कोयना नदी किनारे पगडंडी के ऊंचे रास्ते पर जमीन के अंदर छिपाकर रखे गए थे विस्फोटक | 193वीं बटालियन सीआरपीएफ और छोटानागरा थाना प्रभारी गौतम कुमार के नेतृत्व में संयुक्त कार्रवाई | मुठभेड़ में 17 नक्सलियों के मारे जाने वाले स्थान से महज डेढ़-दो किलोमीटर दूर मिले लैंडमाइन
जवानों को निशाना बनाने के लिए बिछाया गया था विस्फोटकों का जाल
रिपोर्ट शैलेश सिंह
किरीबुरु। कभी नक्सलियों की हिंसक गतिविधियों और बारूदी सुरंगों के खौफ से पहचाने जाने वाले सारंडा के जंगलों में सुरक्षा बलों का अभियान लगातार जारी है। नक्सलियों द्वारा पूर्व में पुलिस और सीआरपीएफ जवानों को भारी नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से जमीन के अंदर छिपाकर लगाए गए दो शक्तिशाली आईईडी लैंडमाइन बरामद किए गए हैं। 29 अक्टूबर को सीआरपीएफ की 193वीं बटालियन के जवानों, छोटानागरा थाना प्रभारी गौतम कुमार और झारखंड पुलिस के जवानों ने संयुक्त अभियान के दौरान इन विस्फोटकों को खोज निकाला और निर्धारित प्रक्रिया के तहत निष्क्रिय कर दिया।
दोनों आईईडी लैंडमाइन छोटानागरा थाना क्षेत्र के बहदा गांव के आसपास कोयना नदी के किनारे स्थित पगडंडी रास्ते के ऊंचे स्थान पर जमीन के अंदर छिपाकर लगाए गए थे। इनका उद्देश्य सुरक्षा बलों की आवाजाही के दौरान विस्फोट कर जान-माल का भारी नुकसान पहुंचाना था।

बहदा के जंगल में एरिया डोमिनेशन के दौरान मिली सफलता
जानकारी के अनुसार, सुरक्षा बलों की संयुक्त टीम क्षेत्र में एरिया डोमिनेशन अभियान चला रही थी। इसी दौरान जवानों को बहदा गांव के समीप कोयना नदी किनारे पगडंडी मार्ग के ऊंचे हिस्से में जमीन के अंदर संदिग्ध विस्फोटक होने की जानकारी मिली। सतर्कता के साथ जांच करने पर दो शक्तिशाली आईईडी लैंडमाइन का पता चला।
इसके बाद सुरक्षा मानकों का पालन करते हुए दोनों विस्फोटकों को निष्क्रिय किया गया। सुरक्षा बलों की इस कार्रवाई से संभावित बड़ी घटना टल गई। यदि इन लैंडमाइनों की चपेट में गश्ती दल, ग्रामीण या जंगल से गुजरने वाले लोग आ जाते तो गंभीर जनहानि हो सकती थी।
जहां मारे गए थे 17 नक्सली, उससे महज दो किलोमीटर दूर मिला विस्फोटक
इस बरामदगी का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि घटनास्थल से लगभग डेढ़ से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित जंगल में कुछ महीने पहले पुलिस और नक्सलियों के बीच भीषण मुठभेड़ हुई थी। उस मुठभेड़ में एक करोड़ रुपये के इनामी नक्सली अनल दा, 50 लाख रुपये के इनामी अनमोल दा समेत कुल 17 नक्सली मारे गए थे।
मुठभेड़ के बाद सुरक्षा बलों ने घटनास्थल से दर्जनों अत्याधुनिक हथियार भी बरामद किए थे। इस बड़ी कार्रवाई के बाद सारंडा में नक्सली नेटवर्क को गहरा झटका लगा था। अब उसी मुठभेड़ स्थल के आसपास दो शक्तिशाली आईईडी लैंडमाइन का मिलना इस बात की ओर संकेत करता है कि नक्सलियों ने पहले से ही जंगल के रास्तों और संभावित सुरक्षा बलों की आवाजाही वाले स्थानों पर विस्फोटकों का जाल बिछा रखा था।

सैकड़ों लैंडमाइन अब भी बने हुए हैं बड़ा खतरा
सारंडा के जंगलों में नक्सलियों की सक्रियता कमजोर पड़ने और क्षेत्र को नक्सलमुक्त घोषित किए जाने के बावजूद जमीन के नीचे छिपाए गए पुराने विस्फोटक अब भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं। आशंका है कि सारंडा के विभिन्न जंगलों, पगडंडियों, नदी-नालों के किनारे और पहाड़ी रास्तों में अब भी बड़ी संख्या में लैंडमाइन और आईईडी छिपे हो सकते हैं।
इनका खतरा केवल पुलिस और सुरक्षा बलों तक सीमित नहीं है। जंगल पर निर्भर आदिवासी ग्रामीण, लकड़ी एवं पत्ता चुनने जाने वाले लोग, मवेशी चराने वाले ग्रामीण और वन्यजीव भी अनजाने में इनकी चपेट में आ सकते हैं। एक छोटी सी चूक भी जानलेवा साबित हो सकती है।
नक्सलमुक्त सारंडा के लिए अब बारूदी सुरंगों की सफाई सबसे बड़ी चुनौती
सारंडा में नक्सलियों के प्रभाव को समाप्त करने की दिशा में सुरक्षा बलों ने उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। लगातार अभियान, एरिया डोमिनेशन और संयुक्त कार्रवाई के कारण नक्सली गतिविधियों पर प्रभावी अंकुश लगा है। हालांकि, नक्सलियों के कमजोर पड़ने का अर्थ यह नहीं है कि उनके द्वारा जंगल में पहले से बिछाया गया बारूदी खतरा भी समाप्त हो गया है।
ऐसे में सारंडा को वास्तव में सुरक्षित बनाने के लिए जंगल के सभी संवेदनशील रास्तों, ग्रामीण आवागमन वाले मार्गों और पूर्व नक्सली ठिकानों के आसपास व्यापक स्तर पर आईईडी एवं लैंडमाइन खोज अभियान चलाने की आवश्यकता है।
पुलिस-सीआरपीएफ की सतर्कता से टली बड़ी अनहोनी
सीआरपीएफ की 193वीं बटालियन, छोटानागरा थाना प्रभारी गौतम कुमार और झारखंड पुलिस के जवानों द्वारा लगातार चलाए जा रहे अभियान से नक्सलियों के पुराने बारूदी जाल को खोजकर निष्क्रिय करने में सफलता मिल रही है। 29 अक्टूबर की यह कार्रवाई सुरक्षा बलों की सतर्कता और क्षेत्र में शांति बहाली के प्रयासों की महत्वपूर्ण कड़ी है।
अब जरूरत इस बात की है कि सारंडा के जंगलों को केवल नक्सलमुक्त ही नहीं, बल्कि बारूदी सुरंगों के खतरों से भी पूरी तरह सुरक्षित बनाया जाए, ताकि ग्रामीण बेखौफ होकर अपने जंगल, खेत और गांवों तक आ-जा सकें तथा वन्यजीवों का जीवन भी सुरक्षित रह सके।








