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गरीबी ने छीनी बचपन की पढ़ाई, कंपनी की लापरवाही ने छीन ली 17 वर्षीय तुलसी की जिंदगी!

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सारंडा के नाबालिग मजदूर की हरिद्वार में इलाज के दौरान मौत, शव गांव पहुंचते ही मचा कोहराम

आधार कार्ड में उम्र दर्ज होने के बावजूद कंपनी ने कैसे दिया काम? बाल मजदूरी पर कंपनी प्रबंधन की भूमिका कठघरे में, शासन-प्रशासन की जवाबदेही पर भी उठे गंभीर सवाल

रिपोर्ट शैलेश सिंह।

सारंडा (पश्चिम सिंहभूम)। गरीबी की मार ने जिस उम्र में तुलसी हुरद के हाथों से किताब और कलम छीनकर मजदूरी करने को मजबूर कर दिया था, उसी मजदूरी ने आखिरकार उसके परिवार से उसका चिराग भी छीन लिया। सारंडा के दुईया गांव निवासी 17 वर्ष 9 महीने के नाबालिग मजदूर तुलसी हुरद, पिता मंगरा हुरद की हरिद्वार में इलाज के दौरान हुई मौत ने बाल मजदूरी, श्रमिकों की सुरक्षा और कंपनी प्रबंधन की जिम्मेदारी को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

तुलसी का शव उसके साथी मजदूरों के सहयोग से एम्बुलेंस के जरिए गांव पहुंचाया गया। शव घर पहुंचते ही परिवार में चीख-पुकार मच गई। मां-बाप और परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। पूरे गांव में मातम पसरा हुआ है। आज तुलसी का अंतिम संस्कार किया जाएगा। जिस बेटे के कंधों पर परिवार की गरीबी दूर करने की उम्मीद टिकी थी, उसी बेटे का शव घर पहुंचने से गांव का हर व्यक्ति गमगीन है।

पढ़ाई छोड़ परिवार का पेट पालने निकला था तुलसी

तुलसी की कहानी सिर्फ एक मजदूर की मौत की कहानी नहीं, बल्कि सारंडा के गरीब परिवारों की उस कड़वी हकीकत को भी उजागर करती है, जहां आर्थिक तंगी बच्चों को कम उम्र में ही मजदूरी के दलदल में धकेल देती है।

बताया जाता है कि परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर होने के कारण तुलसी ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी। कम उम्र में ही उसने माता-पिता का सहारा बनने और परिवार की आजीविका चलाने का जिम्मा अपने कंधों पर उठा लिया। इसी मजबूरी में वह रोजगार की तलाश में हजारों किलोमीटर दूर हरिद्वार चला गया।

इसी कंपनी में काम करता था

17 साल 9 महीने के किशोर को कंपनी ने कैसे रखा काम पर?

जानकारी के अनुसार, तुलसी हरिद्वार स्थित Vision Metal Aids Pvt. Ltd. नामक कंपनी में काम कर रहा था। आरोप है कि कंपनी ने निर्धारित श्रम नियमों और नाबालिगों के नियोजन से जुड़े कानूनी प्रावधानों की अनदेखी करते हुए उसे काम पर रखा था। बताया जाता है कि उसे बेहद कम पारिश्रमिक पर काम कराया जा रहा था।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब तुलसी की उम्र महज 17 वर्ष 9 महीने थी, तो कंपनी प्रबंधन ने उसे किस आधार पर काम पर रखा? क्या नौकरी देने से पहले उसके आधार कार्ड और उम्र से संबंधित दस्तावेजों की जांच नहीं की गई थी? यदि दस्तावेजों में उसकी वास्तविक उम्र दर्ज थी, तो कंपनी ने नाबालिग को रोजगार देने की अनुमति आखिर किस नियम के तहत दी?

बीमार पड़ा तो अस्पताल में कराया गया भर्ती, इलाज के दौरान मौत

कंपनी में काम करने के दौरान ही तुलसी की तबीयत बिगड़ गई। इसके बाद उसे हरिद्वार के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। हालांकि, उसकी बीमारी की वास्तविक वजह, अस्पताल में हुए इलाज का पूरा विवरण और मौत की परिस्थितियों को लेकर अभी तक विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है।

इन परिस्थितियों में यह जांच बेहद जरूरी है कि तुलसी को किस तरह का काम सौंपा गया था, काम के दौरान उसे पर्याप्त सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं मिल रही थीं या नहीं तथा बीमार पड़ने के बाद कंपनी प्रबंधन ने समय पर और उचित चिकित्सा व्यवस्था सुनिश्चित की थी या नहीं।

