहीं हैं। सवाल यह है कि प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? नदी और पर्यावरण को बचाने की जिम्मेदारी किसकी है? सरकारी राजस्व की रक्षा कौन करेगा? और यदि ग्रामीण लगातार शिकायत कर रहे हैं, तो उनकी शिकायतों पर कार्रवाई कब होगी?
बालू की कीमत बाजार में भले ही तय होती हो, लेकिन नदी की कीमत कोई तय नहीं कर सकता। यदि अवैध उत्खनन के आरोप सही हैं और समय रहते रोक नहीं लगी, तो इसका नुकसान केवल सरकारी खजाने को नहीं, बल्कि नदी, खेत, सड़क और स्थानीय समाज को भी उठाना पड़ सकता है।
अब निगाहें दोनों राज्यों के प्रशासन पर हैं कि वह इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाता है या सीमावर्ती इलाकों में कथित ‘बालू के काले साम्राज्य’ पर सवाल यूं ही उठते रहेंगे।