कंपनी ने दिए महज 10 हजार रुपये, एम्बुलेंस से भेजा शव

गंगदा पंचायत के मुखिया एवं दुईया गांव निवासी राजू सांडिल ने बताया कि तुलसी पिछले लगभग एक वर्ष से उक्त कंपनी में काम कर रहा था। उसकी मौत के बाद कंपनी प्रबंधन की ओर से परिवार को 10 हजार रुपये दिए गए तथा एम्बुलेंस के माध्यम से शव को गांव भेजने की व्यवस्था की गई। स्थानीय मजदूरों के सहयोग से उसका पार्थिव शरीर परिजनों तक पहुंचाया गया।

यहां सवाल सिर्फ 10 हजार रुपये देने या एम्बुलेंस से शव भेजने का नहीं है। सवाल यह है कि एक नाबालिग मजदूर को काम पर रखने वाली कंपनी की जिम्मेदारी आखिर कहां समाप्त होती है? क्या किसी मजदूर की मौत के बाद शव को उसके घर पहुंचा देना ही कंपनी की पूरी जवाबदेही है? मृतक के परिवार को मिलने वाली वैधानिक सहायता, मुआवजे और अन्य अधिकारों की जिम्मेदारी कौन तय करेगा?

मृतक के शव से लिपट परिजन रोते

बाल मजदूरी पर कानून सख्त, फिर कंपनी को किसका संरक्षण?

भारत में बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) कानून के तहत 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के रोजगार पर सामान्यतः प्रतिबंध है। वहीं 14 से 18 वर्ष की आयु के किशोरों को खतरनाक व्यवसायों और प्रक्रियाओं में नियोजित करना प्रतिबंधित है।

ऐसे में तुलसी की उम्र, कंपनी में उसके कार्य की प्रकृति और नियोजन की परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। यदि कंपनी ने प्रतिबंधित कार्य में नाबालिग किशोर को लगाया था, तो यह गंभीर कानूनी मामला बन सकता है।

श्रम विभाग और प्रशासन की चुप्पी पर भी उठे सवाल

तुलसी की मौत ने सिर्फ कंपनी प्रबंधन ही नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन और श्रम विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर दूसरे राज्यों में काम करने वाले सारंडा के गरीब और आदिवासी मजदूरों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? क्या मजदूरों के नियोजन, उम्र के सत्यापन और कार्यस्थल पर सुरक्षा की जांच करने वाली व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित है?

प्रशासन को इस मामले में हरिद्वार स्थित कंपनी से नियोजन संबंधी दस्तावेज, आधार कार्ड में दर्ज जन्मतिथि, उपस्थिति रजिस्टर, वेतन भुगतान का रिकॉर्ड और अस्पताल से संबंधित चिकित्सा दस्तावेज प्राप्त कर जांच करनी चाहिए।

सिर्फ अंतिम संस्कार नहीं, तुलसी को न्याय भी मिले

तुलसी की मौत के बाद अब सबसे बड़ी जरूरत उसके परिवार को न्याय और आर्थिक सुरक्षा दिलाने की है। संबंधित श्रम विभाग को मामले की निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट करना चाहिए कि नाबालिग तुलसी को कंपनी में किस आधार पर काम पर रखा गया था और उसकी मौत की परिस्थितियों में कंपनी की कोई लापरवाही या कानूनी जिम्मेदारी बनती है या नहीं।

साथ ही मृतक के परिजनों को नियमानुसार मुआवजा, बकाया मजदूरी और अन्य वैधानिक लाभ दिलाने की दिशा में कार्रवाई होनी चाहिए।

तुलसी अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी मौत कई ऐसे सवाल छोड़ गई है जिनका जवाब कंपनी प्रबंधन और संबंधित प्रशासन को देना होगा। गरीबी से लड़ने निकला एक किशोर आखिर मौत के मुहाने तक कैसे पहुंच गया? क्या गरीब परिवारों के बच्चों की जिंदगी इतनी सस्ती है कि उनकी मौत के बाद महज 10 हजार रुपये और एक एम्बुलेंस से जिम्मेदारी पूरी मान ली जाए? अब देखना है कि इस दर्दनाक घटना के बाद प्रशासन जागता है या तुलसी की मौत भी सरकारी फाइलों में दर्ज होकर रह जाएगी।

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